बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५३ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः लोहितो गरुडो हेतिर्वाणनेत्राक्षरो मनुः । मुन्यादिकं तु पूर्वोक्तं प्लीहरोगहरो हरिः ॥१६१॥ देवता च समुद्दिष्टा प्लीहयुक्तोदरे पुनः । नागवल्लीदलं स्थाप्यमुपर्याच्छादयेत्ततः ॥१६२॥ वस्त्रं चैवाष्टगुणितं ततः साधकसत्तमः । शकलं वंशजं तस्योपरि मुंचेत्कपिं स्मरेत् ॥१६३॥ आरण्यसानलोत्पन्ने वह्नौ यष्टिं प्रतापयेत् । बदरीभूरुहोत्थां तां मन्त्रेणानेन सप्तधा ॥१६४॥ तया संताडयेद्वंशशकलं जठरस्थितम् । सप्तकृत्वः प्लीहरोगो नाशमायाति निश्चितम् ॥१६५॥ तारो नमो भगवते आंजनेयाय चोच्चरेत् । अमुकस्य श्रृंखलां त्रोटय द्वितयमीरयेत् ॥१६६॥ बंधमोक्षं कुरुयुगं स्वाहांतोऽयं मनुर्मतः । ईश्वरोऽस्य मुनिश्च्छन्दोऽनुष्टुप्च देवता पुनः ॥१६७॥ श्रृंखलामोचकः श्रीमान्हनुमान्पवनात्मजः । हं बीजं ठद्वयं शक्तिर्बंधमोक्षे नियोगता ॥१६८॥ षड्दीर्घवह्निसंयुक्तेन बीजेनांगानि कल्पयेत् । बामे शैलं वेरिमदं विशुद्धं टंकमन्यतः ॥१६९॥ दधानं स्वर्णवर्णं च ध्यायेत्कुंडलिनं हरिम् । एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षदशांशं चूतपल्लवैः ॥१७०॥ जुहुयात्पूर्ववत्प्रोक्तं यजनं वास्य सुरिभिः । महाकारागृहे प्राप्तो ह्ययुतं प्रजपेन्नरः ॥१७१॥ शीघ्रं कारागृहान्मुक्तः सुखी भवति निश्चितम् । यंत्रं चास्य प्रवक्ष्यामि बन्धमोक्षकरं शुभम् ॥१७२॥ अष्टच्छदांतः षट्कोणं साध्यनामसमन्वितम् । षट्कोणेषु ध्रुवं ङेऽतमांजनेयपदं लिखेत् ॥१७३॥ अष्टच्छदेषु विलिखेतप्रणवौ वातुद्वात्विति । गोरोचनाकुंकुमेन लिखित्वा यंत्रमुत्तमम् ॥१७४॥ धृत्वा मूर्ध्नि जपेन्मंत्रमयुतं बन्धमुक्तये । यन्त्रमेतल्लिखित्वा तु मृत्तिकोपरि मार्जयेत् ॥१७५॥ दक्षहस्तेन मन्त्रज्ञः प्रत्यहं मंडलावधि । एवं कृते महाकारागृहान्मंत्री विमुच्यते ॥१७६॥ मन्त्र के समान ही हैं। परन्तु देवता प्लीहरोग (प्लीहा) का हरण करने वाले हरि हैं ॥१५९-१६१॥ जिसके पेट में यह रोग हो उसके पेट पर पान का पत्ता रख आठ (तहके) वस्त्रों से उसे ढांक दे। फिर हनुमान् का ध्यान कर बाँस का एक टुकड़ा उस पर रख छोड़े। अनन्तर इस मन्त्र को पढ़ते हुए बेर की लाठी से सात बार उस टुकड़े का ताड़न करे। वह लाठी दावाग्नि में तपी होनी चाहिये। उससे उदरस्थित वंशखंड का सात बार ताड़न करने से प्लीहा निश्चय छूट जातो है ॥१६२-१६५॥ "ओं नमो भगवते आंजनेयाय, अमुकस्य श्रृंखलां त्रोटय, बंधमोक्षं कुरु युगं स्वाहा" यह मन्त्र है। इसके मुनि ईश्वर, छंद अनुष्टुप् और देवता श्रृंखला (बंधन) को तोड़ने वाले वायुसुत श्रीमान् हनुमान् हैं। इसका बीज 'हं' है और शक्ति ठद्वय। बंधनमोक्ष में इसका नियोग किया जाता है, छः दीर्घ मात्रा और वह्नियुक्त बीज से अंगन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् बाँयें हाथ पर पर्वत और दाहिने हाथ में गदा धारण करने वाले स्वर्णवर्ण हनुमान् का ध्यान करे, जिनके कानों में कुण्डल सुशोभित होते हैं। ध्यानोपरान्त इस मन्त्र का एक लाख जप करे और उसका दशांश आम्रपल्लवों से हवन करे। विद्वान् साधक इस मन्त्र का पूजन आदि पूर्व मन्त्र की तरह करे। जो मनुष्य कारागार में पड़ा है, वह दश हजार इस मन्त्र के जप करने से शीघ्र कारागार से मुक्त होकर सुखी होता है ॥१६७-१७१॥ इसका यंत्र भी मैं बता देता हूँ, जो शुभकारी तथा बंधन से छुड़ाने वाला है। अष्टदल कमल के भीतर षटकोण बनाकर उनकी कर्णिका में साध्य पुरुष का नाम लिखे। छह कोणों में 'ओं आञ्जनेयाय' का उल्लेख करे। अष्टपत्रों पर प्रणव तथा 'वातु, वातु' लिखना चाहिये। बंधन से मुक्ति पाने के लिये गोरोचन तथा कुंकुम से इस उत्तम यंत्र को लिखकर मस्तक पर धारण करके उक्त मन्त्र का दश हजार जप करे। इस मन्त्र को लिख कर साधक प्रति दिन दाहिने हाथ से मिट्टी के ऊपर मंडलाकार में इसे घुमाये। ऐसा करने से वह कारागार से मुक्त हो जाता है ॥१७२-१७६॥ गगन (ह), नेत्र (इ)