सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 671, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 671

६५२ नारदीयपुराणम् लक्ष्मणं च महावीरं पतितं रणभूतले । गुरुं च क्रोधमुत्पाद्य ग्रहीतुं गुरुपर्वतम् ॥१४६॥ हाहाकारैः सदर्पैश्च कंपयंतं जगत्त्रयम् । आब्रह्मांडं समाव्याप्य कृत्वा भीमं कलेवरम् ॥१४७॥ लक्षं जपेद्दशांशेन जुहुयात्पूर्ववत्सुधीः । पूर्ववत्पूजनम् प्रोक्तं मन्त्रस्यास्य विधानतः ॥१४८॥ एवं सिद्धे मनौ मन्त्री साधयेदात्मनो हितम् । अस्यापि मन्त्रवर्यस्य रहस्यं साधनं तु वै ॥१४९॥ सुगोप्यं सर्वतन्त्रेषु न देयं यस्य कस्यचित् । ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय कृतनित्यक्रियः शुचिः ॥१५०॥ गत्वा नदीं ततः स्नात्वा तीर्थमावाह्य चाष्टधा । मूलमन्त्रं ततो जप्त्वा सिंचेदादित्यसंख्यया ॥१५१॥ एवं स्नानादिकं कृत्वा गंगातीरेऽथवा पुनः । पर्वते वा वने वापि भूमिग्रहणपूर्वकम् ॥१५२॥ आद्यवर्णैः पूरकं स्यात्पञ्चवर्गैश्च कुम्भकम् । रेचकं च पुनर्ग्राह्यैरेवं प्राणान्नियम्य च ॥१५३॥ विधाय भूतशुद्ध्यादि पीठन्यासावधि पुनः । ध्यात्वा पूर्वोक्तविधिना संपूज्य च कपीश्वरम् ॥१५४॥ तदग्रे प्रजपेन्नित्यं साधकोऽयुतमादरात् । सप्तमे दिवसे प्राप्ते कुर्याच्च पूजनम् महत् ॥१५५॥ एकाग्रमनसा मन्त्री दिवारात्रं जपेन्मनुम् । महाभयं प्रदत्त्वा त्रिभागशेषामु निश्चितम् ॥१५६॥ यामिनीषु समायाति नियतं पवनात्मजः । यथेप्सितं वरं दद्यात्साधकाय कपीश्वरः ॥१५७॥ विद्यां वापि धनं वापि राज्यं वा शत्रुनिग्रहम् । तत्क्षणादेव चाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः ॥१५८॥ इह लोकेऽखिलान्कामान्भुक्त्वा॑ते मुक्तिमाप्नुयात् । सद्योचितं वायुयुग्मं हनूमंतेति चोद्धरेत् ॥१५९॥ फलांते फक्रियानेत्रयुक्ता च कामिका ततः । धग्गंते धगितेत्युक्त्वा आयुरास्व पदं ततः ॥१६०॥ रणभूमि में गिरे हुए महावीर लक्ष्मण को देखकर वे अत्यन्त क्रोध करते हैं तथा महाशैल को उखाड़ कर लाने के लिये चल पड़ते हैं। उस समय तीनों लोक में हाहाकार मच जाता है । उनके भयानक शरीर को देख कर ब्रह्मांड कांप उठता है । विद्वान् साधक एक लाख इस मन्त्र का जप कर पहिले की तरह उसका दशांश हवन करे। इस मन्त्र की पूजा भी पूर्ववत् ही विधिपूर्वक करनी चाहिये ॥१४२-१४८॥ इस प्रकार मन्त्र सिद्ध कर लेने पर मन्त्री अपना इष्टसाधन करे। इस मन्त्र-राज का भी रहस्य एवम् साधन समस्त तंत्रों में गुप्त करके रखा गया है। यह सबको नहीं बतलाना चाहिये। ब्राह्ममुहूर्त में उठकर नित्य कर्म से निवृत्त हो, नदी में जाकर स्नान करे। आठ तीर्थों का आवाहन कर मूलमन्त्र को जपते हुए बारह बार जल से अपने को सिक्त करे। पुनःस्नानोपरान्त गङ्गातीर या पर्वत या वन में आसन पर बैठ कर आद्य अक्षरों से पूरक, पंचवर्गों से कुंभक और य आदि अक्षरों से रेचक प्राणायाम करे। पश्चात् पीठन्यास, भूतशुद्धि आदि कर के पूर्वोक्त विधि से हनुमान् का ध्यानपूर्वक पूजन करे और उनके आगे नित्य आदरपूर्वक दश हजार मन्त्र जपे। सातवें दिन महापूजा करनी चाहिये ॥१४९-१५५॥ साधक एकाग्रमन से दिन-रात मन्त्र को जपता रहे। ऐसा करने से वह निर्भय हो जाता है। रात्रि में आकर हनुमान् जो उसे अभिलषित वर देते हैं। विद्या या धन या राज्य या शत्रु निग्रह जो कुछ वह चाहता है, तत्काल उसे मिल जाता है। यह ध्रुव सत्य है, इसमें संशय करने की आवश्यकता नहीं। वह साधक इस लोक में अखिल भोगों को भोग कर अन्त में मोक्ष पाता है ॥१५६-१५८॥ सद्योजात (ओ) सहित दो वायु (य् यू-यो यो) 'हनुमन्त' का उच्चारण करे। फिर 'फल' के अन्त में 'फ' तथा नेत्र (इ) युक्त क्रिया (ल) एवं कामिका (त) का उच्चारण करे। तत्पश्चात् 'धग्धगित' बोलकर 'आयुराष्' पद का उच्चारण करे । तदनन्तर लोहित (प) तथा 'रुद्राह' का उच्चारण करना चाहिए। मन्त्र--नों यो यो हनुमन्त फल-फलितं धग्धगित आयुराष पड्डाह) यह २५ अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि आदि तो पूर्वोक्त