बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५१ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः प्राणायामषडंगे च मूलेन सकलं चरेत् । पुष्पांजल्यष्टकं दत्त्वा ध्यात्वा रामं ससीतकम् ॥१२७॥ ताम्रपात्रे ततः पद्ममष्टपत्रं सकेशरम् । कुचन्दनेन घृष्टेन संलिखेत्तच्छलाकया ॥१२८॥ कणिकायां लिखेन्मंत्रं तत्रावाह्य कपीश्वरम् । मूर्ति मूलेन संकल्प्य ध्यात्वा पाद्यादिकं चरेत् ॥१२९॥ गंधपुष्पादिकं सर्वं निवेद्य मूलमन्त्रतः । केसरेषु षडंगानि दलेषु च ततोऽर्चयेत् ॥१३०॥ सुग्रीवं लक्ष्मणं चैव ह्यंगदं नलनीलकौ । जांबवंतं च कुमुदं केसरीशं दलेऽर्चयेत् ॥१३१॥ दिक्पालांश्चापि वज्रादीन्पूजयेत्तदनंतरम् । एवं सिद्धे मनो मन्त्री साधयेत्स्वेष्टमात्मनि ॥१३२॥ नदीतीरे कानने वा पर्वते विजनेऽथवा । साधयेत्साधकश्रेष्ठो भूमिग्रहणपूर्वकम् ॥१३३॥ जिताहारो जितश्वासो जितवाक्च जितेंद्रियः । दिग्बन्धनादिकं कृत्वा न्यासध्यानादिपूर्वकम् ॥१३४॥ लक्षं जपेन्मंत्रराजं पूजयित्वा तु पूर्ववत् । लक्षांते दिवसं प्राप्य कुर्याच्च पूजनं महत् ॥१३५॥ एकाग्रमनसा सम्प्रध्यायत्वा पवननन्दनम् । दिवारात्रौ जपं कुर्याद्यावत्संदर्शनं भवेत् ॥१३६॥ सुदृढं साधकं मत्वा निशीथे पवनात्मजः । सुप्रसन्नस्ततो भूत्वा प्रयाति साधकाग्रतः ॥१४०॥ यथेप्सितं वरं दत्त्वा साधकाय कपीश्वरः । वरं लब्ध्वा साधकेंद्वो विहरेदात्मनः सुखैः ॥१४१॥ एतद्धि साधनं पुण्यं लोकानां हितकाम्यया । प्रकाशितं रहस्यं वै देवानामपि दुर्लभम् ॥१४२॥ अन्यानविप्रयोगांश्च साधयेदात्मनो हितान् । वियद्विन्दुयुतं पश्चाङेन्तं पवननंदनम् ॥१४३॥ वह्निप्रियान्तो मन्त्रोऽयं दशार्णः सर्वकामदः । मुन्यादिकं च पूर्वोक्तं षडंगान्यपि पूर्ववत् ॥१४४॥ ध्यायद्रेणे हनूमंतं सूर्यकोटिसमप्रभम् । धावंतं रावणं जेतुं दृष्ट्वा सत्वरमुत्थितम् ॥१४५॥ करे । तदनन्तर सीता सहित राम का ध्यान कर केसर के साथ घिसे हुए लाल चन्दन से उसी की शलाका द्वारा ताम्रपात्र में अष्टदल कमल लिखे । कर्णिका मन्त्र लिखकर उस पर कपीश्वर का आवाहन करे ॥१२७- १३१३॥ ध्यानपुरस्सर मूलमन्त्र से मूर्ति की प्रतिष्ठा कर पाद्य, गंध, पुष्प आदि सब कुछ मूलमन्त्र से ही समर्पित करे । केसरों पर छः अङ्ग देवों और पत्रों पर सुग्रीव, लक्ष्मण, अङ्गद, नल, नील, जांबवंत, कुमुद, केसरोश दिक्पाल तथा वज्र आदि की पूजा करे । इस प्रकार मन्त्र को सिद्ध कर मन्त्री इष्टसिद्धि करे । नदी तीर या वन या पर्वत या विजनस्थान में साधक साधन प्रारंभ करे ॥१३२-१३६॥ जिताहार, जितश्वास, जितवाक् तथा जितेन्द्रिय होकर न्यास, ध्यान तथा दिग्बंधन आदि करने के उपरान्त एक लाख मन्त्र जपकर पूर्ववत् पूजा करे । जिस दिन मन्त्रजप पूर्ण हो जाय, उस दिन विशिष्ट पूजा करनी चाहिये । एकाग्रमन से अच्छी तरह पवननंदन का ध्यान कर दिन-रात तब तक जप करते रहना चाहिये, जब तक दर्शन न हो । जब हनुमान् जो साधक को सुदृढ समझते हैं, तब वे प्रसन्न होकर रात्रि में उसके आगे आते हैं और यथेच्छ वर प्रदान करते हैं । उत्तम साधक वर प्राप्त कर सुख से विहरण करता है ॥१३७-१४१॥ यह साधना अत्युत्तम है । लोगों के कल्याण की कामना से मैंने इस रहस्य को प्रकाशित किया है, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । आत्मकल्याण के लिये अन्य प्रयोगों को भी करना चाहिये । इन्दु (अनुस्वार) युक्त वियत् (ह) अर्थात् (हं) के पश्चात् ङे विभक्त्यन्त पवननंदन शब्द हो और अन्त में वह्निप्रिया (स्वाहा) हो तो (हं पवननंदनाय स्वाहा) यह दशाक्षर मन्त्र सकल कामनाओं को पूर्ण करता है। इसके मुनि आदि पूर्ववत् ही हैं । षडंगन्यास आदि भी पहिले ही की तरह करे । तदनन्तर हनुमान् का ध्यान करे कि-उनकी कान्ति कोटि सूर्यों के समान है । रण में भागते हुए रावण को देखकर शीघ्र ही उसका पीछा करने के लिये उठ खड़े हुए हैं ।