बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 674, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६५५ चतुःसप्ततितमोऽध्यायः अष्टार्णोऽयं महामंत्रो मालामंत्रोऽथ कथ्यते । प्रणवो वज्रकायेति वज्रतुंडेति संपठेत् ॥१६२॥ कपिलांते पिंगलेति ऊर्ध्वकेशमहापदम् । बलरक्तमुखांते तु तडिज्जिह्व महा ततः ॥१६३॥ रौद्रदंष्ट्रोत्कटं पश्चात्कहद्वंद्वं करालिति । महद्दृढप्रहारेण लंकेश्वरवधाततः ॥१६४॥ वायुमंहासेतुपदं बंधांते च महा पुनः । शैलप्रवाह गगनेचर एह्येहि संवदेत् ॥१६५॥ भगवन्महाबलांते पराक्रमपदं वदेत् । भैरवाज्ञापयैह्येहि महारौद्रपदं ततः ॥१६६॥ दीर्घपुच्छेन वर्णांते वद्वेष्टय वैरिणम् । जंभयद्वयमाभाष्य वर्मस्त्रांतो मनुर्मतः ॥१६७॥ मालाह्वयो द्विजश्रेष्ठ शरनेत्रधराक्षरः । मालामंत्राष्टांर्णयोश्च मुन्याद्यर्चा तु पूर्ववत् ॥१६८॥ जप्तो युद्धे जयं दद्याद्व्याधौ व्याधिविनाशनः । एवं यो भजते मंत्री वायुपुत्रं कपिश्वरम् ॥१६९॥ सर्वांन्स लभते कामान्देवेरपि सुदुर्लभान् । धनं धान्यं सुतान्पौत्रान्सौभाग्यमतुलं यशः ॥२००॥ मेधां विद्यां प्रभां राज्यं विवादे विजयं तथा । वश्याद्यानि च कर्माणि संगरे विजयं तथा ॥२०१॥ उपासितोऽञ्जनागर्भसंभूतः प्रददात्यलम् । ॥२०२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने सनत्कुमारविभागे तृतीयपादे हनुमन्मंत्रकथनं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥७४॥
बनता है। अब मालामन्त्र को बताता हूँ। प्रणव (ओं) के बाद वज्रकाय और वज्रतुण्ड का पाठ करे। उसके बाद क्रमशः कपिल, पिंगल, ऊर्ध्वकेश, बलरक्तमुख, तडिज्जह्व, रौद्रदंष्ट्र, कट, कहद्वन्द्व, कराल, महद्दृढप्रहारेण लंकेश्वरवधाततः। वायुमंहासेतुपदं बंधांते च महा पुनः । शैलप्रवाह, गगनेचर एहि एहि मह उच्चारंण करने के बाद 'भगवन्' महाबल, महापराक्रम, भैरव, आज्ञापय, एहि एहि, महारौद्र। दीर्घपुच्छेन वैरिणं वेष्टय, द्वयं जम्भय, यह कहने के बाद 'हूं' तथा 'फट्' जोड़ देना चाहिए। द्विजश्रेष्ठ ! इस मालामन्त्र के तथा अष्टाक्षर मन्त्र के मुनि आदि पूर्ववत् हैं और अर्चना आदि भी पूर्ववत् ही करनी चाहिये। युद्ध में इसका जप करने से विजय प्राप्त होती है और व्याधिनिवारणार्थ जपने से रोग का नाश होता है। जो व्यक्ति पूर्वोक्त रीति से वायुपुत्र हनुमान् की आराधना करता है, उसे देवदुर्लभ कामनाओं की प्राप्ति होती है। धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, सौभाग्य तथा अतुलनीय यश उसे लाभ होता है। अंजना के गर्भ से उत्पन्न होने वाले हनुमान् का उपासक प्रचुर मेधा, विद्या, प्रभा, राज्य, विवाद में विजय, रण में विजय और वशीकरण आदि सिद्धियों को प्राप्त करता है॥१९१-२०२॥ श्रीनारदीयपुराण के बृहदुपाख्यानयुक्त पूर्वार्ध में सनत्कुमार-विभागीय तृतीयपाद में हनुमन्मन्त्रकथन नामक चौहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७४॥