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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 675

पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ दीपविधिं वक्ष्ये सरहस्यं हनूमतः । यस्य विज्ञानमात्रेण सिद्धो भवति साधकः ॥१॥ दीपपात्रप्रमाणं च तैलमानं क्रमेण तु । द्रव्यस्य च प्रमाणं वै तत्तु जानमनुक्रमात् ॥२॥ स्थानभेदं च मंत्रं च दीपदानमनुं पृथक् । पुष्पवासिततैलेन सर्वकामप्रदं मतम् ॥३॥ तिलतैलं श्रियः प्राप्त्यै पथिकागमनं प्रति । अतसीतैलमुद्दिष्टं वश्यकर्मणि निश्चितम् ॥४॥ सार्षपं रोगनाशाय कथितं कर्मकोविदैः । मारणे राजिकोत्थं वा विभीतकसमुद्भवम् ॥५॥ उच्चाटने करंजोत्थं विद्वेषे मध्वृक्षजम् । अलाभे सर्वतैलानां तिलजं तैलमुत्तमम् ॥६॥ गोधूमाश्च तिला माषा मुद्गा वै तंडुलाः क्रमात् । पंचधान्यमिदं प्रोक्तं नित्यदीपं तु मारुतेः ॥७॥ पंचधान्यसमुद्भूतं पिष्टमात्रं सुशोभनम् । सर्वकामप्रदं प्रोक्तं सर्वदा दीपदानके ॥८॥ वश्ये तंडुलपिष्टोत्थं मारणे माषपिष्टजम् । उच्चाटने कृष्णतिलपिष्टजं च प्रकीर्तितम् ॥९॥ पथिकागमने प्रोक्तं गोधूमोत्थं सतंडुलम् । मोहने त्वाढकीजातं विद्वेषे च कुलत्थजम् ॥१०॥ अध्याय ७५ हनुमान् के लिए दीपदान का विधान सनत्कुमार बोले--अब इसके उपरान्त हनुमान् के उद्देश्य से दीपदान करने का विधान रहस्य सहित बता देता हूँ, जिसके ज्ञानमात्र से साधक सिद्ध हो जाता है। दीपदान का प्रमाण, तेल का मान तथा द्रव्य का प्रमाण मैं अनुक्रम से बतलाऊँगा। दीपदान के विविध स्थान तथा मन्त्र को भी कहूँगा। पुष्प-वासित तेल से दीपक को जलाना समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला है। तिल के तेल से दीप जलाने से श्री प्राप्त होती है और पथिक (बटोही) सकुशल मार्ग को तय करता है। वशीकरण के लिये अलसी का तेल कहा गया है ॥१-४॥ कर्म के ज्ञाताओं ने रोगनाश के लिये सरसों का तेल बतलाया है। मारण में पीले सरसों या बहेड़ा का तेल प्रयोग कर सकते हैं। उच्चाटन में करंज का तेल और विद्वेष में महुए का तेल व्यवहार करना चाहिये। समस्त तेलों के अभाव में तिल का तेल ही उत्तम माना गया है। गेहूँ, तिल, उड़द, मूंग और चावल--इन पाँचों अन्नों का बनाया हुआ दीप नित्यदीप के रूप में हनुमान् को समर्पित किया जाता है ॥५-७॥ पञ्चधान्यों को पीस कर उससे बनाया गया सुन्दर दीप सकल कामनाओं को देने वाला है। वह सदा दीपदान के लिये प्रशस्त माना गया है। चावल के पिसान का बनाया दीप वशीकरण में, उड़द का मारण में, काले तिल का उच्चाटन में, चावल मिश्रित गेहूँ का यात्री के सकुशल लौट आने में, अरहर का मोहन में, कुलथी का विद्वेष में, केवल उड़द का संग्राम

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