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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 676

६५७ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः संग्रामे केवला माषाः प्रोक्ता दीपस्य पात्रके । संधौ त्रिपिष्टजं लक्ष्मीहेतोः कस्तूरिकामवम् ॥११॥ एलालवंगकर्पूरमृगनाभिसमुद्भवम् । कन्याप्राप्त्यै तथा राजवश्ये सख्ये तथैव च ॥१२॥ अलाभे सर्ववस्तूनां पंचधान्यं वरं स्मृतम् । अष्टमुष्टिर्भवेत्कुञ्चित्कुञ्चिदष्टौ च पुष्कलम् ॥१३॥ पुष्कलानां चतुर्णां च ह्याढकः परिकीर्तितः । चतुराढको भवेद्द्रोणः खारी द्रोणचतुष्टयम् ॥१४॥ खारीचतुष्टयं प्रस्थसंज्ञा च परिकीर्तिता । अथवान्यप्रकारेण मानमत्र निगद्यते ॥१५॥ पलद्वयं तु प्रसृतं द्विगुणं कुडवं मतम् । चतुर्भिः कुडवैः प्रस्थस्तैश्चतुर्भिस्तथाढकः ॥१६॥ चतुराढको भवेद्द्रोणः खारी द्रोणचतुष्टयम् । क्रमेणैतेन ते ज्ञेयाः पात्रे षट्कर्मसंभवे ॥१७॥ पञ्च सप्त नव तथा प्रमाणास्ते यथाक्रमम् । सौगन्धे नैव मानं स्यात्तद्यथारुचि संमतम् ॥१८॥ नित्यपात्रे तु तैलानां नियमो वार्तिकोद्भवः । सोमवारे गृहीत्वा तद्धान्यं तोयप्लुतं घरेत् ॥१९॥ पश्चात्प्रमाणतो ज्ञेयं कुमारीहस्तपेषणम् । तत्पिष्टं शुद्धपात्रे तु नदीतोयेन पीडितम् ॥२०॥ दीपपात्रं ततः कुर्याच्छुद्धः प्रयतमानसः । दीपपात्रे ज्वाल्यमाने मारुतेः कवचं पठेत् ॥२१॥ शुद्धभूमौ समास्थाप्य भौमे दीपं प्रदापयेत् । मालामन्तूनां ये वर्णाः साध्यनामसमन्विताः ॥२२॥ वर्तिकायां प्रकर्त्तव्यास्तंतवस्तत्प्रमाणकाः । तंस्त्रिंशंशेन वा ग्राह्या गुरुकार्येऽखिलाढ्यता ॥२३॥ कूटतुल्याः स्मृता नित्ये सामान्येऽथ विशेषके । रुद्राः कूटगणाः प्रोक्ता न पात्रे नियमो मतः ॥२४॥ एकविंशतिसंख्याकास्तन्तवोऽथाध्वनि स्मृताः । रक्तसूत्रं हनुमतो दीपदाने प्रकीर्तितम् ॥२५॥ कृष्णमुच्चाटने द्वेषेऽरुणं मारणकर्मणि । कूटतुल्यपलं तैलं गुरुकार्ये शिवैर्गुणम् ॥२६॥

त्रिपिष्ट (?) का संधि करने में, कस्तूरी का लक्ष्मी प्राप्ति में, और इलायची, लवंग तथा कपूर का कन्या-प्राप्ति, मित्रता तथा राजा के वशीकरण में उपयोग करना चाहिये । अन्य सब वस्तुओं के न मिलने पर पञ्चधान्य उत्तम माना गया है । आठ मुट्ठियों की एक कुञ्चि १ होती है, आठ कुञ्चियों का एक पुष्कल, १ चार पुष्कलों का एक आढक, चार आढकों का एक द्रोण, चार द्रोणों की एक खारी और चार खारियों का एक प्रस्थ होता है । अथवा इस संबन्ध में अन्य प्रकार का भी मान कहा गया है । १८-१५॥ दो पलों २ का एक प्रसृत, दो प्रसूतों का एक कुडव, चार कुडवों का एक प्रस्थ, चार प्रस्थों का एक आढकं, चार आढकों का एक द्रोण और चार द्रोणों की एक खारी होती है। इस क्रम से षट्कर्मोपयोगी पात्र में ये मान समझने चाहिए । पाँच, सात तथा नौ-ये क्रमशः दीपक के प्रमाण हैं । सुगंधित तेल से जलने वाले दीपक का कोई मान नहीं है। उसका मान अपनी रुचि के अनुसार ही माना गया है। तेलों के नित्य पात्र में केवल बत्ती का विशेष नियम होता है। सोमवार को धान्य लेकर उसे जल में डुबोकर रखे । फिर प्रमाण के अनुसार कुमारी के हाथ से उसे पिसा कर शुद्ध पात्र में नदी के जल से उसे गूंधे ॥१६-२०॥ तदनन्तर पवित्र मन से दीपपात्र तैयार कर उसे जला कर हनुमान् का कवच पाठ करे। मंगल दिन पवित्र भूमि पर दीपक को रख कर दान करे। साध्यनाम सहित मालाओं में जितने अक्षर हैं उतने ही तंतु (सूत) दीपक की बत्ती में होने चाहिये । अथवा अक्षरों के तीसवें अंश के बराबर (अर्थात् तीस अक्षरों को छोड़कर बचे अक्षरों के प्रमाण) तंतुओं को रखे। भारी काम करना हो तो पूर्व प्रमाण के ही अनुसार तंतु रखना चाहिये । नित्यपात्र में कूटतुल्य (ग्यारह) और विशेषपात्र में पूर्व कथितानुसार तंतु रखे। कूट ग्यारह संख्या को कहते हैं। पात्र में कोई नियम नहीं है। रास्ते पर जलाये जाने वाले दीपक की बत्ती में इक्कीस तंतु चाहिये । हनुमान् को समर्पित किये जाने वाले दीप की बत्ती लाल रंग की होनी चाहिये। उच्चाटन कार्य के लिये काले रंग की और १-ये सब मान (तौल) के भेद हैं। २. आठ रत्ती और दो मासे की तोल । ८३ ना० पृ०