बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
६५७ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः संग्रामे केवला माषाः प्रोक्ता दीपस्य पात्रके । संधौ त्रिपिष्टजं लक्ष्मीहेतोः कस्तूरिकामवम् ॥११॥ एलालवंगकर्पूरमृगनाभिसमुद्भवम् । कन्याप्राप्त्यै तथा राजवश्ये सख्ये तथैव च ॥१२॥ अलाभे सर्ववस्तूनां पंचधान्यं वरं स्मृतम् । अष्टमुष्टिर्भवेत्कुञ्चित्कुञ्चिदष्टौ च पुष्कलम् ॥१३॥ पुष्कलानां चतुर्णां च ह्याढकः परिकीर्तितः । चतुराढको भवेद्द्रोणः खारी द्रोणचतुष्टयम् ॥१४॥ खारीचतुष्टयं प्रस्थसंज्ञा च परिकीर्तिता । अथवान्यप्रकारेण मानमत्र निगद्यते ॥१५॥ पलद्वयं तु प्रसृतं द्विगुणं कुडवं मतम् । चतुर्भिः कुडवैः प्रस्थस्तैश्चतुर्भिस्तथाढकः ॥१६॥ चतुराढको भवेद्द्रोणः खारी द्रोणचतुष्टयम् । क्रमेणैतेन ते ज्ञेयाः पात्रे षट्कर्मसंभवे ॥१७॥ पञ्च सप्त नव तथा प्रमाणास्ते यथाक्रमम् । सौगन्धे नैव मानं स्यात्तद्यथारुचि संमतम् ॥१८॥ नित्यपात्रे तु तैलानां नियमो वार्तिकोद्भवः । सोमवारे गृहीत्वा तद्धान्यं तोयप्लुतं घरेत् ॥१९॥ पश्चात्प्रमाणतो ज्ञेयं कुमारीहस्तपेषणम् । तत्पिष्टं शुद्धपात्रे तु नदीतोयेन पीडितम् ॥२०॥ दीपपात्रं ततः कुर्याच्छुद्धः प्रयतमानसः । दीपपात्रे ज्वाल्यमाने मारुतेः कवचं पठेत् ॥२१॥ शुद्धभूमौ समास्थाप्य भौमे दीपं प्रदापयेत् । मालामन्तूनां ये वर्णाः साध्यनामसमन्विताः ॥२२॥ वर्तिकायां प्रकर्त्तव्यास्तंतवस्तत्प्रमाणकाः । तंस्त्रिंशंशेन वा ग्राह्या गुरुकार्येऽखिलाढ्यता ॥२३॥ कूटतुल्याः स्मृता नित्ये सामान्येऽथ विशेषके । रुद्राः कूटगणाः प्रोक्ता न पात्रे नियमो मतः ॥२४॥ एकविंशतिसंख्याकास्तन्तवोऽथाध्वनि स्मृताः । रक्तसूत्रं हनुमतो दीपदाने प्रकीर्तितम् ॥२५॥ कृष्णमुच्चाटने द्वेषेऽरुणं मारणकर्मणि । कूटतुल्यपलं तैलं गुरुकार्ये शिवैर्गुणम् ॥२६॥
त्रिपिष्ट (?) का संधि करने में, कस्तूरी का लक्ष्मी प्राप्ति में, और इलायची, लवंग तथा कपूर का कन्या-प्राप्ति, मित्रता तथा राजा के वशीकरण में उपयोग करना चाहिये । अन्य सब वस्तुओं के न मिलने पर पञ्चधान्य उत्तम माना गया है । आठ मुट्ठियों की एक कुञ्चि १ होती है, आठ कुञ्चियों का एक पुष्कल, १ चार पुष्कलों का एक आढक, चार आढकों का एक द्रोण, चार द्रोणों की एक खारी और चार खारियों का एक प्रस्थ होता है । अथवा इस संबन्ध में अन्य प्रकार का भी मान कहा गया है । १८-१५॥ दो पलों २ का एक प्रसृत, दो प्रसूतों का एक कुडव, चार कुडवों का एक प्रस्थ, चार प्रस्थों का एक आढकं, चार आढकों का एक द्रोण और चार द्रोणों की एक खारी होती है। इस क्रम से षट्कर्मोपयोगी पात्र में ये मान समझने चाहिए । पाँच, सात तथा नौ-ये क्रमशः दीपक के प्रमाण हैं । सुगंधित तेल से जलने वाले दीपक का कोई मान नहीं है। उसका मान अपनी रुचि के अनुसार ही माना गया है। तेलों के नित्य पात्र में केवल बत्ती का विशेष नियम होता है। सोमवार को धान्य लेकर उसे जल में डुबोकर रखे । फिर प्रमाण के अनुसार कुमारी के हाथ से उसे पिसा कर शुद्ध पात्र में नदी के जल से उसे गूंधे ॥१६-२०॥ तदनन्तर पवित्र मन से दीपपात्र तैयार कर उसे जला कर हनुमान् का कवच पाठ करे। मंगल दिन पवित्र भूमि पर दीपक को रख कर दान करे। साध्यनाम सहित मालाओं में जितने अक्षर हैं उतने ही तंतु (सूत) दीपक की बत्ती में होने चाहिये । अथवा अक्षरों के तीसवें अंश के बराबर (अर्थात् तीस अक्षरों को छोड़कर बचे अक्षरों के प्रमाण) तंतुओं को रखे। भारी काम करना हो तो पूर्व प्रमाण के ही अनुसार तंतु रखना चाहिये । नित्यपात्र में कूटतुल्य (ग्यारह) और विशेषपात्र में पूर्व कथितानुसार तंतु रखे। कूट ग्यारह संख्या को कहते हैं। पात्र में कोई नियम नहीं है। रास्ते पर जलाये जाने वाले दीपक की बत्ती में इक्कीस तंतु चाहिये । हनुमान् को समर्पित किये जाने वाले दीप की बत्ती लाल रंग की होनी चाहिये। उच्चाटन कार्य के लिये काले रंग की और १-ये सब मान (तौल) के भेद हैं। २. आठ रत्ती और दो मासे की तोल । ८३ ना० पृ०
६५८ नारदीयपुराणम् ॥२७॥ नित्ये पंचपलं प्रोक्तमथवा मानसी रुचिः हनुमत्प्रतिमायास्तु सन्निधौ दीपदापनम् । शिवालयॆऽथवा कुर्यान्नित्यनैमित्तिके स्थले ॥२८॥ विशेषोऽस्त्यत्र यः कश्चिन्मारुतेरुच्यते मया ॥२६॥ प्रतिमाये प्रमोदेन ग्रहभूतग्रहेषु च । चतुष्पथे तथा प्रोक्तं षट्सु दीपप्रदापनम् ॥३०॥ सन्निधौ स्फाटिके लिंगे शालग्रामस्य सन्निधौ । नानाभोगश्रियै प्रोक्तं दीपदानम् हनूमतः ॥३१॥ गणेशसन्निधौ विघ्नमहाकंटकनाशने । विषव्याधिभये घोरे हनुमत्सन्निधौ स्मृतम् ॥३२॥ दुर्गायाः सन्निधौ प्रोक्तं संग्रामे दोपदानम् । चतुष्पथे व्याधिनष्टौ दुष्टदृष्टौ तथैव च ॥३३॥ राजद्वारे बंधमुक्तौ कारागारेऽथवा मतम् । अश्वत्थवटमूले तु सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥३४॥ वश्ये भये विवादे च वेश्मसंग्रामसंकटे । द्यूते दृष्टेस्तंभने च विद्वेषे मारणे तथा ॥३५॥ मृतकोत्थापने चैव प्रतिमाचालने तथा । विचे व्याधौ ज्वरे भूतग्रहे कृत्याविमोचने ॥३६॥ क्षतग्रंथौ महारण्ये दुर्गे व्याघ्रे च दंतिनि । क्रूरसत्त्वेषु सर्वेषु शश्वद्बंधविमोक्षणे ॥३७॥ पथिकागमने चैव दुःस्थाने राजमोहने । आगमे निर्गमे चैव राजद्वारे प्रकीतितम् ॥३८॥ दीपदानं हनुमतो नात्र कार्या विचारणा ॥३६॥ रुद्रैर्कावशत्पिडांश्च त्रिधा मंडलमानकम् । लघुमानं स्मृतं पंच सप्त वा नव वा तथा ॥४०॥ क्षीरेण नवनीतेन दध्ना वा गोमयेन च । प्रतिमाकरणं प्रोक्तं मारुतेर्दीपदापने ॥४१॥ दक्षिणाभिमुखं वीरं कृत्वा केसरिविक्रमम् ॥४२॥ द्वेष तथा मारण कर्म के लिये लाल रंग की बत्ती बनाये। किसी महान् कार्य की सिद्धि करनी हो तो ग्यारह पलों के प्रमाण से तेल दीपक में डाले। नित्यदीप में पाँच पल अथवा जितनी रुचि हो उतना तेल डाले। हनुमान् को प्रतिमा के समीप में दीपदान करना चाहिये ॥२५-२७१/२॥ शिवालय में या नित्य-नैमित्तिक स्थान में दीपदान कर सकते हैं। इस दोपदान के सन्दर्भ में जो विशेष बातें हैं, वह मैं बतलाता हूँ ॥२१-२९॥ प्रतिमा के आगे हर्षपूर्वक दीप समर्पण करे। इससे दुष्ट ग्रहों एवम् भूतों का उपद्रव शान्त होता है। चौराहे पर, स्फटिकमय शिवलिंग के समीप तथा शालग्राम के निकट दीप चढ़ाना चाहिये। हनुमान् को दीपक चढ़ाने से विविध प्रकार के भोग तथा श्री की प्राप्ति होती है। गणेश के समीप दीपदान करने से विघ्न तथा महासंकट का नाश होता है। भयंकर व्याधि तथा विष का भय दूर करना हो तो हनुमान् को दीप समर्पित करे ॥३०-३२॥ दुर्गा को दीपदान करने से संग्राम में विजय प्राप्त होती है। चौराहे पर दीप जलाने से व्याधि एवम् दृष्टि दोष नष्ट हो जाता है। राजद्वार पर दोप जलाने से बंधनमुक्ति या कारागार से मुक्ति मिलती है ॥३३३॥ पीपल तथा वटवृक्ष के मूल में दीप जलाने से अशेष कार्यों की सिद्धि होती है। वशीकरण, भय, विवाद, घरेलू संकट, रण-संकट, द्यूत, दृष्टि-दोष-निवारण, विद्वेष, मारण, मृतकोत्थापन, प्रतिमाचालन, विष, व्याधि, ज्वर, भूतग्रह, कृत्यामोचन, विस्फोटक, महारण्य, दुर्गम स्थान, बाघ, हाथी तथा भयानक जन्तुओं के भय, बंधनमोचन, पथिक के आगमन, दुष्ट स्थान, राजमोहन और राजद्वार में प्रवेश तथा निर्गमन-इन कार्यों में हनुमान् को दीपदान करने से सफलता मिलती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। ग्यारह, इक्कीस और पिण्ड-तीन प्रकार का मण्डलमान होता है। पाँच, सात अथवा नौ-इन्हें लघुमान कहा गया है ॥३४-४०॥ दीपदान के समय दूध या मक्खन या दही या गोबर से हनुमान् की प्रतिमा बनानी चाहिये। दीवाल पर या वस्त्र पर या पीठ पर वायुनन्दन का ऐसा चित्र बनाये, जो वीर तथा सिंह तुल्य पराक्रमी दिखाई पड़े, जिसका मुख दक्षिण दिशा की
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ६५६ ऋक्षविन्यस्तपादं च किरीटेन विराजितम् । लिखेदिमत्तौ पटे वापि पीठे वा मारुतेः शुभे ॥४३॥ मालामंत्रेण दातव्यं दीपदानं हनूमतः । नित्यदीपः प्रकर्त्तव्यो द्वादशाक्षरविद्यया ॥४४॥ विशेषस्तत्र यस्तं वै दीपदानेऽवधारय । षष्ठ्यादौ च द्वितीयादाविमं दीपमितोरयेत् ॥४५॥ गृहाणेति पदं पश्चाच्छेषं पूर्ववदुच्चरेत् । कूटार्दो नित्यदीपे च मंत्रं सूर्याक्षरं वदेत् ॥४६॥ तत्र मालाद्वयमनुना तत्तत्कार्येषु कारयेत् । गोमयेनोपलिप्तायां भूमौ तद्गतमानसः ॥४७॥ षट्कोणं वमुपत्रं च भूमौ रेखासमन्वितम् । कमलं च लिखेद्भद्रं तत्र दीपं निधापयेत् ॥४८॥ शैवे वा वैष्णवे पीठे पूजयेदंजनासुतम् । कूटषट्कं च षट्कोणे अंतराले परं लिखेत् ॥४६॥ षट्कोणेषु षडंगानि बीजयुक्तानि संलिखेत् । सौम्यं मध्यगतं लेख्यं तत्र संपूज्य मारुतिम् ॥५०॥ षट्कोणेषु षडंगानि नामानि च पुरोक्तवत् । वसुपत्रे क्रमात्पूज्या अष्टावेते च वानराः ॥५१॥ सुग्रीवायांगदायाथ सुषेणाय नलाय च । नीलायाथो जांबवते प्रहस्ताय तथैव च ॥५२॥ सुवेषाय ततः पश्चाद्यजेत्षडंगदेवताः । आदावंजनापुत्राय ततश्च रुद्रमूर्तये ॥५३॥ ततो वायुसुतायाथ जानकीजीवनाय च । रामदूताय ब्रह्मास्त्रनिवारणाय तत्परम् ॥५४॥ पंचोपचारैः संपूज्य देशकालौ च कीर्तयेत् । कुशोदकं समादाय दीपमंत्रं समुच्चरेत् ॥५५॥ उत्तराभिमुखो जप्त्वा साधयेत्साधकोत्तमः । तं मंत्रं कूटघा जप्त्वा जलं भूमौ विनििक्षिपेत् ॥५६॥ ततः करपुटं कृत्वा यथाशक्ति जपेन्मनुम् । अनेन दीपवर्येण उदङ्मुखगतेन वै ॥५७॥ तथा विधेहि हनुमन्ममस्युर्न मनोरथाः । त्रयोदशैव द्रव्याणि गोमयं मृत्तिका मसी ॥५८॥
ओर हो, पैर ऋक्ष (एतन्नामक पर्वत या रीछ ?) पर अवस्थित हो और मस्तक मुकुट से सुशोभित हो । हनुमान् को दीपदान मालामन्त्र से करना चाहिये । परन्तु नित्यदीप का दान द्वादशाक्षर मन्त्र से करे ॥४१-४४॥ अब दीपदान के संबन्ध में जो विशेष बातें हैं, उन्हें सुन लो । षष्ठी, द्वितीया आदि तिथियों में 'यह दीप स्वीकार कीजिये' यह कहकर शेष क्रिया पहिले ही की तरह करनी चाहिये । कूटदीप (राजद्वार आदि पर दिये जाने वाले दीप) तथा नित्यदीप दान करने के समय द्वादशाक्षर मन्त्र को पढ़े । अन्य दीपों के दान में तो माला मन्त्र से ही काम लेना चाहिये । गोबर से लिपी हुई भूमि पर एकाग्रचित्त हो षट्कोण अंकित करे । उसके बाह्य भाग में अष्टदल कमल बनावे तथा उसके बाह्य भाग में भूपुर-रेखा खींचे। उस कमल में दीपक रखे । शैव अथवा वैष्णव पीठ पर अञ्जनीनन्दन हनुमान् की पूजा करे । छह कोणों के अन्तराल में 'ह्रीं ह्स्फें स्फ्रें ह्स्त्रौं हुस्ख्फ्रें ह्सौं' इन छह कूटों का उल्लेख करे ।।४-४६।। छहो कोणों में वीज युक्त षडंग देवताओं का मन्त्र लिख कर मध्य में चन्द्रमन्त्र लिखे । उस पर वायुपुत्र को पूजा कर षट्कोण में षडंगदेवों के नाम भी पूर्वोक्त प्रकार से लिखे । अनन्तर अष्टदल पर सुग्रीव, अंगद, सुषेण, नल, नील, जांबवान, प्रहस्त तथा सुवेष नामक आठो बन्दरों का क्रमशः पूजन करे । तत्पश्चात् षडंगदेवताओं को भी पूजा करनी चाहिये । पहिले अंजनिपुत्र की अर्चना कर क्रमशः रुद्र- मूर्ति, वायुसुत, जानकीजीवन, रामदूत तथा ब्रह्मास्त्रनिवारक का पंचोपचार पूजन करे । तब देश, काल का उच्चारण कर कुश, जल लेकर दीपमन्त्र को पढ़े । उत्तम साधक उत्तर मुंह होकर पाँच बार इस मन्त्र को जप कर भूमि पर जल गिरा दे । तदुपराम्त अंजलि बांध कर यथाशक्ति मन्त्र का जप करते हुए प्रार्थना करे - "हे हनुमान् जो ! इस उत्तराभिमुख मनोरम दोप के दान से मेरे सकल मनोरथ पूर्ण हों।" ॥५०-५७३॥ (हनुमान् की पूजा का दूसरा विधान इस तरह है कि) गांबर, मिट्टी, स्याही, महावर, दरद (खस),
६६० नारदीयपुराणम् अलक्तं दरदं रक्तचंदनं चंदनं मधु । कस्तूरिका दधि क्षीरं नवनीतं घृतं तथा ॥५८॥ गोमयं द्वि विधं तत्र प्रोक्तं गोमहिषीभवम् । पश्चाद्विनष्टद्रव्याप्तौ माहिषं गोमयं स्मृतम् ॥६०॥ पथिकागमने दूरान्महादुर्गस्य रक्षणे । बालादिरक्षणे चैव चौरादिभयनाशने ॥६१॥ स्त्रीवश्यादिषु कार्येषु शस्तं गोगोमयं मुने । भूमिस्पृष्टं न तद्ग्राह्यमंतरिक्षाच्च भाजने ॥६२॥ चतुर्विधा मृत्तिका तु श्वेता पीतारुणासिता । तत्र गोपीचंदनं तु हरितालं च गैरिकम् ॥६३॥ मषी लाक्षारसोद्भूता सर्वं वान्यत्स्फुटं मतम् । कृत्वा गोपीचंदनेन चतुरस्रं गृहं सुधीः ॥६४॥ तन्मध्ये माहिषेणाथ कुर्यान्मूर्ति हनूमतः । बीजं क्रोधाच्च तत्पुच्छं लिखेन्मन्त्री समाहितः ॥६५॥ तैलेन स्नापयेन्मूर्तिं गुडेन तिलकं चरेत् । शतपत्रसमो धूपः शालनिर्याससंभवः ॥६६॥ कुर्याच्च तैलदीपं तु वर्तिपंचकसंयुतम् । दध्योदनेन नैवेद्यं दद्यात्साधकत्तमः ॥६७॥ वारत्रयं कठदेशे सशेषविषमुच्चरन् । एवं कृते तु नष्टानां महिषीणां गवामपि ॥६८॥ दासीदासादिकानां च नष्टानां प्राप्तिरीरिता । चौरादिदुष्टसत्त्वानां सर्पादीनां भये पुनः ॥६९॥ तालेन च चतुर्द्वारं गृहं कृत्वा सुशोभनम् । पूर्वद्वारे गजः स्थाप्यो दक्षिणे महिषस्तथा ॥७०॥ सर्पस्तु पश्चिम द्वारे व्याघ्रश्चैवोत्तरे तथा । एवं क्रमेण खङ्गं च क्षुरिकादण्डमुद्गरान् ॥७१॥ विलिख्य मध्ये मूर्ति च महिषीगोमयेन वै । कृत्वा डमरुहस्तां च चकिताक्षीं प्रयत्नतः ॥७२॥ रक्तचन्दन, चन्दन, मधु, कस्तूरी, दही, दूध, मक्खन और घी--इन तेरह वस्तुओं को एकत्रित करे । जिनमें गोबर गाय या भैंस का होना चाहिये। खोई हुई वस्तु की प्राप्ति के लिये भैंस के गोबर का उपयोग करे और दूर देश से पथिक के आगमन, दुर्ग की रक्षा, बालक आदि की रक्षा, चोर आदि के भयनाश तथा स्त्री वशीकरण आदि कार्यों के लिये गाय का गोबर उपयोग में लाना चाहिए। धरती पर गिरा हुआ गोबर नहीं लेना चाहिए, अपितु (गोबर करते समय) आकाश से ही किसी पात्र में रोक लिये गये गोबर से कार्य करना चाहिए। मृत्तिका चार प्रकार की होनी चाहिए-उजली, पीली, लाल तथा काली। जिनमें गोपीचन्दन, हरिताल और गेरु प्रशस्त मानी गई है ।। ५८-६३।। मसी लाक्षा के रस में बनी होनी चाहिए। अन्य चीजें तो स्पष्ट ही हैं। विद्वान् व्यक्ति गोपी- चन्दन से चौकोर मण्डल का निर्माण कर उसके मध्य में भैंस के गोबर से हनुमान् की मूर्ति बनाये । अनन्तर साधक सावधान होकर बीज और क्रोध (ह्रं) से उनकी पूँछ अंकित करे। फिर मूर्ति को तेल से नहा कर गुड़ से तिलक लगाये। शाल (साखू) के रस से बना धूप, जो कमल के समान सुगंधित हो, हनुमान् को समर्पित करे । उत्तम साधक पाँच बत्तियों से युक्त तेल दीप तथा दही-भात का नैवेद्य समर्पण करे। उस समय वह तीन वार शेष (आ) सहित विष (म्) का उच्चारण करे'। ऐसा करने से खोई भैंस, गाय, दासी एवम् दास की पुनः प्राप्ति हो जाती है । ॥६४-६८॥ चार आदि तथा सर्प आदि दुष्ट जीवों के भय को दूर करने के लिए हरिताल से चार द्वार वाला मनोहर घर बनाये । पूर्व द्वार पर हाथी, दक्षिण द्वार पर भैंस, पश्चिम द्वार पर सांप और उत्तर द्वार पर बाघ की प्रतिमाओं का स्थापित कर उसो क्रम से तलवार, छुरी, दंड तथा मुद्गर का चित्र खींचे। फिर मध्य में भैंस के गोबर से मूर्ति बनाये । जिसके हाथ में डमरू हो और आंखें आश्चर्य-चकित-सी मालूम पड़ती हों। उस मूर्ति की १. 'मा मा मा' इस प्रकार उच्चारण करना चाहिए।
६६१ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः पयसा स्नपनं रक्तचंदनेनानुलेपनम् । जातीपुष्पैस्तु संपूज्य शुद्धधूपं प्रकल्पयेत् ॥७३॥ घृतेन दीपं दत्त्वाथ पायसान्नं निवेदयेत् । गगनं दीपिकेंद्वार्य्यं शास्त्रं च पुरतो जपेत् ॥७४॥ एवं सप्तदिनं कृत्वा मुच्यते महतो भयात् । अनयोर्भौमवारे तु कुर्य्यादारंभमादरात् ॥७५॥ शत्रुसेनाभये प्राप्ते गैरिकेण तु मंडलम् । कृत्वा तदंतरे तालमीषन्नम्रं समालिखेत् ॥७६॥ तवावलंबमानां च प्रतिमां गोमयेन तु । वामहस्तेन तालाग्रं दक्षिणे ज्ञानमुद्रिका ॥७७॥ तालमूलात्स्रवत्काष्ठार्थी मार्गे हस्तमिते गृहम् । चतुरस्रं विधायथ तन्मध्ये मूर्त्तिमालिखेत् ॥७८॥ दक्षिणाभिमुखीं रम्यां हृदये विहितांजलिम् । तोयेन स्नानगंधादि यथासंभवमर्पयेत् ॥७९॥ कृशरान्नं च नैवेद्यं साज्यं तस्यै निवेदयेत् । किलिद्वयं जपं प्रोक्तमेवं कुर्याद्दिने दिने ॥८०॥ एवं कृते भवेच्छीघ्रं पथिकानां समागमः । श्यामपाषाणखण्डेन लिखित्वा भूपतेर्गृहम् ॥८१॥ प्राकारं तु चतुर्द्वारयुक्तं द्वारेषु तत्र वै । अन्योन्यपुच्छपरिधित्रययुक्तां हनूमतः ॥८२॥ कुर्यान्मूर्त्तिं गोमयेन धत्तूरकुसुमैर्यजेत् । जठामांसीभवं धूपं तैल क्तवृतदीपकम् ॥८३॥ नैवेद्यं तिलतैलाक्तसक्षारा माषरोटिका । ध्येयो दक्षिणहस्तेन रोटिकां भक्षयन्हरिः ॥८४॥ वामहस्तेन पाषाणैस्त्रासयन्परसैनिकान् । मारयन्भ्रुकुटीं बद्ध्वा भीषणन्मथयन्स्थितः ॥८५॥ जपेच्च भुकुभुकिति वै सहस्रं ध्यानतत्परः । एवं कृतविधानेन परसैन्यं विनाशयेत् ॥८६॥ रक्षा भवति दुर्गाणां सत्यं सत्यं न संशयः । प्रयोगा बहवस्तत्र संक्षेपादूगदिता मया ॥८७॥ दूध से नहा कर रक्तचन्दन का लेप लगाये ॥६९-७२॥ फिर जूही के फूलों से उसकी अर्चना कर शुद्ध धूप, घृतदीप तथा पायस नैवेद्य समर्पण करते हुए गगन (ह), दीपिका (ऊ) और इन्दु (अनुस्वार) अर्थात् 'हूँ' शस्त्र (फट्) यह आराध्य देवता के आगे जपे । सात दिनों तक ऐसा करने से महाभय का नाश होता है । इन दोनों कार्यों को सिद्धि के लिये मंगल दिन आदरपूर्वक पूजा आरंभ करनी चाहिए। शत्रुसेना का भय उपस्थित होने पर गेरू से मंडल बनाकर उसके भीतर थोड़ा-सा झुका हुआ एक तालवृक्ष का चित्र लिखे। फिर उस वृक्ष से लटकती हुई एक गोबर की प्रतिमा बनाये । जिसके बाँये हाथ में ताल का अग्रभाग और दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा हो । तालमूल से एक हाथ अपनी दिशा में एक चौकोर घर का निर्माण कर उसके मध्य में एक सुन्दर प्रतिमा बनाये ॥७३-७८॥ जिसका मुख दक्षिण दिशा की ओर हो और हाथों की अंजलि हृदय पर बंधी हो । उस मूर्ति को जल से स्नान करा कर यथाशक्ति गंध आदि उपचार समर्पण करे एवम् घी-खीर नैवेद्य चढ़ाये । उसके आगे 'किलि-किलि' का जप बताया गया है। ऐसा प्रति दिन करना चाहिये। ऐसा करने से पथिक शीघ्र आ जाता है। काले पत्थर के टुकड़े से राजगृह का निर्माण कर चार द्वार वालो चहारदीवारी बनाये ॥७९-८१॥ तीन द्वारों पर मंडलाकार में हनुमान् की पूँछ की रेखा खींचे और चौथे द्वार पर गोबर से हनुमान् की मूर्ति बनाये । उस मूर्ति की धतूरे के फूलों से पूजा कर जटामांसी के रस से बना धूप, तेल मिलाये घी का दीपक और उड़द की नमकीन पूरी, जो तिल से बनी हुई हो, नैवेद्य समर्पण करे । तदनन्तर हनुमान् के इस स्वरूप का ध्यान करे कि वे दाहिने हाथ से रोटी खा रहे हैं, बाँयें हाथ में पत्थर के टुकड़े लेकर शत्रुसैनिकों को मार रहे हैं और भ्रुकुटी टेढी करके उन्हें डराते हुए मानो कुचल रहे हैं ॥८२-८५॥ पश्चात् ध्याननिष्ठ होकर "भुकू भुकू" इसका एक सहस्र जप करे । ऐसा करने से शत्रुसेना का नाश और दुर्गों की रक्षा होती है। यह बिल्कुल सत्य है । इसमें संदेह करने की
१६२ नारदीयपुराणम् प्रत्यहं यो विधानेन दीपदानं हनूमतः । तस्यासाध्यं न वै किंचिद्विद्यते भुवनत्रये ॥८८॥ न देयं दुष्टहृदये दुष्टचित्तनबुद्धये । अविनीताय शिष्याय पिशुनाय कदाचन ॥८९॥ कृतघ्नाय न दातव्यं दातव्यं च परीक्षिते । बहुना किमिहोक्तेन सर्वं दद्यात्कपीश्वरः ॥९०॥ अथ मन्त्रान्तरं वक्ष्ये तत्त्वज्ञानप्रदायकम् । तारो नमो हनुमते जाठरत्रयमीरयेत् ॥९१॥ दनक्षोभं समाभाष्य संहरद्वयमीरयेत् । आत्मतत्त्वं ततः पश्चात्प्रकाशयुगं ततः ॥९२॥ वर्मास्त्रवह्निजायांतः सार्द्धषड्विंशदर्णवान् । वसिष्ठोऽस्य मुनिश्चन्दोऽनुष्टुप् च देवताः पुनः ॥९३॥ हनुमान्मुनिसप्ततु वेदाष्टनिगमैः क्रमात् । मंत्रांगैश्च षडंगानि कृत्वा ध्यायेत्कपीश्वरम् ॥९४॥ जानुस्थवामबाहुं च ज्ञानमुद्रापरं हृदि । अध्यात्मचित्तमासीनं कदलीवनमध्यगम् ॥९५॥ बालार्ककोटिप्रतिमं ध्यायेज्ज्ञानप्रदं हरिम् । ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षं दशांशं जुहुयात्तिलैः ॥९६॥ साज्यैः संपूजयेत्पीठे पूर्वोक्ते पूर्ववत्प्रभुम् । जप्तोऽयं मदनक्षोभं नाशयत्येव निश्चितम् ॥९७॥ तत्त्वज्ञानमवाप्नोति कपींद्रस्य प्रसादतः । अथ मंत्रांतरं वक्ष्ये भूतविद्रावणं परम् ॥९८॥ तारः कार्शीकुक्षिपखराहश्चांजनापदम् । पवनो वनपुत्रांते आवेशिद्वयमीरयेत् ॥९९॥ तारः श्रीहनुमत्पश्चाद्वस्वरचभुजाक्षरः । ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छंदोऽत्र देवता पुनः ॥१००॥ हनुमान्कमला बीजं फट् शक्तिः परिकीर्तितः । षड्दीर्घाढ्येन बीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥१०१॥ आंजनेयं पाटलास्यं स्वर्णाद्रिसमविग्रहम् । पारिजातद्रुमूलस्थं चिंतयेत्साधकोत्तमः ॥१०२॥ आवश्यकता नहीं है । मैंने संक्षेप से अनेक प्रयोगों को बता दिया । जो व्यक्ति प्रतिदिन हनुमान् को दीप चढ़ाता है, उसके लिये तीनों लोक में कुछ भी असाध्य नहीं है । यह रहस्य दुष्ट हृदय, दुर्बुद्धि, अविनीत, पिशुन और कृतघ्न व्यक्ति को नहीं बतलाना चाहिए । किसी भी व्यक्ति की अच्छी तरह परीक्षा करके तब बताना चाहिये । बहुत क्या कहें, यह दीपदान करने से हनुमान् जी सब कुछ दे देते हैं ।।८६-९०।। अब मैं तत्त्वज्ञान प्रदान करने वाले दूसरे मन्त्र का वर्णन करूंगा । 'तार (ओं) नमो हनुमते' इतना कहकर तीन बार जाठर (म) का उच्चारण करे । फिर 'दनक्षोभम्' कहकर दो बार 'संहर' यह क्रियापद बोले । उसके बाद 'आत्मतत्त्वम्' बोलकर दो बार 'प्रकाशय' का उच्चारण करे । उसके बाद वर्म (हूँ), अस्त्र (फट्) और वह्निजाया (स्वाहा) का उच्चारण करे । (पूरा मंत्र--ओं नमो हनुमते मम मदनक्षोभं संहर संहर आत्म- तत्त्वं प्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा, यह साढ़े छत्तीस अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि वशिष्ठ, छंद अनुष्टुप् और देवता हनुमान् हैं । सात, सात, छह, चार, आठ तथा चार मंत्राक्षरों द्वारा षडंगन्यास करके कपीश्वर का इस प्रकार ध्यान करे--पवननंदन आजानबाहु हैं । उनके हाथ में ज्ञानमुद्रा सुशोभित है । वह बैठकर सदा अध्यात्मचिन्तन में लगे रहते हैं । केले के वन में विचरण करते हैं। करोड़ों बालसूर्यों के समान उनकी कान्ति है । वे ज्ञानदायक हैं ।' इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मंत्र को जपे और उसका दशांश घृतयुक्त तेल से हवन करे । पूर्वोक्त पीठ पर पहिले ही की तरह महावीर का पूजन करना चाहिये । उक्त मंत्र का जप करने से कामोद्वेग नहीं होता, प्रत्युत हनुमान् की कृपा से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है ।।६१-६७॥ इसके उपरान्त भूतों को छुड़ाने वाला एक अन्य मंत्र बतलाता हूँ, 'ओं श्री महाह्वजनाय पवनपुत्रावेशया- वेशय ओं श्री हनुमते फट् ।' यह पचीस अक्षर का मन्त्र है । इस मन्त्र के मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता हनुमान्, बीज, लक्ष्मी और शक्ति 'फट्' है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर किंचित् रक्तमुख बाले सुवर्ण पर्वत के समान शरीरवाले और पारिजात वृक्ष के मूल में अवस्थित होनेवाले हनुमान् का ध्यान करे।
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ६६३ एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं जुहुयात्तिलैः । त्रिमध्वक्तैर्यजेत्पीठे पूर्वोक्ते पूर्ववत्सुधीः ॥१०३॥ अनेन मनुना मंत्री ग्रहग्रस्तं प्रमार्जयेत् । आक्रंदस्तं विमुच्याथ ग्रहः शीघ्रं पलायते ॥१०४॥ मनवोऽमी सदा गोप्या न प्रकाश्या यतस्ततः । परीक्षिताय शिष्याय देया वा निजसूनवे ॥१०५॥ हनुमद्भजनासक्तः कार्तवीर्यार्जुनं सुधीः । विशेषतः समाराध्य यथोक्तं फलमाप्नुयात् ॥१०६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे दीपविधि निरूपणं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥७५॥
अथषट्सप्ततितमोऽध्यायः नारद उवाच कार्तवीर्यप्रभृतयो नृपा बहुविधा भुवि । जायतेऽथ प्रलीयन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः ॥१॥ तत्कथं राजवर्योऽसौ लोके सेव्यत्वमागतः । समुल्लंघ्य नृपानन्यानेतंन्मे नुद संशयम् ॥२॥
पश्चात् इस मन्त्र का एक लाख जप कर उसका दशांश त्रिमधुयुक्त तिल से हवन करे । फिर पूर्वोक्त पीठ पर पहिले की तरह पूजन कर विद्वान् साधक इस मन्त्र से ग्रहगृहीत व्यक्ति को झाड़ दे। ऐसा करने से ग्रह रोते हुए उस व्यक्ति को छोड़ कर शीघ्र भाग जाता है। ॥६८-१०४॥ ये मन्त्र सदा गोपनीय हैं। यत्र-तत्र इनको प्रकाशित नहीं करना चाहिये । परीक्षित शिष्य या अपने पुत्र को ये बताने चाहिये। हनुमान् के भजन में आसक्त विद्वान् कार्तवीर्यार्जुन की विशेष आराधना करके यथा वर्णित फल को प्राप्त करे ।। १०५-१०६।। श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में दीपविधिनिरूपण नामक पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ।।७५।।
अध्याय ७६ कार्तवीर्य की महिमा नारद बोले-पृथ्वी पर कार्तवीर्य प्रभृति राजा अपने-अपने कर्म के अनुसार उत्पत्ति एवम् लय को प्राप्त करते हैं। तब अन्य राजाओं का अतिक्रमण करके केवल नृपवर कार्तवीर्य ही कैसे लोगों के सेव्य कहलाये ? — यह मेरा संशय है। इसका निराकरण कीजिये ॥१-२॥
६६४ नारदीयपुराणम् सनत्कुमार उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि संदेहविनिवृत्तये । यथा सेव्यत्वमापन्नः कार्तवीर्यार्जुनो भुवि ॥३॥ यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले । दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम् ॥४॥ तस्य क्षितीश्वरेंद्रस्य स्मरणादेव नारद । शत्रूञ्जयति संग्रामे नष्टं प्राप्नोति सत्वरम् ॥५॥ तेनास्य मंत्रपूजादि सर्वतंत्रेषु गोपितम् । तुभ्यं प्रकाशयिष्येऽहं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥६॥ वह्नितारयुता रौद्री लक्ष्मीरग्नींदुशांतियुक् । वेधाघरेन्दुशांत्याढ्यो निद्राशाग्नि बिंदुयुक् ॥७॥ पाशो मायां कुशं पद्मावर्मास्त्रे कार्तवीर्यपद्म । रेफोवा द्यासनेोऽनन्तो वह्निजौ कर्णसंस्थितौ ॥८॥ मेघः सदीर्घः पवनो मनुह्वतो हृदंतिमः । ऊनविंशतिवर्णोऽयं तारादिर्नखवर्णकः ॥६॥ दत्तात्रेयो मुनिश्चास्यच्छन्दोनुष्टुबुदाहृतम् । कार्तवीर्यार्जुनोदेवो बीजशक्तिध्रुवश्च हृत् ॥१०॥ शेषाढ्यबीजयुग्मेन हृदयं विन्यसेदधः । शांतियुक्तचतुर्थेन कामाढ्येन शिरोऽगकम् ॥११॥ इन्द्राढ्यं वामकर्णाद्यमाययोर्वीशयुक्तया । शिखामंकुशपद्माभ्यां सर्वाग्भ्यां वर्म विन्यसेत् ॥१२॥ वर्मास्त्राभ्यामस्त्रमुक्तं शेषाणैर्व्यापकं पुनः । हृदये जठरे नाभौ जठरे गुह्यदेशतः ॥१३॥ दक्षपादे वामपादे सव्थिन जानुनि जंघयोः । विन्यसेद्द्बोजदशकं प्रणवद्वयमध्यगम् ॥१४॥ ताराद्यानथ शेषाणन्मस्तके च ललाटके । भ्रुवोः श्रुत्योस्तथैवाक्ष्णोर्नासि वक्त्रे गलेंऽसके ॥१५॥ सर्वमन्त्रेण सर्वाङ्गे कृत्वा व्यापकमादृतः । सर्वैष्टसिद्धये ध्यायेत्कार्तवीर्यं जनेश्वरम् ॥१६॥ उद्यदर्कसहस्त्राभं सर्वभूपतिवन्दितम् । दोर्भिः पञ्चाशता दक्षैर्बाणान्वामैर्धर्नूषि च ॥१७॥ दधतं स्वर्णमालाद्यं रक्तवस्त्रसमावृतम् । चक्रावतारं श्रीविष्णोध्र्यायेदर्जुनभूपतिम् ॥१८॥ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयात्तिलैः । सतण्डुलैः पायसेन विष्णुपीठे यजेत्तु तम् ॥१९॥ सनत्कुमार बोले- नारद ! पृथ्वो पर जिस प्रकार कार्तवीर्यार्जुन सेव्यत्व को प्राप्त हुए, वह मैं बत- लाता हूँ। तुम सुन कर संदेह मिटा लो। भूतल पर कार्तवीर्य सुदर्शनचक्र का अवतार माने जाते हैं। उन्होंने दत्तात्रेय की आराधना करके उत्तम तेज को प्राप्त किया। नारद ! उस पृथिवीपति के स्मरणमात्र से संग्राम में विजय मिलती है तथा शत्रु शीघ्र नष्ट हो जाता है। इसलिये उनके मंत्र, पूजन आदि समस्त तंत्रों में गुप्त है। आज उस सिद्धिदायक मंत्र को मैं तुमसे बता देता हूँ। "वह्नितारयुतारौद्री......" यह उन्नीस अक्षरों का मंत्र है ॥३-९॥ इसके मुनि दत्तात्रेय, छंद अनुष्टुप्, देवता कार्तवीर्यार्जुन, बीज 'ध्रुव' और शक्ति 'हृत्' है। शेषाढ्यबीजयुग्म से हृदयन्यास, शान्तियुक्त चतुर्थाक्षर से शिरोन्यास, 'इन्द्राढ्यम्' इससे नामकणर्न्यास, अंकुश तथा पद्म से शिखान्यास, वाणी से वर्मन्यास, वर्मास्त्र से अस्त्रन्यास और शेष अक्षरों से पुनः व्यापकन्यास करे, हृदय, उदर, नाभि, गुह्यदेश, दक्षिणपाद, वामपाद, ऊरु, जानु तथा जांघों में प्रणवद्वयमध्यगामी दश बीजों का न्यास करे। तारक आदि नव वर्णां का मस्तक, ललाट, भौंह, कान, नेत्र, नाक, मुख, कण्ठ तथा कन्धे में न्यास करे। पुनः समस्त अंगों में संपूर्ण मन्त्र से व्यापकन्यास कर सकल प्रयोजनों की सिद्धि के लिये जननाथकार्तवीर्य का इस प्रकार ध्यान करे ॥१०-१६॥ कार्तवीर्य की कांति उदित होते हुए सहस्रों सूर्य के समान है। सकलराजगण उनकी वंदना करते हैं। उनके पचास दाहिने हाथों में बाण और पचास बाँयें हाथों में धनुष विद्यमान हैं। वे सोने की माला तथा रक्तवस्त्र धारण किये हुए हैं। ऐसे विष्णु के चक्रावतार राजा अर्जुन का ध्यान कर एक लाख
षट्सप्ततितमोऽध्यायः ६६५ षट्कोणेषु षडंगानि ततो दिक्षु विदिक्षु च । चोरमदविभञ्जनं मारीमदविभंजनम् ॥२०॥ अरिमदविभंजनं दैत्यमदविभंजनम् । दुष्टनाशं दुःखनाशं दुरितापद्विनाशनम् ॥२१॥ दिक्ष्वष्टशक्तयः पूज्याः प्राच्यादिष्वसितप्रभाः । क्षेमंकरी वश्यकरी श्रीकरी च यशस्करी ॥२२॥ आयुःकरी तथा प्रज्ञाकरी विद्याकरी पुनः । धनकर्यष्टमी पश्चाल्लोकेशा अस्त्रसंयुताः ॥२३॥ एवं संसाधितो मंत्रः प्रयोगार्हः प्रजायते । कार्त्तवीर्यार्जुनस्याथ पूजायंत्रमिहोच्यते ॥२४॥ स्वबीजानंगध्रुववाक्कर्णिकं दिग्दलं लिखेत् । तारादिवर्मा तद्दलं शेषवर्णदलांतरम् ॥२५॥ ऊष्मान्त्यस्वरौकजल्कं शेषाणैः परिवेष्टितम् । कोणालंकृतभूतार्णभूगृहं यन्त्रमीशितुः ॥२६॥ शुद्धभूमावष्टगन्धैर्लिखित्वा यन्त्रमादरात् । तत्र कुंभं प्रतिष्ठाप्य तत्रावाह्यार्चयेन्नृपम् ॥२७॥ स्पृष्ट्वा कुम्भं जपेन्मन्त्रं सहस्रं विजितेन्द्रियः । अभिषिञ्चेतदंभाभिः प्रियं सर्वेष्टसिद्धये ॥२८॥ पुत्राञ्यशो रोगनाशमायुः स्वजनरंजनम् । वाक्सिद्धि सुदृशः कुम्भाभिषिक्तो लभते नरः ॥२९॥ शत्रूपद्रव आपन्ने ग्रामे वा पुटभेदने । संस्थापयेदिदं यन्त्रं शत्रुभीतिनिवृत्तये ॥३०॥ सर्षपारिष्टलशुनकार्पासैर्मार्यते रिपुः । धत्तूरैः स्तभ्यते निम्बैर्द्वेष्यते वश्यतैऽम्बुजैः ॥३१॥ उच्चाटने विभीतस्य समिद्भिः खदिरस्य च । कटुतैलमहिष्याज्यैर्होमद्रव्यांजनं स्मृतम् ॥३२॥ यवैर्हुते श्रियः प्राप्तिस्तिलैराज्यैरघक्षयः । तिलतंडुलसिद्धार्थजालैर्वश्यो नृपो भवेत् ॥३३॥ मन्त्र जप करे और उसका दशांश तिल-चावल से हवन करे। अनन्तर विष्णुपोठ पर उनका पूजन कर षट्- कोण तथा दिशा-विदिशाओं में षडंग देवताओं की पूजा करे। ऐसा करने से चोरमद, नारोमद, शत्रुमद, दैत्य- मद, दुष्ट, दुःख तथा पाप का नाश होता है ॥१७-२१॥ पुनः पूर्व आदि दिशाओं में आठ कृष्ण वर्ण शक्तियों की पूजा करे। क्षेमंकरी', वश्यकरो, श्रीकरी, यशस्करी, आयुःकरी, प्रज्ञाकरी, विद्याकरी और धनकर्यष्टमी ये आठों लोकपालिकायें शक्ति कहलाती हैं। पश्चात् अस्त्र समेत लोकपालों की पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार मन्त्र की साधना करने पर ही वह प्रयोग में लाया जा सकता है ॥२२-२३॥ अब कार्त्तवीर्यार्जुन का पूजायंत्र बतलाता हूँ। बीजमंत्र, काम, ध्रुव, वाक् तथा कर्णिका सहित दिक्पत्र लिखे। उसमें स्वरवर्ण कमल का अंतिम पत्र होता है, शेष वर्ण अन्य पत्र होते हैं। श ष स ह और ओ वर्ण उस कमल के (केसर) हैं, शेष वर्षों से वह परिवेष्टित है। कोण से अलंकृत चौदह वर्णों का भू-गृह यंत्र कार्त्तवीर्य का माना गया है। २४-२६॥ पवित्र भूमि पर अष्ट गंधों से आदरपूर्वक लिखकर घट स्थापन करे। उस घट पर कार्त्तवीर्य का आवाहन करके पूजन करे। तदनन्तर घट स्पर्श करके इन्द्रियसंगमपूर्वक एक हजार मन्त्र जप करके उस जल से अभिषेक (स्नान) करे। ऐसा करने से सकल कामनायें सफल होती हैं। उस जल से अभिषिक्त मानव पुत्र, यश, आरोग्य, लोकांप्रयता, वाक्सिद्धि तथा सुन्दर दृष्टि प्राप्त करता है। यदि शत्रु का उपद्रव बढ़ जाय तो उसकी निवृत्ति के लिये गाँव या नगर में इस यंत्र को स्थापना करनी चाहिये। (उक्त मंत्र को पढ़कर) सरसों, नीम, लशुन तथा कपास से होम करने से शत्रु भाग जाता है ॥२७-३०॥ धतूरों से होम करने से शत्रु का स्तंभन होता है। नीम से हवन करने पर (शत्रु को आपस में) द्वेष होता है। कमल से होमने पर वशीकरण होता है। बहेड़े तथा खैर की लकड़ी और कड़ुआ तेल एवम् भैंस के घी से होम करने से उच्चाटन होता है। यव से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति और घृतमिश्रित तिल से पाप का क्षय होता है। तिल, चावल तथा श्वेत सरसों से होम करने से राजा वशीभूत होता है। अपामार्ग (चिचड़ा) तथा ८४ ना० पु०
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६६६ नारदीयपुराणम् अपामार्गार्कदूर्वाजां होमो लक्ष्मीप्रदोऽघनुत् । स्त्रीवश्यकृत्प्रियंगूणां मुराणां भूतशांतिदः ॥३४॥ अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवटबिल्वसमुद्भवाः । समिधो लभते हुत्वा पुत्रानायुर्द्धनं सुखम् ॥३५॥ निर्मोकहेमसिद्धार्थलवणैश्चौरनाशनम् । रोचनागोमयैस्तम्भो भूप्राप्तिः शालिमिर्हुतैः ॥३६॥ होमसंख्या तु सर्वत्र सहस्रादयुतावधि । प्रकल्पनीया मन्त्रज्ञैः कार्यगौरवलाघवात् ॥३७॥ कार्तवीर्यस्य मन्त्राणामुच्यते लक्षणं बुधाः । कार्तवीर्यार्जुनं ङेन्तं सर्वमंत्रेषु योजयेत् ॥३८॥ स्वबीजाद्यो दशार्णोऽसौ अन्ये नवशिवाक्षराः । आद्यबीजद्वयेनासी द्वितीयो मन्त्र ईरितः ॥३९॥ स्वकामाभ्यां तृतीयोऽसौ स्वभ्रूभ्यां तु चतुर्थकः । स्वपाशाभ्यः पञ्चमोऽसौ षष्ठः स्वेन च मायया ॥४०॥ स्वांकुशाभ्यां सप्तमः स्यात्स्वरमाभ्यामथाष्टमः । स्ववाग्भवाभ्यां नवमो वर्मास्त्राभ्यामथांतिमः ॥४१॥ द्वितीयादिनवांतेषु बीजयोः स्याद्वयतिक्रमः । मंत्रे तु दशमे वर्णा नववर्मस्त्वमध्यगाः ॥४२॥ एतेषु मंत्रवर्यैषु स्वानुकूलं मनुं भजेत् । एषामाद्ये विराट्छंदोऽन्येषु त्रिष्टुबुदाहृतम् ॥४३॥ दश मंत्रा इमे प्रोक्ता यदा स्युः प्रणवादिकाः । तदादिमः शिवार्णः स्यादन्ये तु द्वादशाक्षराः ॥४४॥ त्रिष्टुप् छन्दस्तथाद्ये स्यादन्येषु जगती मता । एवं विंशतिमंत्राणां यजनं पूर्ववन्मतम् ॥४५॥ दीर्घाढचमूलबीजेन कुर्यादेषां षडंगकम् । तारो हृत्कार्तवीर्यार्जुनाय वर्मास्त्रठद्वयम् ॥४६॥ चतुर्दशार्णो मंत्रोऽयमस्येज्या पूर्ववन्मता । मूनैत्रसमनेत्राक्षिवर्णैरस्यांगपंचकम् ॥४७॥ तारो हृद्भगवान् ङेन्तः कार्तवीर्यार्जुनस्तथा । वर्मास्त्राग्निप्रियामंतः प्रोक्तो ह्यष्टादशार्णकः ॥४८॥
दूर्वा से हवन करने से श्रीप्राप्ति तथा पाप क्षय होता है। प्रियंगु (कंगनी) से होमने से स्त्री वशीभूत होती है। मुरा से होम करने से भूतोपद्रव शान्त होता है ॥३१-३४॥ पीपल, गूलर, वट तथा बिल्व की समिधा से होम करने से पुत्र, आयु, धन, सुख की प्राप्ति होती है। निर्मोक (सर्पकंचुक), सुवर्ण, श्वेत सरसों तथा नमक से हवन करने से चोर का नाश होता है। गोरोचन तथा गोबर से होमने से स्तंभन होता है। चावल से होमने से भूमि- प्राप्ति होती है। मन्त्रज्ञाता पुरुष कार्य की लघुता एवम् गुरुता को दृष्टि में रखते हुए एक हजार से दस हजार तक मन्त्र का जप करे ॥३५-३७॥ कार्तवीर्य के मन्त्रों का लक्षण बुधगण इस तरह बतलाते हैं कि समस्त मन्त्रों में 'कार्तवीर्यार्जुनाय' यह पद जोड़ना चाहिए। "स्वबीज........." यह दश अक्षरों का पहिला मन्त्र है। आद्य दोनों बीज मन्त्र ही द्वितीय मन्त्र कहे गए हैं। "स्वकामाभ्याम्" यह तीसरा मन्त्र है। स्वभ्रूभ्याम्" यह चौथा है। "स्वपाशाभ्याम्" यह पाँचवाँ, "स्वेन च मायया" यह छठा, "स्वांकुशाभ्याम्" यह सातवाँ, "स्वरमाभ्याम्" यह आठवाँ, "स्ववाग्भवाभ्याम्" यह नवाँ और "वर्मास्त्राभ्याम्" यह दशवाँ मन्त्र है। द्वितीय मन्त्र से लेकर नवें तक दोनों बीजो का व्यतिक्रम होता है। दशम मन्त्र में नौ कवचों के मध्यवर्ती वर्ण होने चाहिए। इन उत्तम मन्त्रों में जो अपने अनुकूल मालूम पड़े, उसका जप करना चाहिए ॥३८-४२॥ इनमें प्रथम मन्त्र का छन्द विराद् है और दूसरों का त्रिष्टुप् । ये दशों मन्त्र जब प्रणव से युक्त होते हैं तब आदिम मन्त्र ग्यारह अक्षरों का और अन्य बारह अक्षरों के होते हैं। तथा आद्य मन्त्र का छन्द त्रिष्टुप् और अन्यों का जगती छन्द होता है। इस तरह बीसों मन्त्रों की अर्चना पूर्ववत् करनी चाहिए। मन्त्र दीर्घ मात्रा से सम्पन्न हैं। मूलबीज से इनका षडंगन्यास करना चाहिए। "तार......" यह चौदह अक्षरों का मन्त्र है। इसकी भी उपासना पहिले की तरह करनी चाहिए। नौ अक्षरों से इसका पंचांगन्यास किया जाता है। "तारो हृत्......"यह अठारह अक्षरों का मन्त्र है। अट्ठारहों अक्षरों से इसका पंचांगन्यास करना चाहिए।
६६७ षट्सप्ततितमोऽध्यायः त्रिवेदसप्तयुग्माक्षिवर्णैः पंचांगकं मनोः । नमो भगवते श्रोति कार्तवीर्यार्जुनाय च ॥४६॥ सर्वदुष्टांतकायेति तपोबलपराक्रमः । परिपालितसप्तांते द्वीपाय सर्वरापदम् ॥५०॥ जन्यचूडामणांते ये महाशक्तिमते ततः । सहस्रदहनप्रांते वर्मस्त्रांतो महामनुः ॥५१॥ त्रिषष्टिवर्णवान्प्रोक्तः स्मरणात्सर्वविघ्नहृत् । राजन्यचक्रवर्ती च वीरः शूरस्तृतीयकः ॥५२॥ माहिष्मतीपतिः पश्चाच्चतुर्थः समुदीरितः । रेवांबुपरितृप्तश्च काणो हस्तप्रबाधितः ॥५३॥ दशास्येति च षड्भिः स्यात्पदैर्ङेन्तैः षडंगकम् । सिच्यमानं युवतिभिः क्रीडंतं नर्मदाजले ॥५४॥ हस्तैर्जलौघं रुंधंतं ध्यायेन्मत्तं नृपोत्तमम् । एवं ध्यात्वा युतं मंत्रं जपेदन्यत्तु पूर्ववत् ॥५५॥ पूर्वं तु प्रजपेल्लक्षं पूजायोगश्च पूर्ववत् । कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् ॥५६॥ तस्य संस्मरणादेव हृतं नष्टं च संवदेत् । लभ्यते मंत्रवर्येोऽयं द्वात्रिंशद्वर्णसंयुतः ॥५७॥ पादैः सर्वेण पंचांगं ध्यानपूजावि पूर्ववत् । कार्तवीर्याय शब्दांते विद्महे पदमुच्चरेत् ॥५८॥ महावीर्याय वर्णांते धीमहीति पदं वदेत् । तन्नोऽर्जुनः प्रवणान्ते चोदयात्पदमीरेयेत् ॥५९॥ गायत्र्येषाऽर्जुनस्योक्ता प्रयोगादौ जपेत्तु ताम् । अनुष्टुभं मनुं रात्रौ जपतां चौरसंचयाः ॥६०॥ पलायंते गृहाद्दूरं तर्पणाद्धवनादपि । अथो दीपविधिं वक्ष्ये कार्तवीर्यप्रियंकरम् ॥६१॥ वैशाखे श्रावणे मार्गे कार्तिकाश्विनपौषतः । माघफाल्गुनयोर्मासोर्दीपांरभं समाचरेत् ॥६२॥ तिथौ रिक्ताविहीनायां वारे शनिकुजौ विना । हस्तोत्तराश्विरौद्रेयपुष्यवैष्णववायुभे ॥६३॥ द्विदैवते च रोहिण्यां दीपारंभो हितावहः । चरमे च व्यतीपाते धृतौ वृद्धौ सुकर्मणि ॥६४॥ प्रीतौ हर्षं च सौभाग्ये शोभनायुष्मतोराप । करणे विष्टिरहिते ग्रहणेऽर्कोदयादिषु ॥६५॥ "नमो भगवते......"यह तिरसठ अक्षरों का मन्त्र है। इसके स्मरण मात्र से विघ्नों का नाश होता है। "राजन्य-चक्रवर्ती......" इस मन्त्र के छह पदों से षडंगन्यास करके ध्यान करे कि नर्मदा के जल में स्नान करते हुए कार्तवीर्य युवतियों के साथ जलकेलि कर रहे हैं। और क्रीड़ोन्मत्त होकर हाथों से जलतरंग को रोकते हैं। ऐसे नृपवर का ध्यान कर दश हजार मन्त्र-जप करे और अन्य कार्य पूर्ववत् ही करे। पहिले एक लाख मन्त्र का जप कर पूजा आदि यथापूर्वं करनी चाहिए। "कार्तवीर्यार्जुनः............"यह बत्तीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके समस्त पादों से पंचांगन्यास कर ध्यान, पूजन आदि पूर्ववत् ही करना चाहिए। "कार्तवीर्याय" इसके अन्त में "विद्महे" और "महावीर्याय धीमहि, तन्नोऽर्जुनः प्रचोदयात्" इतने को जोड़ देने से अर्जुनगायत्री बन जाती है। इसको प्रयोग के आदि में जपना चाहिये। रात्रि में इसके जप करने से चोर घर से दूर भाग जाते हैं। इससे तर्पण तथा हवन करने से भी यही फल होता है ॥४३-६० १/२॥ अब मैं दीप का विधान बतलाऊंगा, जो कार्तवीर्य को अत्यन्त प्रिय है। वैशाख, श्रावण, अगहन, कार्तिक, आश्विन, पौष, माघ तथा फाल्गुन मास में दीपारंभ करना चाहिए। रिक्ता' विहीन तिथि, शनि और मङ्गल रहित दिन, हस्त, उत्तराषाढ, अश्विनी, रौद्रेय, पुष्य, वैष्णव, वायु तथा द्विदैवताक नक्षत्र और रोहिणी नक्षत्र में दीपारंभ कल्याणकारक होता है। चरम, व्यतीपात, धृति तथा वृद्धि, प्रीति, हर्ष, सौभाग्य, शोभन, तथा आयुष्मान् नामक योग में, विष्टि रहित करण में, ग्रहणों में तथा अर्कोदय आदि योग में पूर्व रात्रि के समय दीपारंभ करना १. चौथ, चतुर्दशी, नवमी-ये रिक्ता कहलाती हैं।
६६८ नारदीयपुराणम् योगेषु रात्रौ पूर्वाह्ने दीपारंभः कृतः शुभः । कार्तिके शुक्लसप्तम्यां निशीथेऽतीव शोभनः ॥६६॥ यदि तत्र रवेर्वारः श्रवणं भं च दुर्लभम् । अत्यावश्यककार्येषु मासादीनां न शोधनम् ॥६७॥ आद्ये ह्युपोष्य नियतो ब्रह्मचारी सपीतकैः । प्रातः स्नात्वा शुद्धभूमौ लिप्तायां गोमयोदकैः ॥६८॥ प्राणानायम्य संकल्प्य न्यासान्पूर्वोदितांश्चरेत् । षट्कोणं रचयेद्भूभौ रक्तचंदनतंडुलैः ॥६९॥ अतः स्मरं समालिख्य षट्कोणेषु समालिखेत् । नवार्णैर्वेष्टयेत्तच्च त्रिकोणं तद्बहिः पुनः ॥७०॥ एवं त्रिलिखिते यन्त्रे निदध्याद्दीपभाजनम् । स्वर्णजं रजतॊत्थं वा ताम्रजं तदभावतः ॥७१॥ कांस्यपात्रं मृन्मयं च कनिष्ठं लोहजं मृतौ । शांतये मुद्गचूर्णोत्थं संधौ गोधूमचूर्णजम् ॥७२॥ आज्ये पलसहस्रे तु पात्रं शतपलं स्मृतम् । आज्येऽयुतपले पात्रं पलपंचशता स्मृतम् ॥७३॥ पंचसप्ततिसंख्ये तु पात्रं षष्टिपलं स्मृतम् । त्रिसहस्त्री घृतपले शर्करापलभाजनम् ॥७४॥ द्विसाहस्र्यां द्विशतमितं च भाजनमिष्यते । शतेऽकिंचरसंख्यातमेवमन्यत्र कल्पयेत् ॥७५॥ नित्यदीपे वह्निपलं पात्रमाज्यं पलं स्मृतम् । एवं पात्रं प्रतिष्ठाप्य वर्तीः सुवोत्थिताः क्षिपेत् ॥७६॥ एका तिस्रोऽथवा पंचसप्ताद्या विषमा अपि । तिथिमानादासहस्रं तंतुसंख्या विनिर्मिता ॥७७॥ गोघृतं प्रक्षिपेत्तत्र शुद्धवस्त्रविशोधितम् । सहस्रपलसंख्यादिदशांशं कार्यगौरवात् ॥७८॥ सुवर्णादिकृतां रम्यां शलाकां षोडशांगुलाम् । तदर्द्धा वा तदर्द्धा वा सूक्ष्माग्रां स्थूलमूलिकाम् ॥७९॥ शुभदायक है। कार्तिक-शुक्ल-सप्तमी को रात्रि में दीपारंभ अत्यन्त शोभन है। यदि उस दिन रविवार तथा श्रवण नक्षत्र पड़ जाय तो सोने में सुगंध समझो। अत्यावश्यक कार्यों में मास आदि का विचार नहीं करना चाहिए ॥६१-६७॥ प्रथम दिन ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए उपवास करके दूसरे दिन प्रातःकाल स्नानोपरान्त भूमि को गोवर से लीप-पात कर पवित्र करे। अनन्तर प्राणायाम तथा संकल्प करके पूर्वोक्त प्रकार से न्यास करे। फिर भूमि पर रक्तचंदन तथा चावल से षट्कोण का निर्माण कर उस पर काम का चित्र खींचे। उस चित्र को नव अक्षरों से वेष्टित कर बाहर त्रिकोण की रचना करे, इस तरह यंत्र लिख जाने पर उसके ऊपर दीप पात्र को स्थापित करे। दीपत्र सुवर्ण या चांदी या तांबे का होना चाहिये। यदि वे न मिलें तो काँसा या मिट्टी का पात्र बनाये, मारण कार्य के लिये लौह का, शान्तिकार्य के लिये मूंग के पिसान का, और संधिकार्य के लिये गेहूँ के आटे का दीप पात्र बनाना चाहिये । ६८-७२॥ यदि सहस्र पल परिमित घी हो तो (पात्र के लिये) एक सौ पल के हिसाब से द्रव्य होना चाहिये। दस हजार पलपरिमित घी के लिये पाँच सौ पल के परिमाण में द्रव्य होना चाहिये, पचहत्तर पलपरमित घी के लिये साठ पल द्रव्य, तीन हजार पल घी के लिये सत्रह सौ पल द्रव्य, दो हजार पल घी के लिये दो सौ पल द्रव्य और सौ पल घी के लिये दस पल द्रव्य आवश्यक है। नित्य दीप के लिये तीन द्रव्य का पात्र और एक पल घी होना चाहिये। इस तरह पात्र की प्रतिष्ठा कर सूत की बनी बत्तियां उसमें डाले ॥७३-७६॥ बत्तियों की संख्या एक या तीन या पाँच या सात होनी चाहिये। बत्ती के तंतुओं की संख्या पन्द्रह से लेकर एक हजार तक अपेक्षित है। दीप में गाय का घी डालना चाहिये, जो पहले वस्त्र से छान लिया गया हो। कार्यगौरव की दृष्टि से सहस्र पलपरिमित घी पात्र में छोड़े। उसमें एक सुवर्ण की बनाई हुई सोलह अगुलियों की रमणीय शलाका भी रखे। शलाका सोलह या आठ या चार ही अंगुलियों की होनी चाहिये; परन्तु उसका अग्रभाग सूक्ष्म और आदि भाग स्थूल हो ॥७७-७९॥ उस शलाका को पात्र के मध्य में
षट्सप्ततितमोऽध्यायः ६६६ विमुंचेद्दक्षिणे पात्रमध्ये चाग्रे कृताग्निकाम् । पात्रदक्षिणदिग्देशे मुक्त्वांगुलचतुष्टयम् ॥८०॥ अधोग्रां दक्षिणाधारां निखनेच्छुरिकां शुभाम् । दीपं प्रज्वालयेत्तत्र गणेशस्मृतिपूर्वकम् ॥८१॥ दीपात्पूर्वेत्त दिग्भागे सर्वतोभद्रमंडले । तंडुलाष्टदले वापि विधिवत्स्थापयेद्घटम् ॥८२॥ तत्रावाह्य नृपाधीशं पूजयेत्पूर्ववत्सुधीः । जलाक्षतान्समादाय दीपं संकल्पयेत्ततः ॥८३॥ दीपसंकल्पमंत्रोऽयं कथ्यते द्विषद्भूमितः । प्रणवः पाशमाये च शिखा कार्ताक्षराणि च ॥८४॥ वीर्यार्जुनाय माहिष्मतीनाथाय सहस्र च । बाहवे इति वर्णांते सहस्रपदमुच्चरेत् ॥८५॥ ऋतुदीक्षितहस्ताय दत्तात्रेयप्रियाय च । आत्रेयायानुसुयांते गर्भरत्नाय तत्परम् ॥८६॥ नमो ग्रीवामकण्ठेदुस्थितौ पाश इमं ततः । दीपं गृहाण अमुकं रक्ष रक्ष पदं पुनः ॥८७॥ दुष्टान्नाशययुग्मं स्यात्तथा पातय घातय । शत्रून् जहि द्वयं माथा तारः स्वं वोजमात्मभूः ॥८८॥ वह्निप्रिया अनेनाथ दीपवर्येण पश्चिमा । भिमुखेनामुकं रक्ष अमुकांते वरप्रद ॥८९॥ मायाकाशद्वयं वामनेत्रचंद्रयुतं शिवा । वेदान्तिकामच्वामुंडाः स्वाहा तु पूर्वबिंदुकौ ॥९०॥ प्रणवोऽग्निप्रिया मंत्रो नेत्रबाणाधराक्षरः । दत्तात्रेयो मुनिर्मालामंत्रस्य परिकीर्तितः ॥९१॥ छन्दोऽमितं कार्तवीर्यार्जुनो देवोऽखिलाप्तिकृत् । चामुंडया षडंगानि चरेत्खड्गीर्घयुक्तया ॥९२॥ ध्यात्वा देवं ततो मंत्रं पठित्वाऽन्ते क्षिपेज्जलम् । गोविंदाढ्यो हली सेंदुश्चामुं डाबीजमीरितम् ॥९३॥ ततो नवाक्षरं मंत्रं सहस्रं तत्पुरो जपेत् । तारोऽनंतो बिंदुयुक्तो मायास्वं वामनेत्रयुक् ॥९४॥ कूर्माग्नी शांतिबिद्वाद्व्यो वह्नि जा यांकुशं ध्रुवम् । ऋषिः पूर्वोदितोऽनुष्टुप्छंदोऽन्यत्पूर्ववत्पुनः ॥९५॥ सहस्रं मंत्रराजं च जपित्वा कवचं पठेत् । एवं दीपप्रदानस्य कर्ताप्नोत्यखिलेऽप्सितम् ॥९६॥ दीपप्रबोधकाले तु वर्जयेदशुभां गिरम् । विप्रस्य दर्शनं तत्र शुभदं परिकीर्तितम् ॥९७॥ शूद्राणां मध्यमं प्रोक्तं म्लेच्छस्य वधबन्धनम् । आख्वोत्वोदर्शनं दुष्टं गवाश्वस्य सुखावहम् ॥९८॥ उलटा करके छोड़ दे । पात्र से दक्षिण चार अंगुलि हटकर भूमि में एक सुन्दर छुरो को दक्षिणाधार तथा निम्न मुख करके गाड़ दे और वहाँ गणेश का स्मरण करते हुए दीप जलाये, दीप से पूर्व दिशा में सर्वतोभद्र मंडल या तंडूलचूर्ण से अष्टदल बनाकर उस पर विधिपूर्वक घट-स्थापना करे । विद्वान् व्यक्ति उस घट पर राजराज का आवाहन कर पूर्ववत् उनकी पूजा करे । फिर जल-अक्षत लेकर दीप के लिये संकल्प करे ॥८०-८३॥ दीप संकल्प का यह मन्त्र है--"प्रणवः... स्वाहा" । इसमें आठ अक्षर हैं । दत्तात्रेय इसके मुनि हैं, अनुष्टुप् छन्द है और कार्तवीर्यार्जुन देवता हैं; जो सकल कामनाओं को सफल करनेवाले हैं। वह दीर्घ मात्राओं से युक्त चामुण्डा- मन्त्र से षडंगन्यास कर कार्तवीर्य देव का ध्यान करे और मन्त्र को पढ़ कर अन्त में जल हाथ से गिरा दे । "गोविन्दाढ्य....." यह चामुण्डाबीज मन्त्र है। इसके बाद नवाक्षर मंत्र का एक हजार जप करना चाहिये । "तारोऽनन्तः ...." यह नवाक्षर मन्त्र है। इसके ऋषि दत्तात्रेय, छंद अनुष्टुप् और देवता आदि पूर्ववत् समझना चाहिये । इस मन्त्रराज का एक सहस्र जप कर कवच का पाठ करना चाहिये । उक्त रीति से दीपदान करनेवाला व्यक्ति अभीष्ट फल को प्राप्त करता है॥८४-९६॥ दीप जलाने के समय अशुभ बात नहीं बोलनी चाहिये। उस समय ब्राह्मण का दर्शन शुभ माना गया है; शूद्रों का दर्शन मध्यम तथा म्लेच्छों का वधकारक या बंधनकारक होता है। चूहे तथा बिलाड को देखना दुःखदायक है; किन्तु गाय एवं घोड़े को देखना सुखकारक है। दीप की ज्वाला यदि सीधी हो तो सिद्धि मिलती है, परन्तु टेढ़ी होने पर नाश होता है ॥९७-९८३॥
६७० नारदीयपुराणम् दीपज्वाला समा सिद्धयै वक्रा नाशविधायिनी । शब्दा भयदा कर्तुरुज्ज्वला सुखदा मता ॥६६॥ कृष्णा शत्रुभयोत्पत्त्यै घमंती पशुनाशिनी । कृते दीपे यदा पात्रं भग्नं दृश्येत दैवतः ॥१००॥ पक्षादर्वाक्तदा गच्छेद्यजमानो यमालयम् । वत्त्यन्तरं यदा कुर्यात्कार्यं सिद्धचेद्विलंबतः ॥१०१॥ नेत्रहीनो भवेत्कर्ता तस्मिन्दीपांतरे कृते । अशुचिस्पर्शने व्याधिर्दीपनाशे तु चौरभीः ॥१०२॥ श्वमार्जारारखुसंस्पर्शे भवेद्भूतितो भयम् । पात्रांरंभे वसुपलैः कृतो दीपोऽखिलेष्टदः ॥१०३॥ तस्माद्दीपः प्रयत्नेन रक्षणीयोंऽतरायतः । आसमाप्तेः प्रकुर्वीत ब्रह्मचर्यं च सुशयः ॥१०४॥ स्त्रीशूद्रपतितादीनां संभाषणमपि वर्जयेत् । जपेत्सहस्रं प्रत्येकं मंत्रराजं नवाक्षरम् ॥१०५॥ स्तोत्रपाठं प्रतिदिनं निशीथिन्यां विशेषतः । एकपादेन दीपाग्रे स्थित्वा यो मंत्रनायकम् ॥१०६॥ सहस्रं प्रजपेद्रात्रौ सोऽभीष्टं क्षिप्रमाप्नुयात् । समाप्य शोभनदिने संभोज्य द्विजसत्तमान् ॥१०७॥ कुंभोदकेन कर्तारमभिषिञ्चन्मनुं जपेत् । कर्ता तु दक्षिणां दद्यात्पुष्कलां तोषहेतवे ॥१०८॥ गुरौ तुष्टे वदातीष्टं कृतवीर्यसुतो नृपः । गुर्वाज्ञया स्वयं कुर्याद्यदि वा कारये द्गुरुः ॥१०६॥ दत्त्वा धनादिकं तस्मै दीपदानाय नारद । गुर्वाज्ञामन्तरा कुर्याद्यो दीपं स्वेष्टसिद्धये ॥११०॥ सिद्धिर्न जायते तस्य हानिरव पदे पदे । उत्तमं गोघृतं प्रोक्तं मध्यमं महिषीभवम् ॥१११॥ तिलतैलं तु तार्क स्यात्कनीयोऽजादिजं घृतम् । आस्यरोगे सुगंधेन दद्यात्तैलेन दीपकम् ॥११२॥ सिद्धार्थसंभवेनाथ द्विषां नाशनाय च । सहस्रेण पलैर्दीपे विहिते च न दृश्यते ॥११३॥ शब्द करने वाली ज्वाला भय देती है और उज्ज्वलवर्णा ज्वाला सुखदायिका मानी गई है। ज्वाला यदि कृष्णवर्ण की हो तो शत्रु भय होता है और भक्-भक् करने वाली ज्वाला पशुओं का नाश करती है। दीप जलाने के बाद यदि संयोग से पात्र टूटा दीख पड़े तो समझ लेना चाहिए कि एक पक्ष के भीतर ही यजमान यमालय पहुँच जाएगा। यदि दीप में दूसरी बत्ती डालनी पड़े तो कार्य विलम्ब से होगा। दीप बदलने से कर्ता अन्धा होता है। अशुचि अवस्था में दीपस्पर्श करने से रोग होता है। दीप के नष्ट हो जाने पर चोरों का भय होता है ॥९९-१०२॥ कुत्ते, बिलाड़ तथा चूहे से छू जाने पर राजभय जानना चाहिए। आठ पलपरिमित द्रव्य के पात्र बनाने से दीप संपूर्ण कामनाओं को सफल करता है। उपर्युक्त कारणों से दीप को समस्त विघ्नों से यत्न- पूर्वक बचाना चाहिए। जब तक व्रत समाप्त न हो तब तक ब्रह्मचर्यपूर्वक भूमि पर सोना चाहिए। उतने दिनों तक स्त्री, शूद्र तथा पतित व्यक्तियों से संभाषण न करे। नवाक्षर मन्त्रराज का प्रत्येक दिन सहस्र बार जप तथा स्तोत्रपाठ करना चाहिए। रात्रि में विशेषपूर्वक स्तुतिपाठ करना चाहिए। रात्रि में जो साधक दीप के आगे एक पैर पर खड़ा होकर सहस्र बार मन्त्रराज का जप करता है, उसका अभीष्ट शीघ्र सिद्ध होता है ॥१०३-१०६॥ शुभ दिन में व्रत समाप्त कर ब्राह्मण भोजन करा कर घट के जल से मन्त्रजप पुरस्सर यजमान का अभिषेक करे। यजमान गुरु के संतोषार्थ प्रचुर दक्षिणा दे। गुरु के संतुष्ट होने पर राजा कार्तवीर्य वांछित फल देते हैं। गुरु की आज्ञा लेकर स्वयं दीपदान करे। यदि गुरु से कराये तो दीपदान के लिये उन्हें धन आदि दे। नारद ! जो व्यक्ति बिना गुरु की आज्ञा लिये अपनी इष्ट-सिद्धि के निमित्त दीपदान करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती; अपितु पग-पग में हानि होती है। (इस कार्य के लिये) गाय का घी उत्तम और भैंस का मध्यम माना गया है। तिल का तेल तो महिषीघृत के ही बराबर है। बकरी आदि का घृत अधम कहा गया है ॥१०७- १११॥ मुखरोग को छुड़ाने के लिये सुगंधित तेल दीप में डालना चाहिए। शत्रुओं के नाश के लिये श्वेत सरसों का तेल छोड़े। सहस्र पलपरिमित द्रव्य का दीपपात्र बनाने पर भी यदि कार्य सिद्ध न हो तो तीन बार
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ६७१ कार्यसिद्धिस्तदा कुर्यात्त्रिवारं दीपजं विधिम् । तदा सुदुर्लभमपि कार्यं सिद्धयेन्न संशयः ॥११४॥ दीपप्रियः कार्तवीर्यो मार्तण्डो नतिवल्लभः । स्तुतिप्रियो महाविष्णुर्गणेशस्तर्पणप्रियः ॥११५॥ दुर्गार्चनप्रिया नूनमभिषेकप्रियः शिवः । तस्मात्तेषां प्रतोषाय विदध्यात्तत्तदादरात् ॥११६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे कार्तवीर्यमाहात्म्यमन्त्रदीपकथनं नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥११७॥ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः नारद उवाच साधु साधु महाप्राज्ञ सर्वतंत्रविशारद । त्वया मह्यं समाख्यातं विधानं तन्त्रगोपितम् ॥१॥ अधुना तु महाभाग कार्तवीर्यहनूमतोः । कवचे श्रोतुमिच्छामि तद्वदस्व कृपानिधे ॥२॥ सनत्कुमार उवाच शृणु विप्रेन्द्र वक्ष्यामि कवचं परमाद्भुतम् । कार्तवीर्यस्य येनासौ प्रसन्नः कार्यसिद्धिकृत् ॥३॥ दीपविधि (दीपदान) करनी चाहिए । तब अत्यन्त दुर्लभ कार्य भी सिद्ध हो जायगा, इसमें संशय नहीं । कार्तवीर्य दीपदान करने से संतुष्ट होते हैं, सूर्य नमस्कार से, महाविष्णु स्तुति से, गणेश तर्पण से, दुर्गा अर्चना से और शिव अभिषेक से प्रसन्न होते हैं । इसलिए उन-उन देवता को प्रसन्न करने के लिए तत्तत् उपाय आदरपूर्वक करना चाहिए ॥११२-११६॥ श्रीनारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यान युक्त तृतीय पाद में कार्तवीर्य का माहात्म्य, मन्त्र तथा दीप कथन नामक छिहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥७६॥ अध्याय ७७ श्री कार्तवीर्य का कवच नारद बोले—महापण्डित ! सकलतंत्रविशारद ! साधु ! साधु ! आपने वह विधान मुझे बतला दिया जो तंत्रों में गुप्त था । महाभाग ! कृपानिधान ! अब मैं कार्तवीर्य तथा हनुमान् का कवच सुनना चाहता हूँ, (कृपया) बताइए ॥१—२॥ सनत्कुमार बोले—विप्रवर्य ! सुनो, मैं कार्तवीर्य का अत्यन्त आश्चर्यजनक कवच सुनाता हूँ, जिसके पाठ से कार्यसिद्धिकर्ता कार्तवीर्य प्रसन्न हो जाते हैं। पहिले उनका इस प्रकार ध्यान करे कि वे अत्यन्त रमणीय
६७२ नारदीयपुराणम् सहस्रादित्यसंकाशे नानारत्नसमुज्ज्वले । भास्वद्ध्वजपताकाढ्ये तुरगायुतभूषिते ॥४॥ महासंवर्त्तकांभोधिभीमरावविराविणि । समुद्धृतमहाच्छत्रवितानितवियत्पथे ॥५॥ महारथवरे दीप्त नानायुधविराजिते । सुस्थितं विपुलोदारं सहस्रभुजमंडितम् ॥६॥ वामैर्दृढंउकोदण्डानद्दधानमपरैः शरान् । किरीटहारमुकुटकेयूरवलयांगदैः ॥७॥ मुद्रिकोदरबन्धाद्यैर्मौंजीनूपुरकादिभिः । भूषितं विविधाकल्पैर्भास्वरैः सुमहाधनैः ॥८॥ आबद्धकवचं वीरं सुप्रसन्नाननांबुजम् । धनुर्ज्यासिंहनादेन कंपयंतं जगत्त्रयम् ॥९॥ सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वव्याधिविनाशनम् । सर्वसंपत्प्रदातारं विजयश्रीनिशेवितम् ॥१०॥ सर्वसौभाग्यदं भद्रं भक्ताभयविधायिनम् । दिव्यमाल्यानुलेपाढ्यं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥११॥ रयनागाश्वपादातवृंदमध्यगमीश्वरम् । वरदं चक्रवर्तिनं सर्वलोकैकपालकम् ॥१२॥ समानोदितसाहस्रदिवाकरसमद्युतिम् । महायोगभवैश्वर्यकीर्त्याक्रांतजगत्त्रयम् ॥१३॥ श्रीमच्चक्रं हरेरंशादवतीर्णं महीतले । सम्यगात्माविभेदेन ध्यात्वा रक्षामुदीरयेत् ॥१४॥ अस्यांगमूर्तयः पंच पांतु मां स्फटिकोज्ज्वलाः । अग्नीशासुरवायव्यकोणेषु हृदयादिकाः ॥१५॥ सर्वतोस्त्रज्वलद्रूपा दरचर्मासिपाणयः । अव्याहतबलैश्वर्यशक्तिसामर्थ्यविग्रहाः ॥१६॥ क्षेमकरीशक्तियुतश्चौरवर्गविभञ्जनः । प्राचीं दिशं रक्षतु मे बाणबाणासनायुधः ॥१७॥
रथ पर सुखपूर्वक बैठे हैं। इस रथ की चमक सहस्र सूर्यों के समान है। अनेक प्रकार के रत्न उसमें जड़े हैं। प्रकाशमान पताका उसपर फहरा रही है। दश हजार घोड़े उसमें जुते हैं ॥३-४॥ महाप्रलय कालीन समुद्र के समान वह भयंकर शब्द करता है। उस पर तना हुआ महाच्छत्र ऐसा प्रतीत होता है कि मानो गगनपथ पर चंदवा लगा दिया गया हो। चमकते हुए अनेक अस्त्र-शस्त्रों से वह सुसज्जित है। वैसे रथ पर बैठनेवाले महा यशस्वी कार्तवीर्य की सहस्र भुजायें हैं। वे बाँयें हाथों में धनुष तथा दाहिने में बाण धारण किये हुए हैं। मुकुट, हार, केयूर, अंगद, वलय, मुद्रिका, कांची नूपुर आदि अनेक बहुमूल्यक तथा चमकदार आभूषणों से उनके अंग विभूषित हैं। उन वीर के शरीर में कवच बंधा हुआ है। उनका मुखकमल सुप्रसन्न है, वे धनुष की टंकार से तीनों लोक को कंपा रहे हैं ॥५-६॥ वे निखिल शत्रुओं का क्षय करने वाले, समस्त व्याधियों का नाश करने वाले, अखिल संपत्तियों को देने वाले, विजय लक्ष्मी का उपभोग करने वाले, सब प्रकार का सौभाग्य देने वाले, कल्याण करने वाले, भक्तों को अभयदान देने वाले, दिव्य माला तथा चन्दन से विभूषित, सर्वलक्षण- सम्पन्न, रथ, हाथी, घोड़े तथा पैदलों के बीच चलनेवाले, स्वामी, वरदायक, चक्रवर्ती, सकल लोकों के एकमात्र पालक, समान भाव से सर्वत्र उदित होनेवाले सहस्र आदित्यों के समान कान्तिमान्, महायोग द्वारा प्राप्त ऐश्वर्य तथा कीर्ति से तीनों लोक को आक्रान्त किये हुए, श्रीमानों के समूहस्वरूप और भूतल पर हरि के अंश से अवतीर्ण हैं। इस प्रकार आत्मा आदि के भेद से अच्छी तरह ध्यान कर रक्षा-पाठ करे ॥१०-१४॥ "अग्नि, ईशान, नैर्ऋत्य तथा वायव्य कोणों में स्फटिक के समान धवल वर्ण वाली और हृदया आदि नामों वाली कार्तवीर्य की पाँच मूर्तियाँ, जिनका रूप जाज्वल्यमान अस्त्र के समान है, जिनके हाथों में ढाल-तलवार विद्यमान हैं और जो अव्याहत बल, ऐश्वर्य, शक्ति तथा सामर्थ्य की साक्षात् प्रतिमा हैं, मेरी रक्षा करें। धनुष-बाण रूपी अस्त्रों से सुसज्जित, चोर समूह के नाशक तथा क्षेमकरी शक्ति से युक्त देव पूर्व दिशा में मेरो रक्षा करें। महामारी के
६७३ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः श्रीकरीशक्तिसहितो मारीभयविनाशकः । शरचापधरः श्रीमान् दिशं मे पातु दक्षिणाम् ॥१८॥ महावश्यकरीयुक्तः सर्वशत्रुविनाशकृत् । महेष्वासनेषुधृक्पातु मम प्राचेतसीं दिशम् ॥१९॥ यशःकर्या समायुक्तो दैत्यसंघविनाशनः । परिरक्षतु मे सम्यग्विदिborder? सम्यग्विदिborder? सम्यग्विदिborder? सम्यग्विदिborder? सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? No -> सम्यग्विदिborder? 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६७४ नारदीयपुराणम् कार्तवीर्यः शिरः पातु ललाटं हैहयेश्वरः । सुमुखो मे मुखं पातु कर्णौ व्याप्तजगत्त्रयः ॥३३॥ सुकुमारो हनुं पातु भ्रूयुगं मे धनुर्धरः । नयनं पुण्डरीकाक्षो नासिकां मे गुणाकरः ॥३४॥ अधरोष्ठौ सदा पातु ब्रह्मज्ञेयो द्विजान्कविः । सर्वशास्त्रकलाधारी जिह्वां चिबुकमव्ययः ॥३५॥ दत्तात्रेयप्रियः कंठं स्कंधौ राजकुलेश्वरः । भुजौ दशास्यदर्पघ्नो हृदयं मे महाबलः ॥३६॥ कुक्षिं रक्षतु मे विद्वान् वक्षः परपुरंजयः । करौ सर्वार्थदः पातु कराग्राणि जगत्प्रियः ॥३७॥ रेवांबुलीलासंदृप्तो जठरं परिरक्षतु । वीरशूरस्तु मे नाभिं पार्श्वो मे सर्वदुष्टहा ॥३८॥ सहस्रभुजभृत्पृष्ठं सप्तद्वीपाधिपः कटिम् । ऊरू माहिष्मतीनाथो जानुनी वल्लभो भुवः ॥३९॥ जंघे वीराधिपः पातु पातु पादौ मनोजवः । पातु सर्वायुधधरः सर्वांगं सर्वमर्मसु ॥४०॥ सर्वदुष्टांतकः पातु धात्वष्टककलेवरम् । प्राणाविदशजीवेशान्सर्वशिष्टेष्टदोऽवतु ॥४१॥ वशीकृतेंद्रियग्रामः पातु सर्वेन्द्रियाणि मे । अनुक्तमपि यत्स्थानं शरीरांतर्बहिश्च यत् ॥४२॥ तत्सर्वं पातु मे सर्वलोकनाथेश्वरेश्वरः । वज्रात्सारतरं चेदं शरीरं कवचावृतम् ॥४३॥ बाधाशतविनिर्मुक्तमस्तु मे भयवर्जितम् । बद्ध्वेदं कवचं दिव्यमभेद्यं हैहयेशितुः ॥४४॥ विचरामि दिवा रात्रौ निर्भयेनांतरात्मना । राजमार्गे महादुर्गे मार्गे चौरादिसंकुले ॥४५॥ विषमे विपिने घोरे दावाग्नौ गिरिकंदरे । संग्रामे शस्त्रसंघाते सिंहव्याघ्रनिषेविते ॥४६॥ गह्वरे सर्वसंकीर्णे संध्याकाले नृपालये । विवादे विपुलावर्ते समुद्रे च नदीतटे ॥ ४७॥ परिपंथिजनाकीर्णे देशे दस्युगणावृते । सर्वस्वहरणे प्राप्ते प्राप्ते प्राणस्य संकटे ॥४८॥ नानारोगज्वरावेशे पिशाचप्रेतयातने । मारीदुःस्वप्नपीडासु क्लिष्टे विश्वासघातके ॥४६॥ करें ॥२८-३२॥ कार्तवीर्य मेरे शिर की रक्षा करें । हैहयेश्वर ललाट की, सुमुख मुख की और जगद्व्यापी कानों की रक्षा करें । सुकुमार कनपटों की, धनुर्धर दोनों भौंहों की, पुण्डरीकाक्ष नेत्र की, गुणाकर नाक की, ब्रह्मज्ञेय अधर की, कवि ओष्ठ की, सकल शास्त्रों एवम् कलाओं का धारण करने वाले जिह्वा की, अव्यय ठुड्डी की, दत्तात्रेयप्रिय कण्ठ की, राजकुलेश्वर स्कंधों की, रावणदर्पविनाशक भुजाओं की, महाबल हृदय की, विद्वान् कुक्षि की, परपुरंजय छाती की, सकलकामनादायक हाथों की, जगत्प्रिय करांगुलियों की, रेवा के जल में विहार करनेवाले पेट की, वीर शूर नाभि की, समस्त दुष्टों के निहन्ता पार्श्वों की, सहस्र भुजाओं का धारण करने वाले पीठ की, सातों द्वीपों के अधीश्वर कटि की, माहिष्मतीनाथ ऊरुओं की, भूवल्लभ जानुओं की, वीरपति जंघाओं की, मनोजव चरणों की, सर्वायुधधारी मर्म- स्थलसहित सकल अंगों की, निखिल दुष्टों के नाशक अष्टधातु सहित संपूर्ण कलेवर की, समस्त उचित अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले प्राण आदि दश जीवेशों की और इन्द्रिय समूह को जीतनेवाले सकल इन्द्रियों की रक्षा करें । जिस स्थान के बारे में मैंने नहीं कहा या जो प्रदेश शरीर के भीतर तथा बाहर हैं, उन सब की रक्षा अखिल लोक- नाथेश्वर ईश्वर करें । इस कवच से आवृत मेरा शरीर वज्र से भी कठोर (अर्थात् अभेद्य), विविध बाधाओं से रहित एवम् भय से वर्जित हो ॥३३-४३॥ कार्तवीर्य के इस अभेद्य तथा दिव्य कवच को शरीर में बाँधकर मैं दिन-रात विचरण करता रहूँ । इससे मेरी अन्तरात्मा निर्भीक हो गई है । इस कवच से आवृत मुझको राजमार्ग, महाभयंकर मार्ग, चोरादि से व्याप्त मार्ग, घोर जंगल, भयानक दावाग्नि, पर्वतों की गुफा, संग्राम, शस्त्रप्रहार, सिंह तथा व्याघ्रादि से परिव्याप्त पर्वतप्रान्त, संध्याकाल, नृपालय, विवाद, विपुल तरंगों से युक्त समुद्र, नदी तट, शत्रु एवम् चोरों से आवृत देश, सर्वस्व अपहरण, प्राणसंकट, अनेक प्रकार के रोग एवम् ज्वर के आक्रमण, पिशाच तथा प्रेत की यातना, महामारी तथा दुःस्वप्न की पीड़ा, विश्वासघातजन्य क्लेश, शारीरिक महा-
६७५ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः शारीरे च महादुःखे मानसे च महाज्वरे । आधिव्याधिभये विघ्नज्वालोपद्रवकेऽपि च ॥५०॥ न भवेत्तु भयं किंचित्कवचेनावृतस्य मे । आगंतुकामानखिलानस्मद्वस्रुविलुंपकान् ॥५१॥ निवारयतु दोर्दण्डसहस्रेण महारथः । स्वकरोद्भूतसाहस्रपाशबद्धान्सुदुर्जयान् ॥५२॥ संरुद्धगतिसामर्थ्यान्करोतु कृतवीर्यजः । सृणिसाहस्रनिर्भिन्नान्सहस्रशरखंडितान् ॥५३॥ राजचूडामणिः क्षिप्रं करोत्वस्मद्विरोधकान् । खड्गसाहस्रदलितान्सहस्रमुसलादितान् ॥५४॥ चौरादिदुष्टसत्त्वांघान्करोतु कमलेक्षणः । स्वशंखनादसंस्त्रस्तान्सहस्रारसहस्रभृत् ॥५५॥ अवतारो हरेः साक्षात्पालयत्वखिलं मम । कार्तवीर्यं महावीर्यं सर्वदुष्टविनाशन ॥५६॥ सर्वत्र सर्वदा दुष्टचौरानाश्य नाशय । किं त्वं स्वपिषि दुष्टघ्न किं तिष्ठसि चिरायसि ॥५७॥ उत्तिष्ठ पाहि नः सर्वभयेभ्यः स्वसुतानिव । ये चौरा वसुहर्तारो विद्विषो ये च हिंसकाः ॥५८॥ साधुभीतिकरा दुष्टाश्छद्मका ये दुराशयाः । दुर्हृदो दुष्टभूपाला दुष्टामात्याश्च पापकाः ॥५९॥ ये च कार्यविलोप्तारो ये खलाः परिपंथिनः । सर्वस्वहारिणां ये च पंच मायाविनोऽपरे ॥६०॥ महाक्लेशकरा म्लेच्छा दस्यवो वृषलाश्च ये । येऽग्निदा गरदातारो वंचका शस्त्रपाणयः ॥६१॥ ये पापा दुष्टकर्माणो दुःखदा दुष्टबुद्धयः । व्याजकाः कुपथासक्ता ये च नानामयप्रदाः ॥६२॥ छिद्रान्वेवरता नित्यं येऽस्मान्बाधितुमुद्यताः । ते सर्वे कार्तवीर्यस्य महाशंखरवाहताः ॥६३॥ सहसा विलयं यान्तु दूरादेव विमोहिताः । ये दानवा महादित्या ये यक्षा ये च राक्षसाः ॥६४॥ पिशाचा ये महासत्त्वा ये भूतब्रह्मराक्षसाः । अपस्मारग्रहा ये च ये ग्रहाः पिशिताशनाः ॥६५॥ दुःख, मानसी पीड़ा, महाज्वर, आधि, व्याधि, विघ्न, ज्वालोपद्रव आदि का लेश मात्र भी भय न हो ॥४४-५०३॥ महारथी कार्तवीर्य अपने सहस्र भुजदण्ड से मेरे धन लूटने के लिये आने वाले दस्युओं का निवारण करें । कृतवीर्य के पुत्र मेरे अत्यन्त दुर्जय शत्रुओं को सहस्रों पाशों में बांध कर निश्चेष्ट कर दें । राजशिरोमणि (कार्तवीर्य) मेरे विरोधियों को शीघ्र सहस्रों अंकुशों से छिन्न-भिन्न करें, सहस्रों बाणों से विद्ध करें । हजारों तलवारों से खंडित करें और सहस्रों मुसलों से पीड़ित करें । सहस्रों सहस्र दल कमल धारण करनेवाले कमलाक्ष सहस्रार्जुन चोर आदि दुष्ट जीवों को अपने शंख के नाद से भयभीत करें । हरि के साक्षात् अवतार रूप कार्तवीर्य मेरी सब तरह से रक्षा करें ॥५१-५५३॥ कार्तवीर्य ! महाशक्तिशालिन् ! निखिलदुष्टविनाशक ! सबकाल, सब जगह दुष्टों एवम् चोरों का नाश कीजिए । दुष्टों के मारने वाले ! क्या आप सो रहे हैं ? कहां खड़े हैं ? क्यों विलम्ब कर रहे हैं ? उठिये, अपने पुत्रों की तरह मुझे सब प्रकार के भयों से बचाइए। जितने चोर, धनहर्ता, द्वेष करने वाले, हिंसक, साधुओं को सताने वाले, दुष्ट, कपटी, दूषित हृदय वाले, दुष्ट विचार वाले, दुष्ट राजा, दुष्ट मन्त्री, पापी, कार्यध्वंसक, खल, शत्रु, सर्वस्वहारी, मायावी, महादुःखदायक, म्लेच्छ, दस्यु, शूद्र, आग में डालने वाले, विष देने वाले, वंचक, शस्त्रजीवी, सूदखोर, कुपथगामी, लोगों को डराने वाले, छिद्रान्वेषी तथा हमें बाधा पहुँचाने वाले हैं, वे कार्तवीर्य के महाशंखध्वनि से निहत हो और दूर ही से मोहित होकर विनष्ट हो जायें ॥५६-६३३॥ दानव, महादैत्य, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भयानक जीव, भूत, ब्रह्मराक्षस, अपस्मारग्रह, मांसाहारी तथा महाशोणितभक्षी वेताल, गुह्य, गंधर्व, अप्सरोगण, सिद्धगण, देवयोनि, डाकिनी, द्रूणस, १ प्रेत, क्षेत्रपाल, विनायकगण, महाव्याघ्र, १. एक गण, जिनकी बड़ी-बड़ी नाक होती है।
६७६ नारदीयपुराणम् महालोहितभोक्तारो वेताला ये च गुह्यकाः । गंधर्वाप्सरसः सिद्धा ये च देवादियोनयः ॥६६॥ डाकिन्यो द्रुणसाः प्रेताः क्षेत्रपाला विनायकाः । महाव्याघ्रमहामेघा महातुरगरूपकाः ॥६७॥ महागजा महासिंहा महामहिषयोनयः । ऋक्षवाराहशुनकवानरोलूकमूर्तयः ॥६८॥ महोष्ट्रखरमार्जारसर्पगोवृषमस्तकाः । नानारूपा महासत्त्वा नानाक्लेशसहस्रदाः ॥६९॥ नानारोगकरा क्षुद्रा महावीर्या महाबलाः । वातिकाः पैत्तिका घोरा श्लैष्मिकाः सन्निपातिकाः ॥७०॥ माहेश्वरा वैष्णवाश्च वैरिच्याश्च महाग्रहाः । स्कांदा वैनायका क्रूरा ये च प्रथमगुह्यकाः ॥७१॥ महाशत्रुग्रहा रौद्रा महामारीमसूरिकाः । ऐकाहिका द्व्याहिकाश्च त्र्याहिकाश्च महाज्वराः ॥७२॥ चातुर्थिकाः पाक्षिकाश्च मास्याः षाण्मासिकाश्च ये । सांवत्सरा दुर्निवार्या ज्वराः परमदारुणाः ॥७३॥ स्वाप्निका ये महोत्पाता ये च दुःस्वाप्निका ग्रहाः । कूष्मांडा जृंभिका भौमा द्रोणाः सान्निध्यवंचकाः भ्रमिकाः प्राणहर्तारो ये च बालग्रहादयः । मनोबुद्धीन्द्रियहराः स्फोटकाश्च महाग्रहाः ॥७५॥ महाशना बलिभुजो महाकुणपभोजनाः । दिवाचरा रात्रिचरा ये च संध्यासु दारुणाः ॥७६॥ प्रमत्ता वाऽप्रमत्ता वै ये मां बाधितुमुद्यता । ते सर्वे कार्तवीर्यस्य धनुर्मुक्तशराह्ताः ॥७७॥ सहस्रधा प्रणश्यंतु भग्नसत्त्वबलोद्यमाः । य सर्पा ये महानागा महागिरिविलेशयाः ॥७८॥ कालव्याला महादंष्ट्रा महासागरसंज्ञकाः । अनंतशूलिकाद्याश्च दंष्ट्राविषमहाभयाः ॥७९॥ अनेकशतशीर्षाश्च खंडपुच्छाश्च दारुणाः । महाविषजलौकाश्च वृश्चिका रक्तपुच्छकाः ॥८०॥ आशीविषाः कालकूटा महाहालाहलाह्वयाः । जलसर्पा जलव्याला जलग्राहाश्च कच्छपाः ॥८१॥ मत्स्यका विषपुच्छाश्च ये चान्ये जलवासिनः । जलजाः स्थलजाश्चैव कृत्रिमाश्च महाविषाः ॥८२॥
महामेघ, महाअश्व, महागज, महासिंह, महामहिष, रीछ, शूकर, कुत्ता, बन्दर तथा उल्लू के समान आकृति वाले, ऊँट, गधा, बिलार, सांप, गाय तथा बैल के सदृश शिर वाले, अनेक रूप वाले, हजारों प्रकार के क्लेश देने वाले, अनेक तरह के रोग उत्पन्न करने वाले, क्षुद्र, महाशक्तिशाली, महाबली, वात रोग देने वाले, पित्तव्याधि देने वाले, घोररूप, कफ रोग देने वाले, सन्निपात रोग देने वाले, माहेश्वरग्रह, वैष्णवग्रह, विरंचिग्रह, स्कंदग्रह, गणेशग्रह, क्रूरग्रह, प्रथमगुह्यक, महाशत्रुग्रह, रुद्रग्रह, महामारीग्रह, मसूरिकाग्रह, एक दिन वाले, दो दिन वाले तथा तीन दिन वाले महाज्वर, चार दिन वाले, पाक्षिक, मासिक, षाण्मासिक तथा वार्षिक परम दारुण एवम् दुर्निवार ज्वर, स्वप्न में होने वाले महा उत्पात, दुःस्वाप्निक ग्रह, कुष्मांड, जृंभिक, भौम, द्रोण, सान्निध्यवंचक, भ्रमिक, प्राणहर्ता बालग्रह, मन, बुद्धि तथा इन्द्रियहारी ग्रह, स्फोटकग्रह, महाग्रह, बहुत खाने वाले, बलि खाने वाले, शव खाने वाले, दिनचर, निशाचर, संध्याचर, दारुण, प्रमत्त या अप्रमत्त ग्रह मुझे कष्ट देने के लिये तैयार हैं, वे कार्तवीर्य के धनुर्मुक्त शरों से आहत होकर हजारों खंडों में विभक्त हो जायें ॥६४-७७½॥ उनके बल, वीर्य, पराक्रम भी भग्न हों । जो सर्प, महानाग, महापर्वत के बिल में सोने वाले, कालव्याल, महादंष्ट्रा वाले, महाअजगर नाम वाले, अनंत, शूलिक, दंष्ट्रा और विष के कारण महाभयानक दीखने वाले, सैकड़ों फण वाले, कटे पूँछ वाले, दारुण स्वरूप वाले, महाविष वाले जोंक, बिच्छू, लाल पूँछ वाले सर्प, कालकूट, महाहलाहल नाम वाले सांप, जलसर्प, जलव्याल, जलग्रह, कच्छप, मत्स्य, विष एवम् पुच्छ वाले अन्य जलवासी जीव, जलज, स्थलज, कृत्रिम, महाविष वाले, गुप्त रूप वाले, गुप्त विष वाले, चूहे, छिपकली, नानाविषसंज्ञक, महोपविषसंज्ञक तथा शरीर एवम् प्राणों के नाशक जीव हमें पीड़ा देना चाहते हैं, वे पहले ही