बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६८ नारदीयपुराणम् योगेषु रात्रौ पूर्वाह्ने दीपारंभः कृतः शुभः । कार्तिके शुक्लसप्तम्यां निशीथेऽतीव शोभनः ॥६६॥ यदि तत्र रवेर्वारः श्रवणं भं च दुर्लभम् । अत्यावश्यककार्येषु मासादीनां न शोधनम् ॥६७॥ आद्ये ह्युपोष्य नियतो ब्रह्मचारी सपीतकैः । प्रातः स्नात्वा शुद्धभूमौ लिप्तायां गोमयोदकैः ॥६८॥ प्राणानायम्य संकल्प्य न्यासान्पूर्वोदितांश्चरेत् । षट्कोणं रचयेद्भूभौ रक्तचंदनतंडुलैः ॥६९॥ अतः स्मरं समालिख्य षट्कोणेषु समालिखेत् । नवार्णैर्वेष्टयेत्तच्च त्रिकोणं तद्बहिः पुनः ॥७०॥ एवं त्रिलिखिते यन्त्रे निदध्याद्दीपभाजनम् । स्वर्णजं रजतॊत्थं वा ताम्रजं तदभावतः ॥७१॥ कांस्यपात्रं मृन्मयं च कनिष्ठं लोहजं मृतौ । शांतये मुद्गचूर्णोत्थं संधौ गोधूमचूर्णजम् ॥७२॥ आज्ये पलसहस्रे तु पात्रं शतपलं स्मृतम् । आज्येऽयुतपले पात्रं पलपंचशता स्मृतम् ॥७३॥ पंचसप्ततिसंख्ये तु पात्रं षष्टिपलं स्मृतम् । त्रिसहस्त्री घृतपले शर्करापलभाजनम् ॥७४॥ द्विसाहस्र्यां द्विशतमितं च भाजनमिष्यते । शतेऽकिंचरसंख्यातमेवमन्यत्र कल्पयेत् ॥७५॥ नित्यदीपे वह्निपलं पात्रमाज्यं पलं स्मृतम् । एवं पात्रं प्रतिष्ठाप्य वर्तीः सुवोत्थिताः क्षिपेत् ॥७६॥ एका तिस्रोऽथवा पंचसप्ताद्या विषमा अपि । तिथिमानादासहस्रं तंतुसंख्या विनिर्मिता ॥७७॥ गोघृतं प्रक्षिपेत्तत्र शुद्धवस्त्रविशोधितम् । सहस्रपलसंख्यादिदशांशं कार्यगौरवात् ॥७८॥ सुवर्णादिकृतां रम्यां शलाकां षोडशांगुलाम् । तदर्द्धा वा तदर्द्धा वा सूक्ष्माग्रां स्थूलमूलिकाम् ॥७९॥ शुभदायक है। कार्तिक-शुक्ल-सप्तमी को रात्रि में दीपारंभ अत्यन्त शोभन है। यदि उस दिन रविवार तथा श्रवण नक्षत्र पड़ जाय तो सोने में सुगंध समझो। अत्यावश्यक कार्यों में मास आदि का विचार नहीं करना चाहिए ॥६१-६७॥ प्रथम दिन ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए उपवास करके दूसरे दिन प्रातःकाल स्नानोपरान्त भूमि को गोवर से लीप-पात कर पवित्र करे। अनन्तर प्राणायाम तथा संकल्प करके पूर्वोक्त प्रकार से न्यास करे। फिर भूमि पर रक्तचंदन तथा चावल से षट्कोण का निर्माण कर उस पर काम का चित्र खींचे। उस चित्र को नव अक्षरों से वेष्टित कर बाहर त्रिकोण की रचना करे, इस तरह यंत्र लिख जाने पर उसके ऊपर दीप पात्र को स्थापित करे। दीपत्र सुवर्ण या चांदी या तांबे का होना चाहिये। यदि वे न मिलें तो काँसा या मिट्टी का पात्र बनाये, मारण कार्य के लिये लौह का, शान्तिकार्य के लिये मूंग के पिसान का, और संधिकार्य के लिये गेहूँ के आटे का दीप पात्र बनाना चाहिये । ६८-७२॥ यदि सहस्र पल परिमित घी हो तो (पात्र के लिये) एक सौ पल के हिसाब से द्रव्य होना चाहिये। दस हजार पलपरिमित घी के लिये पाँच सौ पल के परिमाण में द्रव्य होना चाहिये, पचहत्तर पलपरमित घी के लिये साठ पल द्रव्य, तीन हजार पल घी के लिये सत्रह सौ पल द्रव्य, दो हजार पल घी के लिये दो सौ पल द्रव्य और सौ पल घी के लिये दस पल द्रव्य आवश्यक है। नित्य दीप के लिये तीन द्रव्य का पात्र और एक पल घी होना चाहिये। इस तरह पात्र की प्रतिष्ठा कर सूत की बनी बत्तियां उसमें डाले ॥७३-७६॥ बत्तियों की संख्या एक या तीन या पाँच या सात होनी चाहिये। बत्ती के तंतुओं की संख्या पन्द्रह से लेकर एक हजार तक अपेक्षित है। दीप में गाय का घी डालना चाहिये, जो पहले वस्त्र से छान लिया गया हो। कार्यगौरव की दृष्टि से सहस्र पलपरिमित घी पात्र में छोड़े। उसमें एक सुवर्ण की बनाई हुई सोलह अगुलियों की रमणीय शलाका भी रखे। शलाका सोलह या आठ या चार ही अंगुलियों की होनी चाहिये; परन्तु उसका अग्रभाग सूक्ष्म और आदि भाग स्थूल हो ॥७७-७९॥ उस शलाका को पात्र के मध्य में