सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 686, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 686

६६७ षट्सप्ततितमोऽध्यायः त्रिवेदसप्तयुग्माक्षिवर्णैः पंचांगकं मनोः । नमो भगवते श्रोति कार्तवीर्यार्जुनाय च ॥४६॥ सर्वदुष्टांतकायेति तपोबलपराक्रमः । परिपालितसप्तांते द्वीपाय सर्वरापदम् ॥५०॥ जन्यचूडामणांते ये महाशक्तिमते ततः । सहस्रदहनप्रांते वर्मस्त्रांतो महामनुः ॥५१॥ त्रिषष्टिवर्णवान्प्रोक्तः स्मरणात्सर्वविघ्नहृत् । राजन्यचक्रवर्ती च वीरः शूरस्तृतीयकः ॥५२॥ माहिष्मतीपतिः पश्चाच्चतुर्थः समुदीरितः । रेवांबुपरितृप्तश्च काणो हस्तप्रबाधितः ॥५३॥ दशास्येति च षड्भिः स्यात्पदैर्ङेन्तैः षडंगकम् । सिच्यमानं युवतिभिः क्रीडंतं नर्मदाजले ॥५४॥ हस्तैर्जलौघं रुंधंतं ध्यायेन्मत्तं नृपोत्तमम् । एवं ध्यात्वा युतं मंत्रं जपेदन्यत्तु पूर्ववत् ॥५५॥ पूर्वं तु प्रजपेल्लक्षं पूजायोगश्च पूर्ववत् । कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् ॥५६॥ तस्य संस्मरणादेव हृतं नष्टं च संवदेत् । लभ्यते मंत्रवर्येोऽयं द्वात्रिंशद्वर्णसंयुतः ॥५७॥ पादैः सर्वेण पंचांगं ध्यानपूजावि पूर्ववत् । कार्तवीर्याय शब्दांते विद्महे पदमुच्चरेत् ॥५८॥ महावीर्याय वर्णांते धीमहीति पदं वदेत् । तन्नोऽर्जुनः प्रवणान्ते चोदयात्पदमीरेयेत् ॥५९॥ गायत्र्येषाऽर्जुनस्योक्ता प्रयोगादौ जपेत्तु ताम् । अनुष्टुभं मनुं रात्रौ जपतां चौरसंचयाः ॥६०॥ पलायंते गृहाद्दूरं तर्पणाद्धवनादपि । अथो दीपविधिं वक्ष्ये कार्तवीर्यप्रियंकरम् ॥६१॥ वैशाखे श्रावणे मार्गे कार्तिकाश्विनपौषतः । माघफाल्गुनयोर्मासोर्दीपांरभं समाचरेत् ॥६२॥ तिथौ रिक्ताविहीनायां वारे शनिकुजौ विना । हस्तोत्तराश्विरौद्रेयपुष्यवैष्णववायुभे ॥६३॥ द्विदैवते च रोहिण्यां दीपारंभो हितावहः । चरमे च व्यतीपाते धृतौ वृद्धौ सुकर्मणि ॥६४॥ प्रीतौ हर्षं च सौभाग्ये शोभनायुष्मतोराप । करणे विष्टिरहिते ग्रहणेऽर्कोदयादिषु ॥६५॥ "नमो भगवते......"यह तिरसठ अक्षरों का मन्त्र है। इसके स्मरण मात्र से विघ्नों का नाश होता है। "राजन्य-चक्रवर्ती......" इस मन्त्र के छह पदों से षडंगन्यास करके ध्यान करे कि नर्मदा के जल में स्नान करते हुए कार्तवीर्य युवतियों के साथ जलकेलि कर रहे हैं। और क्रीड़ोन्मत्त होकर हाथों से जलतरंग को रोकते हैं। ऐसे नृपवर का ध्यान कर दश हजार मन्त्र-जप करे और अन्य कार्य पूर्ववत् ही करे। पहिले एक लाख मन्त्र का जप कर पूजा आदि यथापूर्वं करनी चाहिए। "कार्तवीर्यार्जुनः............"यह बत्तीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके समस्त पादों से पंचांगन्यास कर ध्यान, पूजन आदि पूर्ववत् ही करना चाहिए। "कार्तवीर्याय" इसके अन्त में "विद्महे" और "महावीर्याय धीमहि, तन्नोऽर्जुनः प्रचोदयात्" इतने को जोड़ देने से अर्जुनगायत्री बन जाती है। इसको प्रयोग के आदि में जपना चाहिये। रात्रि में इसके जप करने से चोर घर से दूर भाग जाते हैं। इससे तर्पण तथा हवन करने से भी यही फल होता है ॥४३-६० १/२॥ अब मैं दीप का विधान बतलाऊंगा, जो कार्तवीर्य को अत्यन्त प्रिय है। वैशाख, श्रावण, अगहन, कार्तिक, आश्विन, पौष, माघ तथा फाल्गुन मास में दीपारंभ करना चाहिए। रिक्ता' विहीन तिथि, शनि और मङ्गल रहित दिन, हस्त, उत्तराषाढ, अश्विनी, रौद्रेय, पुष्य, वैष्णव, वायु तथा द्विदैवताक नक्षत्र और रोहिणी नक्षत्र में दीपारंभ कल्याणकारक होता है। चरम, व्यतीपात, धृति तथा वृद्धि, प्रीति, हर्ष, सौभाग्य, शोभन, तथा आयुष्मान् नामक योग में, विष्टि रहित करण में, ग्रहणों में तथा अर्कोदय आदि योग में पूर्व रात्रि के समय दीपारंभ करना १. चौथ, चतुर्दशी, नवमी-ये रिक्ता कहलाती हैं।