बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 685, कुल 1008 में से
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६६६ नारदीयपुराणम् अपामार्गार्कदूर्वाजां होमो लक्ष्मीप्रदोऽघनुत् । स्त्रीवश्यकृत्प्रियंगूणां मुराणां भूतशांतिदः ॥३४॥ अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवटबिल्वसमुद्भवाः । समिधो लभते हुत्वा पुत्रानायुर्द्धनं सुखम् ॥३५॥ निर्मोकहेमसिद्धार्थलवणैश्चौरनाशनम् । रोचनागोमयैस्तम्भो भूप्राप्तिः शालिमिर्हुतैः ॥३६॥ होमसंख्या तु सर्वत्र सहस्रादयुतावधि । प्रकल्पनीया मन्त्रज्ञैः कार्यगौरवलाघवात् ॥३७॥ कार्तवीर्यस्य मन्त्राणामुच्यते लक्षणं बुधाः । कार्तवीर्यार्जुनं ङेन्तं सर्वमंत्रेषु योजयेत् ॥३८॥ स्वबीजाद्यो दशार्णोऽसौ अन्ये नवशिवाक्षराः । आद्यबीजद्वयेनासी द्वितीयो मन्त्र ईरितः ॥३९॥ स्वकामाभ्यां तृतीयोऽसौ स्वभ्रूभ्यां तु चतुर्थकः । स्वपाशाभ्यः पञ्चमोऽसौ षष्ठः स्वेन च मायया ॥४०॥ स्वांकुशाभ्यां सप्तमः स्यात्स्वरमाभ्यामथाष्टमः । स्ववाग्भवाभ्यां नवमो वर्मास्त्राभ्यामथांतिमः ॥४१॥ द्वितीयादिनवांतेषु बीजयोः स्याद्वयतिक्रमः । मंत्रे तु दशमे वर्णा नववर्मस्त्वमध्यगाः ॥४२॥ एतेषु मंत्रवर्यैषु स्वानुकूलं मनुं भजेत् । एषामाद्ये विराट्छंदोऽन्येषु त्रिष्टुबुदाहृतम् ॥४३॥ दश मंत्रा इमे प्रोक्ता यदा स्युः प्रणवादिकाः । तदादिमः शिवार्णः स्यादन्ये तु द्वादशाक्षराः ॥४४॥ त्रिष्टुप् छन्दस्तथाद्ये स्यादन्येषु जगती मता । एवं विंशतिमंत्राणां यजनं पूर्ववन्मतम् ॥४५॥ दीर्घाढचमूलबीजेन कुर्यादेषां षडंगकम् । तारो हृत्कार्तवीर्यार्जुनाय वर्मास्त्रठद्वयम् ॥४६॥ चतुर्दशार्णो मंत्रोऽयमस्येज्या पूर्ववन्मता । मूनैत्रसमनेत्राक्षिवर्णैरस्यांगपंचकम् ॥४७॥ तारो हृद्भगवान् ङेन्तः कार्तवीर्यार्जुनस्तथा । वर्मास्त्राग्निप्रियामंतः प्रोक्तो ह्यष्टादशार्णकः ॥४८॥
दूर्वा से हवन करने से श्रीप्राप्ति तथा पाप क्षय होता है। प्रियंगु (कंगनी) से होमने से स्त्री वशीभूत होती है। मुरा से होम करने से भूतोपद्रव शान्त होता है ॥३१-३४॥ पीपल, गूलर, वट तथा बिल्व की समिधा से होम करने से पुत्र, आयु, धन, सुख की प्राप्ति होती है। निर्मोक (सर्पकंचुक), सुवर्ण, श्वेत सरसों तथा नमक से हवन करने से चोर का नाश होता है। गोरोचन तथा गोबर से होमने से स्तंभन होता है। चावल से होमने से भूमि- प्राप्ति होती है। मन्त्रज्ञाता पुरुष कार्य की लघुता एवम् गुरुता को दृष्टि में रखते हुए एक हजार से दस हजार तक मन्त्र का जप करे ॥३५-३७॥ कार्तवीर्य के मन्त्रों का लक्षण बुधगण इस तरह बतलाते हैं कि समस्त मन्त्रों में 'कार्तवीर्यार्जुनाय' यह पद जोड़ना चाहिए। "स्वबीज........." यह दश अक्षरों का पहिला मन्त्र है। आद्य दोनों बीज मन्त्र ही द्वितीय मन्त्र कहे गए हैं। "स्वकामाभ्याम्" यह तीसरा मन्त्र है। स्वभ्रूभ्याम्" यह चौथा है। "स्वपाशाभ्याम्" यह पाँचवाँ, "स्वेन च मायया" यह छठा, "स्वांकुशाभ्याम्" यह सातवाँ, "स्वरमाभ्याम्" यह आठवाँ, "स्ववाग्भवाभ्याम्" यह नवाँ और "वर्मास्त्राभ्याम्" यह दशवाँ मन्त्र है। द्वितीय मन्त्र से लेकर नवें तक दोनों बीजो का व्यतिक्रम होता है। दशम मन्त्र में नौ कवचों के मध्यवर्ती वर्ण होने चाहिए। इन उत्तम मन्त्रों में जो अपने अनुकूल मालूम पड़े, उसका जप करना चाहिए ॥३८-४२॥ इनमें प्रथम मन्त्र का छन्द विराद् है और दूसरों का त्रिष्टुप् । ये दशों मन्त्र जब प्रणव से युक्त होते हैं तब आदिम मन्त्र ग्यारह अक्षरों का और अन्य बारह अक्षरों के होते हैं। तथा आद्य मन्त्र का छन्द त्रिष्टुप् और अन्यों का जगती छन्द होता है। इस तरह बीसों मन्त्रों की अर्चना पूर्ववत् करनी चाहिए। मन्त्र दीर्घ मात्रा से सम्पन्न हैं। मूलबीज से इनका षडंगन्यास करना चाहिए। "तार......" यह चौदह अक्षरों का मन्त्र है। इसकी भी उपासना पहिले की तरह करनी चाहिए। नौ अक्षरों से इसका पंचांगन्यास किया जाता है। "तारो हृत्......"यह अठारह अक्षरों का मन्त्र है। अट्ठारहों अक्षरों से इसका पंचांगन्यास करना चाहिए।