बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 684, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्सप्ततितमोऽध्यायः ६६५ षट्कोणेषु षडंगानि ततो दिक्षु विदिक्षु च । चोरमदविभञ्जनं मारीमदविभंजनम् ॥२०॥ अरिमदविभंजनं दैत्यमदविभंजनम् । दुष्टनाशं दुःखनाशं दुरितापद्विनाशनम् ॥२१॥ दिक्ष्वष्टशक्तयः पूज्याः प्राच्यादिष्वसितप्रभाः । क्षेमंकरी वश्यकरी श्रीकरी च यशस्करी ॥२२॥ आयुःकरी तथा प्रज्ञाकरी विद्याकरी पुनः । धनकर्यष्टमी पश्चाल्लोकेशा अस्त्रसंयुताः ॥२३॥ एवं संसाधितो मंत्रः प्रयोगार्हः प्रजायते । कार्त्तवीर्यार्जुनस्याथ पूजायंत्रमिहोच्यते ॥२४॥ स्वबीजानंगध्रुववाक्कर्णिकं दिग्दलं लिखेत् । तारादिवर्मा तद्दलं शेषवर्णदलांतरम् ॥२५॥ ऊष्मान्त्यस्वरौकजल्कं शेषाणैः परिवेष्टितम् । कोणालंकृतभूतार्णभूगृहं यन्त्रमीशितुः ॥२६॥ शुद्धभूमावष्टगन्धैर्लिखित्वा यन्त्रमादरात् । तत्र कुंभं प्रतिष्ठाप्य तत्रावाह्यार्चयेन्नृपम् ॥२७॥ स्पृष्ट्वा कुम्भं जपेन्मन्त्रं सहस्रं विजितेन्द्रियः । अभिषिञ्चेतदंभाभिः प्रियं सर्वेष्टसिद्धये ॥२८॥ पुत्राञ्यशो रोगनाशमायुः स्वजनरंजनम् । वाक्सिद्धि सुदृशः कुम्भाभिषिक्तो लभते नरः ॥२९॥ शत्रूपद्रव आपन्ने ग्रामे वा पुटभेदने । संस्थापयेदिदं यन्त्रं शत्रुभीतिनिवृत्तये ॥३०॥ सर्षपारिष्टलशुनकार्पासैर्मार्यते रिपुः । धत्तूरैः स्तभ्यते निम्बैर्द्वेष्यते वश्यतैऽम्बुजैः ॥३१॥ उच्चाटने विभीतस्य समिद्भिः खदिरस्य च । कटुतैलमहिष्याज्यैर्होमद्रव्यांजनं स्मृतम् ॥३२॥ यवैर्हुते श्रियः प्राप्तिस्तिलैराज्यैरघक्षयः । तिलतंडुलसिद्धार्थजालैर्वश्यो नृपो भवेत् ॥३३॥ मन्त्र जप करे और उसका दशांश तिल-चावल से हवन करे। अनन्तर विष्णुपोठ पर उनका पूजन कर षट्- कोण तथा दिशा-विदिशाओं में षडंग देवताओं की पूजा करे। ऐसा करने से चोरमद, नारोमद, शत्रुमद, दैत्य- मद, दुष्ट, दुःख तथा पाप का नाश होता है ॥१७-२१॥ पुनः पूर्व आदि दिशाओं में आठ कृष्ण वर्ण शक्तियों की पूजा करे। क्षेमंकरी', वश्यकरो, श्रीकरी, यशस्करी, आयुःकरी, प्रज्ञाकरी, विद्याकरी और धनकर्यष्टमी ये आठों लोकपालिकायें शक्ति कहलाती हैं। पश्चात् अस्त्र समेत लोकपालों की पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार मन्त्र की साधना करने पर ही वह प्रयोग में लाया जा सकता है ॥२२-२३॥ अब कार्त्तवीर्यार्जुन का पूजायंत्र बतलाता हूँ। बीजमंत्र, काम, ध्रुव, वाक् तथा कर्णिका सहित दिक्पत्र लिखे। उसमें स्वरवर्ण कमल का अंतिम पत्र होता है, शेष वर्ण अन्य पत्र होते हैं। श ष स ह और ओ वर्ण उस कमल के (केसर) हैं, शेष वर्षों से वह परिवेष्टित है। कोण से अलंकृत चौदह वर्णों का भू-गृह यंत्र कार्त्तवीर्य का माना गया है। २४-२६॥ पवित्र भूमि पर अष्ट गंधों से आदरपूर्वक लिखकर घट स्थापन करे। उस घट पर कार्त्तवीर्य का आवाहन करके पूजन करे। तदनन्तर घट स्पर्श करके इन्द्रियसंगमपूर्वक एक हजार मन्त्र जप करके उस जल से अभिषेक (स्नान) करे। ऐसा करने से सकल कामनायें सफल होती हैं। उस जल से अभिषिक्त मानव पुत्र, यश, आरोग्य, लोकांप्रयता, वाक्सिद्धि तथा सुन्दर दृष्टि प्राप्त करता है। यदि शत्रु का उपद्रव बढ़ जाय तो उसकी निवृत्ति के लिये गाँव या नगर में इस यंत्र को स्थापना करनी चाहिये। (उक्त मंत्र को पढ़कर) सरसों, नीम, लशुन तथा कपास से होम करने से शत्रु भाग जाता है ॥२७-३०॥ धतूरों से होम करने से शत्रु का स्तंभन होता है। नीम से हवन करने पर (शत्रु को आपस में) द्वेष होता है। कमल से होमने पर वशीकरण होता है। बहेड़े तथा खैर की लकड़ी और कड़ुआ तेल एवम् भैंस के घी से होम करने से उच्चाटन होता है। यव से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति और घृतमिश्रित तिल से पाप का क्षय होता है। तिल, चावल तथा श्वेत सरसों से होम करने से राजा वशीभूत होता है। अपामार्ग (चिचड़ा) तथा ८४ ना० पु०