बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६६४ नारदीयपुराणम् सनत्कुमार उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि संदेहविनिवृत्तये । यथा सेव्यत्वमापन्नः कार्तवीर्यार्जुनो भुवि ॥३॥ यः सुदर्शनचक्रस्यावतारः पृथिवीतले । दत्तात्रेयं समाराध्य लब्धवांस्तेज उत्तमम् ॥४॥ तस्य क्षितीश्वरेंद्रस्य स्मरणादेव नारद । शत्रूञ्जयति संग्रामे नष्टं प्राप्नोति सत्वरम् ॥५॥ तेनास्य मंत्रपूजादि सर्वतंत्रेषु गोपितम् । तुभ्यं प्रकाशयिष्येऽहं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥६॥ वह्नितारयुता रौद्री लक्ष्मीरग्नींदुशांतियुक् । वेधाघरेन्दुशांत्याढ्यो निद्राशाग्नि बिंदुयुक् ॥७॥ पाशो मायां कुशं पद्मावर्मास्त्रे कार्तवीर्यपद्म । रेफोवा द्यासनेोऽनन्तो वह्निजौ कर्णसंस्थितौ ॥८॥ मेघः सदीर्घः पवनो मनुह्वतो हृदंतिमः । ऊनविंशतिवर्णोऽयं तारादिर्नखवर्णकः ॥६॥ दत्तात्रेयो मुनिश्चास्यच्छन्दोनुष्टुबुदाहृतम् । कार्तवीर्यार्जुनोदेवो बीजशक्तिध्रुवश्च हृत् ॥१०॥ शेषाढ्यबीजयुग्मेन हृदयं विन्यसेदधः । शांतियुक्तचतुर्थेन कामाढ्येन शिरोऽगकम् ॥११॥ इन्द्राढ्यं वामकर्णाद्यमाययोर्वीशयुक्तया । शिखामंकुशपद्माभ्यां सर्वाग्भ्यां वर्म विन्यसेत् ॥१२॥ वर्मास्त्राभ्यामस्त्रमुक्तं शेषाणैर्व्यापकं पुनः । हृदये जठरे नाभौ जठरे गुह्यदेशतः ॥१३॥ दक्षपादे वामपादे सव्थिन जानुनि जंघयोः । विन्यसेद्द्बोजदशकं प्रणवद्वयमध्यगम् ॥१४॥ ताराद्यानथ शेषाणन्मस्तके च ललाटके । भ्रुवोः श्रुत्योस्तथैवाक्ष्णोर्नासि वक्त्रे गलेंऽसके ॥१५॥ सर्वमन्त्रेण सर्वाङ्गे कृत्वा व्यापकमादृतः । सर्वैष्टसिद्धये ध्यायेत्कार्तवीर्यं जनेश्वरम् ॥१६॥ उद्यदर्कसहस्त्राभं सर्वभूपतिवन्दितम् । दोर्भिः पञ्चाशता दक्षैर्बाणान्वामैर्धर्नूषि च ॥१७॥ दधतं स्वर्णमालाद्यं रक्तवस्त्रसमावृतम् । चक्रावतारं श्रीविष्णोध्र्यायेदर्जुनभूपतिम् ॥१८॥ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयात्तिलैः । सतण्डुलैः पायसेन विष्णुपीठे यजेत्तु तम् ॥१९॥ सनत्कुमार बोले- नारद ! पृथ्वो पर जिस प्रकार कार्तवीर्यार्जुन सेव्यत्व को प्राप्त हुए, वह मैं बत- लाता हूँ। तुम सुन कर संदेह मिटा लो। भूतल पर कार्तवीर्य सुदर्शनचक्र का अवतार माने जाते हैं। उन्होंने दत्तात्रेय की आराधना करके उत्तम तेज को प्राप्त किया। नारद ! उस पृथिवीपति के स्मरणमात्र से संग्राम में विजय मिलती है तथा शत्रु शीघ्र नष्ट हो जाता है। इसलिये उनके मंत्र, पूजन आदि समस्त तंत्रों में गुप्त है। आज उस सिद्धिदायक मंत्र को मैं तुमसे बता देता हूँ। "वह्नितारयुतारौद्री......" यह उन्नीस अक्षरों का मंत्र है ॥३-९॥ इसके मुनि दत्तात्रेय, छंद अनुष्टुप्, देवता कार्तवीर्यार्जुन, बीज 'ध्रुव' और शक्ति 'हृत्' है। शेषाढ्यबीजयुग्म से हृदयन्यास, शान्तियुक्त चतुर्थाक्षर से शिरोन्यास, 'इन्द्राढ्यम्' इससे नामकणर्न्यास, अंकुश तथा पद्म से शिखान्यास, वाणी से वर्मन्यास, वर्मास्त्र से अस्त्रन्यास और शेष अक्षरों से पुनः व्यापकन्यास करे, हृदय, उदर, नाभि, गुह्यदेश, दक्षिणपाद, वामपाद, ऊरु, जानु तथा जांघों में प्रणवद्वयमध्यगामी दश बीजों का न्यास करे। तारक आदि नव वर्णां का मस्तक, ललाट, भौंह, कान, नेत्र, नाक, मुख, कण्ठ तथा कन्धे में न्यास करे। पुनः समस्त अंगों में संपूर्ण मन्त्र से व्यापकन्यास कर सकल प्रयोजनों की सिद्धि के लिये जननाथकार्तवीर्य का इस प्रकार ध्यान करे ॥१०-१६॥ कार्तवीर्य की कांति उदित होते हुए सहस्रों सूर्य के समान है। सकलराजगण उनकी वंदना करते हैं। उनके पचास दाहिने हाथों में बाण और पचास बाँयें हाथों में धनुष विद्यमान हैं। वे सोने की माला तथा रक्तवस्त्र धारण किये हुए हैं। ऐसे विष्णु के चक्रावतार राजा अर्जुन का ध्यान कर एक लाख