बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ६६३ एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं जुहुयात्तिलैः । त्रिमध्वक्तैर्यजेत्पीठे पूर्वोक्ते पूर्ववत्सुधीः ॥१०३॥ अनेन मनुना मंत्री ग्रहग्रस्तं प्रमार्जयेत् । आक्रंदस्तं विमुच्याथ ग्रहः शीघ्रं पलायते ॥१०४॥ मनवोऽमी सदा गोप्या न प्रकाश्या यतस्ततः । परीक्षिताय शिष्याय देया वा निजसूनवे ॥१०५॥ हनुमद्भजनासक्तः कार्तवीर्यार्जुनं सुधीः । विशेषतः समाराध्य यथोक्तं फलमाप्नुयात् ॥१०६॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे दीपविधि निरूपणं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥७५॥
अथषट्सप्ततितमोऽध्यायः नारद उवाच कार्तवीर्यप्रभृतयो नृपा बहुविधा भुवि । जायतेऽथ प्रलीयन्ते स्वस्वकर्मानुसारतः ॥१॥ तत्कथं राजवर्योऽसौ लोके सेव्यत्वमागतः । समुल्लंघ्य नृपानन्यानेतंन्मे नुद संशयम् ॥२॥
पश्चात् इस मन्त्र का एक लाख जप कर उसका दशांश त्रिमधुयुक्त तिल से हवन करे । फिर पूर्वोक्त पीठ पर पहिले की तरह पूजन कर विद्वान् साधक इस मन्त्र से ग्रहगृहीत व्यक्ति को झाड़ दे। ऐसा करने से ग्रह रोते हुए उस व्यक्ति को छोड़ कर शीघ्र भाग जाता है। ॥६८-१०४॥ ये मन्त्र सदा गोपनीय हैं। यत्र-तत्र इनको प्रकाशित नहीं करना चाहिये । परीक्षित शिष्य या अपने पुत्र को ये बताने चाहिये। हनुमान् के भजन में आसक्त विद्वान् कार्तवीर्यार्जुन की विशेष आराधना करके यथा वर्णित फल को प्राप्त करे ।। १०५-१०६।। श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में दीपविधिनिरूपण नामक पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त ।।७५।।
अध्याय ७६ कार्तवीर्य की महिमा नारद बोले-पृथ्वी पर कार्तवीर्य प्रभृति राजा अपने-अपने कर्म के अनुसार उत्पत्ति एवम् लय को प्राप्त करते हैं। तब अन्य राजाओं का अतिक्रमण करके केवल नृपवर कार्तवीर्य ही कैसे लोगों के सेव्य कहलाये ? — यह मेरा संशय है। इसका निराकरण कीजिये ॥१-२॥