बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ नारदीयपुराणम् प्रत्यहं यो विधानेन दीपदानं हनूमतः । तस्यासाध्यं न वै किंचिद्विद्यते भुवनत्रये ॥८८॥ न देयं दुष्टहृदये दुष्टचित्तनबुद्धये । अविनीताय शिष्याय पिशुनाय कदाचन ॥८९॥ कृतघ्नाय न दातव्यं दातव्यं च परीक्षिते । बहुना किमिहोक्तेन सर्वं दद्यात्कपीश्वरः ॥९०॥ अथ मन्त्रान्तरं वक्ष्ये तत्त्वज्ञानप्रदायकम् । तारो नमो हनुमते जाठरत्रयमीरयेत् ॥९१॥ दनक्षोभं समाभाष्य संहरद्वयमीरयेत् । आत्मतत्त्वं ततः पश्चात्प्रकाशयुगं ततः ॥९२॥ वर्मास्त्रवह्निजायांतः सार्द्धषड्विंशदर्णवान् । वसिष्ठोऽस्य मुनिश्चन्दोऽनुष्टुप् च देवताः पुनः ॥९३॥ हनुमान्मुनिसप्ततु वेदाष्टनिगमैः क्रमात् । मंत्रांगैश्च षडंगानि कृत्वा ध्यायेत्कपीश्वरम् ॥९४॥ जानुस्थवामबाहुं च ज्ञानमुद्रापरं हृदि । अध्यात्मचित्तमासीनं कदलीवनमध्यगम् ॥९५॥ बालार्ककोटिप्रतिमं ध्यायेज्ज्ञानप्रदं हरिम् । ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षं दशांशं जुहुयात्तिलैः ॥९६॥ साज्यैः संपूजयेत्पीठे पूर्वोक्ते पूर्ववत्प्रभुम् । जप्तोऽयं मदनक्षोभं नाशयत्येव निश्चितम् ॥९७॥ तत्त्वज्ञानमवाप्नोति कपींद्रस्य प्रसादतः । अथ मंत्रांतरं वक्ष्ये भूतविद्रावणं परम् ॥९८॥ तारः कार्शीकुक्षिपखराहश्चांजनापदम् । पवनो वनपुत्रांते आवेशिद्वयमीरयेत् ॥९९॥ तारः श्रीहनुमत्पश्चाद्वस्वरचभुजाक्षरः । ब्रह्मा मुनिः स्याद्गायत्री छंदोऽत्र देवता पुनः ॥१००॥ हनुमान्कमला बीजं फट् शक्तिः परिकीर्तितः । षड्दीर्घाढ्येन बीजेन षडङ्गानि समाचरेत् ॥१०१॥ आंजनेयं पाटलास्यं स्वर्णाद्रिसमविग्रहम् । पारिजातद्रुमूलस्थं चिंतयेत्साधकोत्तमः ॥१०२॥ आवश्यकता नहीं है । मैंने संक्षेप से अनेक प्रयोगों को बता दिया । जो व्यक्ति प्रतिदिन हनुमान् को दीप चढ़ाता है, उसके लिये तीनों लोक में कुछ भी असाध्य नहीं है । यह रहस्य दुष्ट हृदय, दुर्बुद्धि, अविनीत, पिशुन और कृतघ्न व्यक्ति को नहीं बतलाना चाहिए । किसी भी व्यक्ति की अच्छी तरह परीक्षा करके तब बताना चाहिये । बहुत क्या कहें, यह दीपदान करने से हनुमान् जी सब कुछ दे देते हैं ।।८६-९०।। अब मैं तत्त्वज्ञान प्रदान करने वाले दूसरे मन्त्र का वर्णन करूंगा । 'तार (ओं) नमो हनुमते' इतना कहकर तीन बार जाठर (म) का उच्चारण करे । फिर 'दनक्षोभम्' कहकर दो बार 'संहर' यह क्रियापद बोले । उसके बाद 'आत्मतत्त्वम्' बोलकर दो बार 'प्रकाशय' का उच्चारण करे । उसके बाद वर्म (हूँ), अस्त्र (फट्) और वह्निजाया (स्वाहा) का उच्चारण करे । (पूरा मंत्र--ओं नमो हनुमते मम मदनक्षोभं संहर संहर आत्म- तत्त्वं प्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा, यह साढ़े छत्तीस अक्षरों का मन्त्र है । इसके मुनि वशिष्ठ, छंद अनुष्टुप् और देवता हनुमान् हैं । सात, सात, छह, चार, आठ तथा चार मंत्राक्षरों द्वारा षडंगन्यास करके कपीश्वर का इस प्रकार ध्यान करे--पवननंदन आजानबाहु हैं । उनके हाथ में ज्ञानमुद्रा सुशोभित है । वह बैठकर सदा अध्यात्मचिन्तन में लगे रहते हैं । केले के वन में विचरण करते हैं। करोड़ों बालसूर्यों के समान उनकी कान्ति है । वे ज्ञानदायक हैं ।' इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मंत्र को जपे और उसका दशांश घृतयुक्त तेल से हवन करे । पूर्वोक्त पीठ पर पहिले ही की तरह महावीर का पूजन करना चाहिये । उक्त मंत्र का जप करने से कामोद्वेग नहीं होता, प्रत्युत हनुमान् की कृपा से तत्त्वज्ञान की प्राप्ति होती है ।।६१-६७॥ इसके उपरान्त भूतों को छुड़ाने वाला एक अन्य मंत्र बतलाता हूँ, 'ओं श्री महाह्वजनाय पवनपुत्रावेशया- वेशय ओं श्री हनुमते फट् ।' यह पचीस अक्षर का मन्त्र है । इस मन्त्र के मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता हनुमान्, बीज, लक्ष्मी और शक्ति 'फट्' है । छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर किंचित् रक्तमुख बाले सुवर्ण पर्वत के समान शरीरवाले और पारिजात वृक्ष के मूल में अवस्थित होनेवाले हनुमान् का ध्यान करे।