बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 680, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६६१ पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः पयसा स्नपनं रक्तचंदनेनानुलेपनम् । जातीपुष्पैस्तु संपूज्य शुद्धधूपं प्रकल्पयेत् ॥७३॥ घृतेन दीपं दत्त्वाथ पायसान्नं निवेदयेत् । गगनं दीपिकेंद्वार्य्यं शास्त्रं च पुरतो जपेत् ॥७४॥ एवं सप्तदिनं कृत्वा मुच्यते महतो भयात् । अनयोर्भौमवारे तु कुर्य्यादारंभमादरात् ॥७५॥ शत्रुसेनाभये प्राप्ते गैरिकेण तु मंडलम् । कृत्वा तदंतरे तालमीषन्नम्रं समालिखेत् ॥७६॥ तवावलंबमानां च प्रतिमां गोमयेन तु । वामहस्तेन तालाग्रं दक्षिणे ज्ञानमुद्रिका ॥७७॥ तालमूलात्स्रवत्काष्ठार्थी मार्गे हस्तमिते गृहम् । चतुरस्रं विधायथ तन्मध्ये मूर्त्तिमालिखेत् ॥७८॥ दक्षिणाभिमुखीं रम्यां हृदये विहितांजलिम् । तोयेन स्नानगंधादि यथासंभवमर्पयेत् ॥७९॥ कृशरान्नं च नैवेद्यं साज्यं तस्यै निवेदयेत् । किलिद्वयं जपं प्रोक्तमेवं कुर्याद्दिने दिने ॥८०॥ एवं कृते भवेच्छीघ्रं पथिकानां समागमः । श्यामपाषाणखण्डेन लिखित्वा भूपतेर्गृहम् ॥८१॥ प्राकारं तु चतुर्द्वारयुक्तं द्वारेषु तत्र वै । अन्योन्यपुच्छपरिधित्रययुक्तां हनूमतः ॥८२॥ कुर्यान्मूर्त्तिं गोमयेन धत्तूरकुसुमैर्यजेत् । जठामांसीभवं धूपं तैल क्तवृतदीपकम् ॥८३॥ नैवेद्यं तिलतैलाक्तसक्षारा माषरोटिका । ध्येयो दक्षिणहस्तेन रोटिकां भक्षयन्हरिः ॥८४॥ वामहस्तेन पाषाणैस्त्रासयन्परसैनिकान् । मारयन्भ्रुकुटीं बद्ध्वा भीषणन्मथयन्स्थितः ॥८५॥ जपेच्च भुकुभुकिति वै सहस्रं ध्यानतत्परः । एवं कृतविधानेन परसैन्यं विनाशयेत् ॥८६॥ रक्षा भवति दुर्गाणां सत्यं सत्यं न संशयः । प्रयोगा बहवस्तत्र संक्षेपादूगदिता मया ॥८७॥ दूध से नहा कर रक्तचन्दन का लेप लगाये ॥६९-७२॥ फिर जूही के फूलों से उसकी अर्चना कर शुद्ध धूप, घृतदीप तथा पायस नैवेद्य समर्पण करते हुए गगन (ह), दीपिका (ऊ) और इन्दु (अनुस्वार) अर्थात् 'हूँ' शस्त्र (फट्) यह आराध्य देवता के आगे जपे । सात दिनों तक ऐसा करने से महाभय का नाश होता है । इन दोनों कार्यों को सिद्धि के लिये मंगल दिन आदरपूर्वक पूजा आरंभ करनी चाहिए। शत्रुसेना का भय उपस्थित होने पर गेरू से मंडल बनाकर उसके भीतर थोड़ा-सा झुका हुआ एक तालवृक्ष का चित्र लिखे। फिर उस वृक्ष से लटकती हुई एक गोबर की प्रतिमा बनाये । जिसके बाँये हाथ में ताल का अग्रभाग और दाहिने हाथ में ज्ञानमुद्रा हो । तालमूल से एक हाथ अपनी दिशा में एक चौकोर घर का निर्माण कर उसके मध्य में एक सुन्दर प्रतिमा बनाये ॥७३-७८॥ जिसका मुख दक्षिण दिशा की ओर हो और हाथों की अंजलि हृदय पर बंधी हो । उस मूर्ति को जल से स्नान करा कर यथाशक्ति गंध आदि उपचार समर्पण करे एवम् घी-खीर नैवेद्य चढ़ाये । उसके आगे 'किलि-किलि' का जप बताया गया है। ऐसा प्रति दिन करना चाहिये। ऐसा करने से पथिक शीघ्र आ जाता है। काले पत्थर के टुकड़े से राजगृह का निर्माण कर चार द्वार वालो चहारदीवारी बनाये ॥७९-८१॥ तीन द्वारों पर मंडलाकार में हनुमान् की पूँछ की रेखा खींचे और चौथे द्वार पर गोबर से हनुमान् की मूर्ति बनाये । उस मूर्ति की धतूरे के फूलों से पूजा कर जटामांसी के रस से बना धूप, तेल मिलाये घी का दीपक और उड़द की नमकीन पूरी, जो तिल से बनी हुई हो, नैवेद्य समर्पण करे । तदनन्तर हनुमान् के इस स्वरूप का ध्यान करे कि वे दाहिने हाथ से रोटी खा रहे हैं, बाँयें हाथ में पत्थर के टुकड़े लेकर शत्रुसैनिकों को मार रहे हैं और भ्रुकुटी टेढी करके उन्हें डराते हुए मानो कुचल रहे हैं ॥८२-८५॥ पश्चात् ध्याननिष्ठ होकर "भुकू भुकू" इसका एक सहस्र जप करे । ऐसा करने से शत्रुसेना का नाश और दुर्गों की रक्षा होती है। यह बिल्कुल सत्य है । इसमें संदेह करने की