बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 677, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६५८ नारदीयपुराणम् ॥२७॥ नित्ये पंचपलं प्रोक्तमथवा मानसी रुचिः हनुमत्प्रतिमायास्तु सन्निधौ दीपदापनम् । शिवालयॆऽथवा कुर्यान्नित्यनैमित्तिके स्थले ॥२८॥ विशेषोऽस्त्यत्र यः कश्चिन्मारुतेरुच्यते मया ॥२६॥ प्रतिमाये प्रमोदेन ग्रहभूतग्रहेषु च । चतुष्पथे तथा प्रोक्तं षट्सु दीपप्रदापनम् ॥३०॥ सन्निधौ स्फाटिके लिंगे शालग्रामस्य सन्निधौ । नानाभोगश्रियै प्रोक्तं दीपदानम् हनूमतः ॥३१॥ गणेशसन्निधौ विघ्नमहाकंटकनाशने । विषव्याधिभये घोरे हनुमत्सन्निधौ स्मृतम् ॥३२॥ दुर्गायाः सन्निधौ प्रोक्तं संग्रामे दोपदानम् । चतुष्पथे व्याधिनष्टौ दुष्टदृष्टौ तथैव च ॥३३॥ राजद्वारे बंधमुक्तौ कारागारेऽथवा मतम् । अश्वत्थवटमूले तु सर्वकार्यप्रसिद्धये ॥३४॥ वश्ये भये विवादे च वेश्मसंग्रामसंकटे । द्यूते दृष्टेस्तंभने च विद्वेषे मारणे तथा ॥३५॥ मृतकोत्थापने चैव प्रतिमाचालने तथा । विचे व्याधौ ज्वरे भूतग्रहे कृत्याविमोचने ॥३६॥ क्षतग्रंथौ महारण्ये दुर्गे व्याघ्रे च दंतिनि । क्रूरसत्त्वेषु सर्वेषु शश्वद्बंधविमोक्षणे ॥३७॥ पथिकागमने चैव दुःस्थाने राजमोहने । आगमे निर्गमे चैव राजद्वारे प्रकीतितम् ॥३८॥ दीपदानं हनुमतो नात्र कार्या विचारणा ॥३६॥ रुद्रैर्कावशत्पिडांश्च त्रिधा मंडलमानकम् । लघुमानं स्मृतं पंच सप्त वा नव वा तथा ॥४०॥ क्षीरेण नवनीतेन दध्ना वा गोमयेन च । प्रतिमाकरणं प्रोक्तं मारुतेर्दीपदापने ॥४१॥ दक्षिणाभिमुखं वीरं कृत्वा केसरिविक्रमम् ॥४२॥ द्वेष तथा मारण कर्म के लिये लाल रंग की बत्ती बनाये। किसी महान् कार्य की सिद्धि करनी हो तो ग्यारह पलों के प्रमाण से तेल दीपक में डाले। नित्यदीप में पाँच पल अथवा जितनी रुचि हो उतना तेल डाले। हनुमान् को प्रतिमा के समीप में दीपदान करना चाहिये ॥२५-२७१/२॥ शिवालय में या नित्य-नैमित्तिक स्थान में दीपदान कर सकते हैं। इस दोपदान के सन्दर्भ में जो विशेष बातें हैं, वह मैं बतलाता हूँ ॥२१-२९॥ प्रतिमा के आगे हर्षपूर्वक दीप समर्पण करे। इससे दुष्ट ग्रहों एवम् भूतों का उपद्रव शान्त होता है। चौराहे पर, स्फटिकमय शिवलिंग के समीप तथा शालग्राम के निकट दीप चढ़ाना चाहिये। हनुमान् को दीपक चढ़ाने से विविध प्रकार के भोग तथा श्री की प्राप्ति होती है। गणेश के समीप दीपदान करने से विघ्न तथा महासंकट का नाश होता है। भयंकर व्याधि तथा विष का भय दूर करना हो तो हनुमान् को दीप समर्पित करे ॥३०-३२॥ दुर्गा को दीपदान करने से संग्राम में विजय प्राप्त होती है। चौराहे पर दीप जलाने से व्याधि एवम् दृष्टि दोष नष्ट हो जाता है। राजद्वार पर दोप जलाने से बंधनमुक्ति या कारागार से मुक्ति मिलती है ॥३३३॥ पीपल तथा वटवृक्ष के मूल में दीप जलाने से अशेष कार्यों की सिद्धि होती है। वशीकरण, भय, विवाद, घरेलू संकट, रण-संकट, द्यूत, दृष्टि-दोष-निवारण, विद्वेष, मारण, मृतकोत्थापन, प्रतिमाचालन, विष, व्याधि, ज्वर, भूतग्रह, कृत्यामोचन, विस्फोटक, महारण्य, दुर्गम स्थान, बाघ, हाथी तथा भयानक जन्तुओं के भय, बंधनमोचन, पथिक के आगमन, दुष्ट स्थान, राजमोहन और राजद्वार में प्रवेश तथा निर्गमन-इन कार्यों में हनुमान् को दीपदान करने से सफलता मिलती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं। ग्यारह, इक्कीस और पिण्ड-तीन प्रकार का मण्डलमान होता है। पाँच, सात अथवा नौ-इन्हें लघुमान कहा गया है ॥३४-४०॥ दीपदान के समय दूध या मक्खन या दही या गोबर से हनुमान् की प्रतिमा बनानी चाहिये। दीवाल पर या वस्त्र पर या पीठ पर वायुनन्दन का ऐसा चित्र बनाये, जो वीर तथा सिंह तुल्य पराक्रमी दिखाई पड़े, जिसका मुख दक्षिण दिशा की