बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६७६ सप्तसप्ततितमोऽध्यायः अनष्टद्रव्यता चैव नष्टस्य पुनरागमः । दीर्घायुष्यं मनोहर्षः सौकुमार्यमभीप्सितम् ॥१२०॥ अप्रधृष्यतमत्वं च महासामर्थ्यमेव च । संतु मे कार्तवीर्यस्य हैहयेन्द्रस्य कीर्तनात् ॥१२१॥ य इदं कार्तवीर्यस्य कवचं पुण्यवर्धनम् । सर्वपापप्रशमनं सर्वोपद्रवनाशनम् ॥१२२॥ सर्वशांतिकरं गुह्यं समस्तभयनाशनम् । विजयार्थप्रदं नृणां सर्वसंपत्प्रदं शुभम् ॥१२३॥ शृणुयाद्वा पठेद्वापि सर्वकामानवाप्नुयात् । चोरैर्हृतं यदा पश्येत्पश्वादिवधनमात्मनः ॥१२४॥ सप्तवारं तदा जप्येन्निशि पश्चिमदिङ्मुखः । सप्तरात्रेण लभते नष्टद्रव्यं न संशयः ॥१२५॥ सप्तविंशतिधा जप्त्वा प्राचीदिग्वदनः पुमान् । देवासुरनिभं चापि परचक्रं निवारयेत् ॥१२६॥ विवादे कलहे घोरे पंचधा यः पठेदिदम् । विजयो जायते तस्य न कदाचित्पराजयः ॥१२७॥ सर्वरोगप्रपीडासु त्रेधा वा पंचधा पठेत् । स रोगमृत्युवेतालभूतप्रेतैर्न बाध्यते ॥१२८॥ सम्यग्द्वादशधा रात्रौ प्रजपेद्बन्धमुक्तये । त्रिदिनान्निगडाद्बद्धो मुच्यते नात्र संशयः ॥१२९॥ अनेनैव विधानेन सर्वसाधनकर्मणि । असाध्यमपि सप्ताहात्साधयेन्मंत्रवित्तमः ॥१३०॥ यात्राकाले पठित्वेदं मार्गे गच्छति यः पुमान् । न दुष्टचौरव्याघ्राद्यैर्भयं स्यात्परिपंथिभिः ॥१३१॥ जपन्नासेचनं कुर्वञ्जलेनांजलिना तनौ । न चासौ विषकृत्यादिरोगस्फोटैः प्रबाध्यते ॥१३२॥ कार्तवीर्यः खलद्वेषी कृतवीर्यसुतो बली । सहस्रबाहुः शत्रुघ्नो रक्तवासा धनुर्धरः ॥१३३॥ रक्तगंधो रक्तमाल्यो राजा स्मर्तुरभीष्टदः । द्वादशैतानि नामानि कार्तवीर्यस्य यः पठेत् ॥१३४॥ संपदस्तस्य जायन्ते जनास्तस्य वशे सदा । यः सेवते सदा विप्र श्रीमच्चक्रावतारकम् ॥१३५॥ मृत्युहानि, बलोन्नति, भयहानि, यश, कांति, विद्या, ऋद्धि, महाश्री, अनष्टद्रव्यता, नष्ट द्रव्यों की पुनः प्राप्ति, दीर्घायु, मन का उल्लास, सौकुमार्य, अधृष्टता और महासामर्थ्य हैहयेन्द्र के कीर्तन से प्राप्त हों ॥११६-१२१॥ जो कोई इस कार्तवीर्य के पुण्यवर्धक, सकलपापनाशक, सर्वोपद्रवध्वंसक, अखिलशांतिकारक, गोपनीय, समस्तभयनाशन, विजयदायक एवम् निखिलसंपत्तिप्रदायक कवच को सुनेगा या पढ़ेगा, उसको सकल कामनायें सफल होंगी । जब चोर पशु, धन आदि चुरा ले तब रात्रि में पश्चिम मुंह होकर सात बार इस कवच का पाठ करे । सात रात ऐसा करने से अपहृत धन मिल जाता है, इसमें संशय नहीं । यदि मनुष्य पूरव मुंह होकर सत्ताईस बार इसका पाठ करे तो वह देवासुर के समान भी शत्रुचक्र (संग्राम) निवारण (विजय) कर सकता है । विवाद तथा कलह में जो इसका पांच बार पाठ करता है; उसकी विजय होतो है, कभी भी पराजय नहीं । जो सब प्रकार के रोगों में तथा कष्टों में तीन बार या पाँच बार इसका पाठ करता हो, उसे रोग, मृत्यु, वेताल, भूत एवम् प्रेतों का भय नहीं होता । बन्धनमोक्ष के लिये रात्रि में अच्छी तरह बारह बार इसका पाठ करना चाहिए । तीन दिन ऐसा करने से अवश्य बन्धन से छुटकारा मिल जाता है । समस्त साधनाओं में इसी प्रकार करना चाहिए । उत्तम मन्त्रवेत्ता व्यक्ति ऐसा करके एक ही सप्ताह में असाध्य वस्तु को भी सिद्ध कर सकता है । जो मनुष्य यात्राकाल में इसका पाठ करके प्रयाण करता है, उसे दुष्ट, चोर, शत्रु एवम् व्याघ्र आदि का भय नहीं होता । इस कवच को पढ़ कर अंजलि के जल से शरीर को सिक्त करे । ऐसा करने से विष, कृत्या तथा फोड़े आदि रोग नहीं होते । कार्तवीर्य, दुष्टद्वेषी, कृतवीर्यसुत, बली, सहस्रबाहु, शत्रुघ्न, रक्तवासा, धनुर्धर, रक्तगंध, रक्तमाल्य, राजा तथा स्मरण करने वालो को अभीष्टदायक इन बारह नामों का जो पाठ करता है, उसे धन-संपत्ति मिलती है तथा जनता वशीभूत होती है । विप्र ! जो व्यक्ति सदा श्रीमान् कार्तवीर्य का सेवन