बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८३ अष्टसप्ततितमोऽध्यायः रक्षोघ्नाय रिपुघ्नाय भूतघ्नाय नमो नमः । ऋक्षवानरवीरौघप्रासादाय नमो नमः ॥३९॥ परसैन्यबलघ्नाय शस्त्रास्त्रघ्नाय ते नमः । विषघ्नाय द्विषघ्नाय भयघ्नाय नमो नमः ॥४०॥ महारिपुभयघ्नाय भक्तत्राणैककारिणे । परप्रेरितमन्त्राणां मंत्राणां स्तंभकारिणे ॥४१॥ पयःपाषाणतरणकारणाय नमो नमः । बालार्कमंडलग्रासकारिणे दुःखहारिणे ॥४२॥ नखायुधाय भीमाय दन्तायुधधराय च । विहंगमाय शैवाय वज्रदेहाय ते नमः ॥४३॥ प्रतिग्रामस्थितायाथ भूतप्रेतवधार्थिने । करस्थशैलशस्त्राय रामशस्त्राय ते नमः ॥४४॥ कौपीनवाससे तुभ्यं रामभक्तिरताय च । दक्षिणाशाभास्कराय सतां चन्द्रोदयात्मने ॥४५॥ कृत्याक्षतव्यथाघ्नाय सर्वक्लेशहराय च । सर्वाग्निव्याधिसंस्तंभकारिणे भयहारीणे ॥४६॥ भक्तानां दिव्यवादेषु संग्रामे जयकारिणे । किल्किलावुवकाराय घोरशब्दकराय च ॥४७॥ स्वाम्याज्ञापार्थसंग्रामसख्यसंजयकारिणे । सदा वनफलाहारसंतृप्ताय विशेषतः ॥४८॥ महार्णवशिलाबद्धसेतुबंधाय ते नमः । इत्येतत्कथितं विप्र मारुतेः कवचं शिवम् ॥४६॥ यस्मै कस्मै न दातव्यं रक्षणीयं प्रयत्नतः । अष्टगंधैर्विलिख्याथ कवचं धारयेत्तु यः ॥५०॥ कंठे वा दक्षिणे बाहौ जयस्तस्य पदे पदे । किं पुनर्बहुनोक्तेन साधितं लक्षमादरात् ॥५१॥ प्रजप्तमेतत्कवचमसाध्यं चापि साधयेत् ॥५२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे हनुमत्कवचनिरूपणं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥७८॥ अंगों में महाशक्ति-प्रहार-जन्य व्रणों को छुड़ाने वाले, राक्षसों को मारने वाले, शत्रुओं को मारने वाले तथा भूतों के निहन्ता को नमस्कार है । रीछों, वानरों तथा वीरों के समूह को प्रसन्न करने वाले, शत्रुसेना का नाश करने वाले तथा शस्त्रास्त्रों के विध्वंसक को नमस्कार है । विषघ्न, शत्रुघ्न तथा भयघ्न को नमस्कार है । महाशत्रु के भय से मुक्त कराने वाले, भक्तों का त्राण करने वाले, शत्रुपेरित मन्त्रों का स्तंभन करने वाले और जल पर पाषाणों को तैराने वाले को नमस्कार है । बालसूर्यमण्डल का ग्रास करने वाले, दुःख हरने वाले, नख रूप आयुध वाले, भयंकर, दन्त रूप आयुधधारी, विहंगमरूप, शिवरूप तथा वज्रदेह को नमस्कार है ॥३८-४३॥ प्रत्येक गांव में रहने वाले, भूत-प्रेतों का वध करने वाले, हाथों में पर्वत तथा शस्त्र धारण करने वाले, राम के शस्त्ररूप, कौपीन- धारी, रामभक्ति-निरत, दक्षिणदिशाभास्कर और सज्जनों के लिये चन्द्ररूप को नमस्कार है । कृत्याकृत व्रणों की व्यथा को हरने वाले, समस्त क्लेशों का नाश करने वाले, स्वामी की आज्ञा से अर्जुन के साथ संग्राम तथा मित्रता करने वाले, भक्तों को महाविवाद तथा रण में विजय दिलाने वाले, किलकिलाहट का शब्द करने वाले, घोर शब्द करने वाले, सकल अग्नियों एवम् व्याधियों का स्तम्भन करने वाले, भयहारी, सदा वनीय फलों के आहार से संतृप्त होने वाले, महासागर में शिलाखण्डों से सेतु बाँधने वाले को नमस्कार है ।” विप्र ! यह हनुमान् का पवित्र कवच मैंने बतला दिया ॥४४-४९॥ इसे जिस किसी को नहीं देना, यत्नपूर्वक रक्षा करना । जो मनुष्य अष्टगन्धों से इस कवच को लिखकर कंठ या दक्षिण बाहु में धारण करता है, उसकी विजय पग-पग पर होती है । बहुत कहने से क्या लाभ ? जो इस कवच का लाख बार पाठ करता है, वह असाध्य को भी सिद्ध कर लेता है ॥५०-५२॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यान युक्त तृतीयपाद में हनुमत्कवचनिरूपण नामक अठहत्तरवां अध्याय समाप्त ॥७८॥