सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 701, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 701

६८२ नारदीयपुराणम् डाकिनीशाकिनीमारीकालरात्रिमरीचिकाः । शयानं मां विभुः पातु पिशाचोरगराक्षसीः ॥२२॥ दिव्यदेहधरो धीमान्सर्वसत्त्वभयंकरः । साधकेंद्रावतः शश्वत्पातु सर्वत एव माम् ॥२३॥ यद्रूपं भीषणं दृष्ट्वा पलायंते भयानकाः । स सर्वरूपः सर्वज्ञः सृष्टिस्थितिकरोऽवतु ॥२४॥ स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः साक्षाद्देवो महेश्वरः । सूर्यमंडलंगः श्रीदः पातु कालत्रयेऽपि माम् ॥२५॥ यस्य शब्दमुपाकर्ण्य दैत्यदानवराक्षसाः । देवा मनुष्यास्तिर्यंचः स्थावरा जङ्गमास्तथा ॥२६॥ सभया भयनिर्मुक्ता भवंति स्वकृतानुगाः । यस्यानेक्कथाः पुण्याः श्रूयंते प्रतिकल्पके ॥२७॥ सोऽवतात्साधकश्रेष्ठं सदा रामपरायणः । वैधावधातृप्रभृति यत्किंचिद्दृश्यतेऽत्यलम् ॥२८॥ विद्धि व्याप्तं यथा कीशरूपेणांजनेन तत् । यो विभुः सोऽहमेषोऽहं स्वीयः स्वयमणुर्बृहत् ॥२९॥ ऋग्यजुः सामरूपश्च प्रणवस्त्रिवृदध्वरः । तस्मै स्वस्मै च सर्वस्मै नतोऽस्म्यात्मसमाधिना ॥३०॥ अनेकानन्तब्रह्माण्डधृते ब्रह्मस्वरूपिणे । समीरणत्मने तस्मै नतोऽस्म्यात्मस्वरूपिणे ॥३१॥ नमो हनुमते तस्मै नमो मारुतसूनवे । नमः श्रीरामभक्ताय श्यामाय महते नमः ॥३२॥ नमो वानरवीराय सुग्रीवसख्यकारिणे । लंकाविदहनाथाय महासागरतारिणे ॥३३॥ सीताशोकविनाशाय राममुद्राधराय च । रावणांतनिदानाय नमः सर्वोत्तरातने ॥३४॥ मेघनादमखध्वंसकारणाय नमोनमः । अशोकवनविध्वंसकारिणे जयदायिने ॥३५॥ वायुपुत्राय वीराय आकाशोदरगामिने । वनपालशिरश्छेत्रे लंकाप्रासादभंजिने ॥३६॥ ज्वलत्कांचनवर्णाय दीर्घलांगूलधारिणे । सौमित्रिविजयदात्रे च रामदूताय ते नमः ॥३७॥ अक्षयस्य वधकर्त्रे च ब्रह्मास्त्रनिवारिणे । लक्ष्मणांगमहाशक्तिजातक्षतविनाशिने ॥३८॥

करें । डाकिनी, शाकिनी, कालरात्रि, मरीचिका, पिशाच, सर्प तथा राक्षसी से विभु मेरी रक्षा करें ॥१९-२२॥ दिव्यदेहधारी, साधकरक्षक, धीमान् तथा समस्त जीवों के लिये भयंकर विभु सदा सब प्रकार से मेरी रक्षा करें। जिनके भीषण रूप को देख कर भयानक जीव भाग जाते हैं, वे सर्वरूप, सर्वज्ञ तथा सृष्टि-स्थितिकारी मेरी रक्षा करें । स्वयं ब्रह्मा, स्वयं विष्णु, साक्षात् महेश्वर, सूर्यमण्डलगामी तथा श्रीदायक तीनों काल में मेरी रक्षा करें। जिनके शब्द सुनकर दैत्य, दानव, राक्षस, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर एवम् जंगम भयभीत हो जाते हैं; भक्तगणों का भय दूर हो जाता है और प्रतिकल्प में जिनकी अनेक पवित्र कथायें सुनी जाती हैं, वे रामपरायण देव सदा उत्तमसाधक की रक्षा करें । धाता, विधाता आदि जो कुछ देखे जाते हैं, वे कीशरूप अंजनिपुत्र से व्याप्त हैं। जो परमात्मा हैं, वही मैं हूँ और वही हनुमान् हैं। ये सूक्ष्म एवम् महान् भी हैं। ऋक्, यजु, प्रणव, त्रिवृत् एवम् यज्ञ इनका रूप है । इनको, अपने को तथा सबको मैं आत्मसमाधि रूप से प्रणाम करता हूँ ॥२३-३०॥ अनेक एवम् अनंत ब्रह्मांडधारी, ब्रह्मरूपी तथा आत्मस्वरूपी पवनपुत्र को प्रणाम है । हनुमान् को नमस्कार है । वायुसुत को नमस्कार है । वानरवीर तथा सुग्रीव को मित्रता करा देने वाले को नमस्कार है । लंकादाह करने वाले, महासागर लांघने वाले, सीता का शोक हरने वाले, राम की मुद्रिका धारण करने वाले, रावण के नाश का कारण होने वाले और सर्वश्रेष्ठारमा कहलाने वाले को नमस्कार है। मेघनाद के यज्ञ को ध्वस्त करने वाले को नमस्कार है । अशोक वन को उजाड़ने वाले, जयदायी, वायुपुत्र, वीर, आकाशगामी, वनरक्षकों के शिर फोड़ने वाले, लंका के भवनों को विनष्ट करने वाले, जाज्वल्यमान सुवर्ण के समान कान्ति वाले, लम्बी पूँछ वाले, लक्ष्मण को विजय दिलाने वाले, रामदूत को नमस्कार है ॥३१-३७॥ अक्षयकुमार का वध करने वाले, ब्रह्मास्त्र का निवारण करने वाले, लक्ष्मण के

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 701, कुल 1008 में से · BharatKosha