बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 700, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टसप्ततितमोऽध्यायः ६८१ भविष्यदेतन्निर्दिष्टं बालभावेन नारद । श्रीरामेणांजनासूनोर्मुक्तिप्रदायकम् ॥७॥ हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः । पातु प्रतीच्यामक्षघ्नः सौम्ये सागरतारकः ॥८॥ उर्द्धं पातु कपिश्रेष्ठः केसरिप्रियनंदनः । अधस्ताद्विष्णुभक्तस्तु पातु मध्ये च पावनिः ॥६॥ लंकाविदाहकः पातु सर्वापद्भ्यो निरंतरम् । सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनंदनः ॥१०॥ भालं पातु महावीरो भ्रुवोर्मध्ये निरंतरम् । नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ॥११॥ कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामकिंकरः । नासाग्रमंजनासुनुः पातु वक्त्रं हरीश्वरः ॥१२॥ पातु कंठे तु दैत्यारिः स्कंधौ पातु सुरारिजित् । भुजौ पातु महातेजाः करौ च चरणायुधः ॥१३॥ नखान्नखायुधः पातु कुक्षौ पातु कपीश्वरः । वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुधः ॥१४॥ लंका विभंजनः पातु पृष्ठदेशे निरंतरम् । नाभिं श्रीरामभक्तस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ॥१५॥ गुह्यं पातु महाप्राज्ञः सक्थिनी अतिथिप्रियः । ऊरू च जानुनी पातु लंकाप्रासादभंजनः ॥१६॥ जंघे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबलः । अचलोद्धारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ॥१७॥ अङ्गानि पातु सत्त्वाढ्यः पातु पादांगुलीः सदा । मुखांगानि महाशूरः पातु रोमाणि चात्मवान् ॥१८॥ दिवारात्रौ त्रिलोकेषु सदागतिसुतोऽवतु । स्थितं व्रजंतमासीनं पिबंतं जक्षतं कपिः ॥१६॥ लोकोत्तरगुणः श्रीमान् पातु ह्यंतकसंभवः । प्रमत्तमप्रमत्तं वा शयानं गहनेऽम्बुनि ॥२०॥ स्थलेंऽतरिक्षे ह्यग्नौ वा पर्वते सागरे द्रुमे । संग्रामे संकटे घोरे विराड्रूपधरोऽवतु ॥२१॥ रहा हूँ। इसे यत्र-तत्र नहीं प्रकाशित करना । नारद ! श्रीराम ने हनुमान् के इस भुक्ति-मुक्तिदायक कवच को बालभाव से मुझे बतलाया था ॥३-७॥ (यह इस तरह है—) “पूर्व दिशा में हनुमान् मेरी रक्षा करें ! दक्षिण में पवनात्मज रक्षा करें । पश्चिम में अक्षघ्न और उत्तर में समुद्रतारक रक्षा करें । ऊपर कपिश्रेष्ठ केसरीप्रियनंदन, नीचे विष्णुभक्त, मध्य में पवनसुत और समस्त आपत्तियों से लंकादाहक सदा मेरी रक्षा करें । सुग्रीवसचिव मेरे मस्तक की रक्षा करें । वायुनंदन भाल की और महावीर भौंहों के बीच की निरंतर रूप से रक्षा करें । छाया हरण करने वाले नेत्रों को, कपीश्वर कपोलों की और श्रीरामकिंकर कर्णमूल की रक्षा करें । अंजनीपुत्र नाक के अग्रभाग की तथा हरीश्वर मुख की रक्षा करें । दैत्यारि कण्ठ की और सुरारिजित् स्कंधों की रक्षा करें । महतेजा बाँहों की और चरणायुध हाथों की रक्षा करें । नखायुध नखों की और कपीश्वर पेट की रक्षा करें । मुद्रापहारी छाती की और भुजायुध पार्श्व की रक्षा करें । लंका के विध्वंसक मेरे पृष्ठदेश की निरन्तर रूप से रक्षा करें । श्रीरामभक्त नाभि की और अनिलात्मज कमर की रक्षा करें ॥८-१५॥ गुह्य की रक्षा महाप्राज्ञ करें और हद्दियों की अतिथिप्रिय । लंका के भवनों को नष्ट करने वाले ऊरुओं तथा जानुओं की रक्षा करें । कपिश्रेष्ठ जंघाओं की और महाबल गुल्फों (घुटने) की रक्षा करें । पर्वतोद्धारक चरणों की और सूर्यतुल्य अंगों की रक्षा करें । सत्त्वाढ्य अंगुलियों की सदा रक्षा करें और मुखांगों की महाशूर तथा आत्मवान् रोमों की रक्षा करें । त्रिलोकी में सदा गमन करने वाले वायु के पुत्र दिन-रात मेरी रक्षा करें । उठते, बैठते, चलते, पीते और खाते कपि मेरी रक्षा करें । प्रमत्त या अप्रमत्त होते हुए, अथाह जल में डूबते हुए मुझे लोकोत्तर गुण वाले और शंकर से उत्पन्न होने वाले श्रीमान् हनुमान् बचायें । स्थल पर, अन्तरिक्ष में, अग्नि में, पर्वत पर, सागर में, वृक्ष पर, संग्राम में तथा घोर संकट में विराड्रूपधारी मेरी रक्षा ८६ ना० पु०