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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 704, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 704

एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ६८५ धनुर्विभज्य समिति लब्धवान्मानिनोऽस्य च । ततो मागं भृगुपतेर्दपं मूढं चिरं स्मयन् ॥१३॥ व्यपनीयागमं पश्चादयोध्यां स्वपितुः पुरीम् । ततो राज्ञाहमाज्ञाय प्रजाशीलनमानसः ॥१४॥ यौवराज्ये स्वयं प्रीत्या सम्मंत्र्याप्तैर्विकल्पितः । तच्छ्रुत्वा सुप्रिया भार्या कैकयी भूपतिं मुने ॥१५॥ देवकार्यविधानार्थं विदूषितमतिर्जगौ । पुत्रो मे भरतो नाम यौवराज्येऽभिषिच्यताम् ॥१६॥ रामश्चतुर्दशसमा दण्डकान्प्रविवास्यताम् । तदाकर्ण्याहमुद्युक्तोऽरण्यं भार्यानुजान्वितः ॥१७॥ गंतुं नृपतिनानुक्तोऽप्यगमं चित्रकूटकम् । । तत्र नित्यं वन्यफलैर्मांसैश्चावर्तितक्रियः ॥१८॥ निवसन्नेव राजस्तु निधनं चाप्यवागमम् । ततो भरतशत्रुघ्नौ भ्रातरौ मम मानदौ ॥१९॥ मातृवर्गयुतौ दीनौ साचार्यामात्यनागरौ । व्यजिज्ञपतमागत्य पंचवट्यां निजाश्रमम् ॥२०॥ अकल्पयं भ्रातृभार्यासहितश्च त्रिवत्सरम् । ततस्त्रयोदशे वर्षे रावणो नाम राक्षसः ॥२१॥ मायया हृतवान्सीतां प्रियां मम परोक्षतः । ततोऽहं दीनवदन ऋष्यमूकं हि पर्वतम् ॥२२॥ भार्यामन्वेषयन्प्राप्तः सख्यं हर्यधिपेन च । अथ वालिनमाहत्य सुग्रीवस्तत्पदे कृतः ॥२३॥ सह वानरयूथैश्च साहाय्यं कृतवान्मम । विरुध्य रावणेनालं मम भक्तो विभीषणः ॥२४॥ आगतो ह्यभिषिच्याशु लंकेशो हि विकल्पितः । हत्वा तु रावणं संख्ये सपुत्रामात्यबांधवम् ॥२५॥ सीतामादाय संशुद्धामयोध्यां समुपागतः । ततः कालांतरे विप्र सुग्रीवश्च विभीषणः ॥२६॥ निमंत्रितौ पितुः श्राद्धे षट्कुलाश्च द्विजोत्तमाः । अयोध्यायां समाजग्मुस्ते तु सर्वे निमंत्रिताः ॥२७॥ ऋते विभीषणं तत्र चिंतयाने रघूत्तमे । शंभुर्ब्राह्मणरूपेण षट्कुलैश्च सहागतः ॥२८॥ अथ पृष्टो मया शंभुर्विभीषणसमागमे । नीत्वा मां द्रविडे देशे मोचय द्विजबंधनात् ॥२९॥ से जिसके लिये प्रण किया गया था, विवाह किया। मार्ग में परशुराम के दर्प को चूर करते हुए अपने पिता की राजधानी अयोध्या पहुँचा। तब मुझ पर प्रजा अनुरक्त रहती थी, यह जान कर पिता ने मंत्रियों से सलाह लेकर मेरा राज्याभिषेक करना चाहा। किन्तु उनकी अत्यन्त प्रिय भार्या कैकेयी, जिसकी बुद्धि को देवताओं ने स्वकार्य-संपादन के लिये भ्रष्ट कर दिया था, राजा के समीप जाकर कहने लगी—मेरे पुत्र भरत को युवराज के पद पर अभिषिक्त कीजिये और राम को चौदह वर्ष का वनवास दीजिये।" यह सुनकर पिता के न कहने पर मैंने स्त्री तथा अनुज सहित चित्रकूट को चल दिया। वहाँ पहुँच कर वन्य फल तथा मांस से जीवन निर्वाह करते हुए हम रहने लगे। इसी समय मेरे पिता का भी देहान्त हो गया ।। १७-१८३॥ तब मेरे मनस्वी दो भाई भरत और शत्रुघ्न ने मातृसमूह, आचार्य, मन्त्री तथा नागरिकों के साथ पंचवटी में मेरे आश्रम पर आकर सब समाचार सुनाया (अर्थात् अयोध्या लोट चलने के लिये मुझसे प्रार्थना की; किन्तु मैंने उन्हीं को समझा-बुझा लौटा दिया)। अनन्तर अनुज तथा स्त्री के साथ तीन वर्षों तक वहाँ रहा। तेरहवें वर्ष में रावण नामक राक्षस ने मेरी प्रिया सीता को मेरे परोक्ष में माया से हर लिया। तब मैं दीन वदन होकर प्रियतमा को ढूंढ़ते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचा। वहाँ वानराधीश सुग्रीव से मित्रता कर बाली को मारा और सुग्रीव को उसके पद पर प्रति- ष्ठित किया। फिर संग्राम में पुत्र, अमात्य तथा बांधव सहित रावण को मारकर अग्निपरीक्षा से शुद्ध की हुई सीता को लेकर अयोध्या आया। विप्र ! वहाँ कुछ दिनों के उपरान्त सुग्रीव, विभीषण तथा अपने छह कुलों को पिता के श्राद्ध में निमंत्रित किया। उस श्राद्ध में एक विभीषण को छोड़कर सब आये ।।१९-२७३।। ब्राह्मण का रूप धारण कर शंकर भी छह कुलों के साथ आये। जब मैंने विभीषण के आने के बारे में शंकर से पूछा तब उन्होंने कहा,