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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 705, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 705

६८६ नारदीयपुराणम् मया निमंत्रितः श्राद्धे ह्यगस्त्याद्या मुनीश्वराः । संभोजितास्तु प्रययुः स्वस्वमाश्रममंडलम् ॥३०॥ ततः कालांतरे विप्रा देवा दैत्या नरेश्वराः । गौतमेन समाहूताः सर्वे यज्ञसभाजिताः ॥३१॥ ते सर्वे स्फाटिकं लिंगं त्र्यंबकाद्रौ निवेशितम् । संपूज्य न्यवंसंस्तत्र देवदैत्यनृपाग्रजाः ॥३२॥ तस्मिन्समाजे वितते सर्वलिंगे समर्चिते । गौतमोऽप्यथ मध्याह्ने पूजयामास शंकरम् ॥३३॥ सर्वे शुक्लांबरधरा भस्मोद्धूलितविग्रहाः । सितेन भस्मना कृत्वा सर्वस्थाने त्रिपुंड्रकम् ॥३४॥ नत्वा तु भार्गवं सर्वे भूतशुद्धि प्रचक्रमुः । हृत्पद्ममध्ये सुषिरं तत्रैव भूतपञ्चकम् ॥३५॥ तेषां मध्ये महाकाशमाकाशे निर्मलामलम् । तन्मध्ये च महेशानं ध्यायेद्दीप्तिमयं शुभम् ॥३६॥ अज्ञानसंयुक्तं भूतं समलं कर्मसंगतः । तं देहमाकाशदीपे प्रदहेज्ज्ञानवह्निना ॥३७॥ आकाशस्यावृति चाहं दग्ध्वाकाशमथो दहेत् । दग्ध्वाकाशमथो वायुमग्निभूतं तथा वहेत् ॥३८॥ अब्भूतं च ततो दग्ध्वा पृथिवीभूतमेव च । तदाश्रितान्गुणान्दग्ध्वा ततो देहं प्रवाहयेत् ॥३९॥ एवं प्रदग्ध्वा भूतादि देही तज्ज्ञानवह्निना । शिखामध्यस्थितं विष्णुमानंदरसनिर्भरम् ॥४०॥ निष्पन्नचंद्रकिरणसंकाशकिरणं शिवम् । शिवांगोत्पन्नकिरणैरमृतद्रवसंयुतैः ॥४१॥ सुशीतला ततो ज्वाला प्रशांता चंद्ररश्मिवत् । प्रसारितसुधारश्मिः सांद्रीभूतश्च संप्लवः अनेन प्लावितं भूतग्रामं संचितयेत्परम् ॥४२॥ इत्थं कृत्वा भतशुद्धिं क्रियार्हो मर्त्यः शुद्धो जायते ह्येव सद्यः । पूजां कतुं जप्यकर्मापि पश्चाद्देवं ध्यायेद्ब्रह्महत्यादिशुद्ध्यै ॥४३॥


मुझे द्रविड़ देश में ले जाकर द्विज-बंधन से मुक्त कीजिये। पश्चात् श्राद्ध में निमन्त्रित अगस्त्य आदि मुनिवर अच्छी तरह भोजन करके अपने-अपने आश्रम को गये ॥२८-३०॥ पुनः कुछ काल के उपरान्त गौतम ने यज्ञ समारोह में ब्राह्मण, देवता, दैत्य, राजा आदि सबको बुलाया। सबों ने कैलास पर्वत पर स्फटिकमय शिवलिंग की प्रतिष्ठा कर उनकी पूजा की। देव, दैत्य तथा राजशिरोमणियों ने जब लिंग की अर्चना कर ली तब मध्याह्न में गौतम ने भी शंकर की आराधना की। समस्त उपासक श्वेत वस्त्र पहने, संपूर्ण शरीर में भस्म रमाये और सब स्थानों में उज्ज्वल भस्म का त्रिपुण्ड लगाये हुए थे। सब ने शिव को प्रणाम कर भूतशुद्धि क्रिया की। वह क्रिया इस तरह की जाती है कि हृत्पद्म के मध्य में सुषिर (छिद्र) तथा उस सुषिर के मध्य में पंच महाभूतों का ध्यान करे ॥३१-३५॥ महाभूतों के मध्य में महाकाश, आकाश में प्रकाश और प्रकाश में देदीप्य- मान शुभमूर्ति महेश का संस्मरण करे। अज्ञान से संपृक्त भूत समल है। इससे कर्म का संयोग होने पर शरीर बनता है। उस शरीर को ज्ञानाग्नि के द्वारा आकाश दीप में जलाये। फिर आकाश के आवरण को जला- कर आकाश को जलाये। फिर वायु, अग्नि, पृथिवि तथा तदाश्रित गुणों को देह को जलाये। इस प्रकार भूतादि को ज्ञानाग्नि से जलाकर देही शिखामध्यस्थित विष्णु तथा शिव का इस प्रकार ध्यान करे कि विष्णु आनन्द स्वरूप हैं और शिव चंद्रकिरण के समान शीतल तथा धवल हैं। शिव के अंगोत्पन्न किरणों से जो अमृत टपकाती है, चन्द्ररश्मि की तरह प्रशांत ज्वाला निकलती है। उससे अमृत की सघन वर्षा होती है, जिससे भूतसमूह आप्लावित हो जाता है ॥३६-४२॥ इस तरह भूतशुद्धि क्रिया करने से मनुष्य शुद्ध हो जाता है। ब्रह्महत्या आदि दोष निवारण के लिये भी भूतशुद्धि करनी चाहिये। इसे कर लेने के बाद ही पूजा, जप, ध्यान आदि करे।