भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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५२ नारदीयपुराणम् इत्युक्त्वा कपिलः क्रुद्धो नेत्राभ्यां ससृजेऽनलम् । स वह्निः सागरान्सर्वान्भस्मसादकरोत्क्षणात् ॥११०॥ यन्नेत्रजानलं दृष्ट्वा पातालतलवासिनः । अकालप्रलयं मत्वा चुक्रुशुः शोकलालसाः ॥१११॥ तदग्नितापिता सर्वे दन्दशूकाश्च राक्षसाः । सागरं विविशुः शीघ्रं सतां कोपो हि दुःसहः ॥११२॥ अथ तस्य महीपस्य समागम्याध्वरं तदा । देवदूत उवाचेदं सर्वं वृत्तं हि यत्क्षते ॥११३॥ एतत्समाकर्ण्य वचः सगरः सर्ववित्प्रभुः । दैवेन शिक्षिता दुष्टा इत्युवाचाति हर्षितः ॥११४॥ माता वा जनको वापि भ्राता वा तनयोऽपि वा । अधर्मं कुरुते यस्तु स एव रिपुरिष्यते ॥११५॥ यस्त्वधर्मेषु निरतः सर्वलोकविरोधकृत् । तं रिपुं परमं विद्याच्छास्त्राणामेष निर्णयः ॥११६॥ सगरः पुत्रनाशेऽपि न शुशोच मुनीश्वर ! । दुर्दान्तनिधनं यस्मात्सतामुत्साहकारणम् ॥११७॥ यज्ञेष्वनधिकारत्वादपुत्राणामिति स्मृतेः । पौत्रं तमंशुमन्तं हि पुत्रत्वे कृतवान्प्रभुः ॥११८॥ असमञ्जस्सुतं तं तु सुधियं वाग्विदांवरम् । युयोज सारविद्भूयो ह्यश्वानयनकर्मणि ॥११९॥ स गतस्तद्विलद्वारे दृष्ट्वा तं मुनिपुङ्गवम् । कपिलं तेजसां राशिं साष्टाङ्गं प्रणनाम ह ॥१२०॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा विनयेनाग्रतः स्थितः । उवाच शान्तमनसं देवदेवं सनातनम् ॥१२१॥ अंशुमानुवाच दौःशील्यं यत्कृतं ब्रह्मन्मत्पितृव्यैः क्षमस्व तत् । परोपकारनिरताः क्षमासारा हि साधवः ॥१२२॥ दुर्जनेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । नहि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः ॥१२३॥ बाध्यमानोऽपि सुजनः सर्वेषां सुखकृद्भवेत् । ददाति परमां तुष्टिं भक्ष्यमाणोऽमरैः शशी ॥१२४॥ वह देखता है ॥६६-१०६॥ यह कहकर कपिल मुनि ने क्रुद्ध होकर अपने नेत्रों से महानल उत्पन्न किया जिसने तत्काल उन सगर पुत्रों को जला कर भस्म कर दिया । उस ऋषि के नेत्रों से उत्पन्न उस अग्नि को देखकर सभी पातालवासी प्राणी अकाल प्रलय समझ कर शोकमग्न होकर हाहाकार करने लगे । उस अग्नि की ज्वाला से दग्ध होकर सभी नाग और राक्षस शीघ्र ही समुद्र में घुस गए क्योंकि सज्जनों का कोप सबके लिए दुःसह होता है ॥११०-११२॥ तदनन्तर देवदूत ने उस राजा सगर के यज्ञ में आकर उन सारी घटनाओं को कह सुनाया । इन बातों को सुनकर सर्वज्ञ भूमिपति सगर यह कहकर कि स्वयं दैव ने ही उन दुष्टों को अच्छी शिक्षा दी; अति प्रसन्न हुए । माता-पिता-भाई या पुत्र चाहे कोई हो यदि वह अधर्म करता है तो वह शत्रु ही समझा जाता है । सब लोकों का विरोधी जो व्यक्ति सर्वदा पापकर्म में निरत रहता है उसको बहुत बड़ा शत्रु समझना चाहिए, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है ॥११३-११६॥ मुनीश्वर ! सगर पुत्रनाश को देखकर भी शोकातुर नहीं हुए, क्योंकि दुराचारियों की मृत्यु सज्जनों के उत्साह का ही कारण है । 'यज्ञों में पुत्ररहित का अधिकार नहीं है' इस स्मृति- वचन का स्मरण कर राजा ने अंशुमान् को ही अपना पुत्र बनाया । उस तत्त्वविद् सगर ने असमंजस् के उस परम विनीत और विद्वान् पुत्र को पुनः अश्व लाने के कार्य में नियुक्त किया । वह उस बिल द्वार से पाताल पहुँचा और तेजोनिधान उस मुनि श्रेष्ठ को देखकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया । वह हाथ जोड़कर विनीत भाव से उस मुनि के सम्मुख उपस्थित हुआ और शान्त सनातन देव-देव की स्तुति करने लगा ॥११७-१२१॥ अंशुमान् बोला- ब्रह्मन् ! मेरे पितृव्यों ने जो कुछ अविनय दिखाया है उसको आप क्षमा कर दें, क्योंकि सर्वदा परोपकार में रत रहने वाले साधुजन क्षमा की मूर्ति होते हैं । साधुजन दुष्टप्राणियों पर भी दया दिखाते हैं। चन्द्र चाण्डालों के घर पर से अपनी किरणें नहीं हटाते हैं। सज्जन दूसरों से कष्ट पाने पर भी सबको सुखी ही बनाते हैं; क्योंकि देवताओं का भक्ष्य बनकर भी चन्द्रमा उनको सुखी ही बनाता है। चन्दन स्वयं भग्न होकर और कटकर भी अपनी सुगन्ध से दूसरों को सुगन्धित ही करता है।