भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

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अष्टमोऽध्यायः ५३ दारितश्छिन्न एवापि ह्यामोदेनैव चन्दनः । सौरभं कुरुते सर्वं तथैव सृजनो जनः ॥१२५॥ क्षान्त्या च तपसाचारैस्तद्गुणज्ञा मुनीश्वराः । संजातं शासितुं लोकांस्त्वां विदुः पुरुषोत्तम ॥१२६॥ नमो ब्रह्मन्मुने तुभ्यं नमस्ते ब्रह्ममूर्त्तये । नमो ब्रह्मण्यशीलाय ब्रह्मध्यानपराय च ॥१२७॥ इति स्तुतो मुनिस्तेन प्रसन्नवदनस्तदा । वरं वरय चेत्याह प्रसन्नोऽस्मि तवानघ ॥१२८॥ एवमुक्ते तु मुनिना ह्यंशुमान्प्रणिपत्य तम् । प्रापयासम्पितॄन्ब्राह्मं लोकमित्यभ्यभाषत ॥१२९॥ ततस्तस्यातिसंतुष्टो मुनिः प्रोवाच सादरम् । गङ्गामानीय पौत्रस्ते नयिष्यति पितॄन्दिवम् ॥१३०॥ त्वत्पौत्रेण समानीता गङ्गा पुण्यजला नदी । कृत्वैतान्धूतपापांन्वैनयिष्यति परं पदम् ॥१३१॥ प्रापयेनं हयं वत्स यतः स्यात्पूर्णमध्वरम् । पितामहान्तिकं प्राप्य साश्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥१३२॥ सगरस्तेन पशुना तं यज्ञं ब्राह्मणैः सह । विधाय तपसा विष्णुमाराध्याय पदं हरेः ॥१३३॥ जज्ञे ह्यंशुमतः पुत्रो दिलोप इति विश्रुतः । तस्माद्भागीरथो जातो यो गङ्गामानयद्दिवः ॥१३४॥ भगीरथस्य तपसा तुष्टो ब्रह्मा ददौ मुने । गङ्गां भागीरथ्यायाः चिंतयामास धारणे ॥१३५॥ ततश्च शिवमाराध्य तद्द्वारा स्वर्णदीं भुवम् । आनीय तज्जलंः स्पृष्ट्वा पुतान्निन्ये दिवं पितॄन् ॥१३६॥ भगीरथान्वये जातः सुदासो नाम भूपतिः । तस्य पुत्रो मित्रसहः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥१३७॥ वसिष्ठशापात्प्राप्तः स सौदासो राक्षसों तनुम् । गङ्गाबिन्दुनिषेवेण पुनर्मुक्तो नृपोऽभवत् ॥१३८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्यं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ ऐसा ही सज्जनों का भी स्वभाव होता है ॥१२२-१२५॥ आपके गुणों के जानने वाले मुनिवर आपको पुरुषोत्तम समझते हैं—जो कि अपनी शान्ति, तपस्या और सदाचार से लोक को शिक्षा देने के लिए यहां आए हुए हैं। ब्रह्मन् ! मुने ! ब्रह्ममूर्ति आपको नमस्कार है। ब्राह्मणों के रक्षक ब्रह्मध्यानपरायण आपको नमस्कार करता हूँ। अंशुमान् की इस प्रकार की स्तुति सुनकर मुनि प्रसन्न हो गए और कहा कि अनघ ! वर मांगो। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ! मुनि की ऐसी बातें सुनकर अंशुमान् उनके चरणों पर गिर पड़ा और कहा कि किसी प्रकार मेरे पितरों को ब्रह्मलोक पहुंचाइये । अंशुमान् की प्रार्थना सुनकर मुनि प्रसन्न हो गए और आदर पूर्वक बोले—तुम्हारा पौत्र गंगा को पृथ्वो पर लाकर तुम्हारे पितरों को स्वर्ग पहुँचा देगा ॥१२६-१३०॥ तुम्हारे पौत्र से लाई हुई पुण्यसलिला गंगा इन मृत पितरों को निष्पाप बनाकर परम पद पर पहुँचा देगी। वत्स ! इस अश्व को तुम अपने यहाँ ले जाओ जिससे कि यज्ञ पूर्ण हो जाय । अंशुमान् ने अपने पितामह के निकट जाकर अश्व और पितरोद्धार की सारी कथा कह दी। सगर ने ब्राह्मणों की सहायता से उस पशु के द्वारा यज्ञ समाप्त किया और विष्णु की आराधना कर विष्णुलोक को प्राप्त किया अंशुमान् से दिलोप नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, दिलोप से भगीरथ हुआ, जिसने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा। मुने ! भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को तो दे दिया परन्तु 'गंगा को कौन धारण करेगा ?' इसको चिन्ता करने लगे । तब भगीरथ ने शिव की आराधना की उनकी सहायता से देवनदी गंगा को पृथ्वी पर लाकर उसके जल से अपने पितरों को पवित्र किया और उनको स्वर्ग पहुँचाया । उस भगीरथ के कुल में सुदास नामक भूपति उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र मित्रसह विश्व में विख्यात हुआ । वसिष्ठ के शाप से मित्रसह को राक्षस-शरीर प्राप्त हो गया था, परन्तु गंगाजल के स्पर्श से वह भूपति-श्रेष्ठ पुनः शुद्ध हो गया ॥१३१-१३७॥ श्रीनारदीयपुराण में गंगामाहात्म्य-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥८॥