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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 727, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 727

७०८ नारदीयपुराणम् किं बहुक्तेन विप्रर्षे यादृशो वानरेश्वरः । बुद्धौ न्याये च वै धैर्ये तादृगन्योऽस्ति न क्वचित् ॥३५५॥ इति ते सर्वमाख्यातं चरितं पापनाशनम् । पठतां शृण्वतां चैव गच्छ विप्र यथासुखम् ॥३५६॥ तच्छ्रुत्वा रामभद्रस्य रघुनाथस्य धीमतः । वचनं दक्षिणीकृत्य नत्वा चागां यथागतः ॥३५७॥ एतत्सर्वमभिहितं विप्र चरितं च हनूमतः । सुखदं मोक्षदं सारं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥३५८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे हनुमच्चरितं नाम एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥७९॥ अशीतितमोऽध्यायः सूत उवाच श्रुत्वा तु नारदो विप्राः कुमारवचनं मुनिः । यत्पप्रच्छ पुनस्तच्च युष्मभ्यं प्रवदाम्यहम् ॥१॥ कार्तवीर्यस्य कवचं तथा हनुमतोऽपि च । चरितं च महत्पुण्यं श्रुत्वा भूयोऽब्रवीद्वचः ॥२॥ नारद उवाच साधु साधु मुनिश्रेष्ठ त्वयातिकरुणात्मना । श्रावितं चरितं पुण्यं शिवस्य च हनूमतः ॥३॥ आज्ञा दी। मुनीश्वर ! तब से मैं पवननन्दन को शिव की ही तरह मानता हूँ । विप्रर्षे ! बुद्धि, न्यास तथा धैर्य में जैसा हनुमान् है वैसा कहीं कोई नहीं है । यह संपूर्ण चरित्र, जिसके पढ़ने-सुनने से पापों का क्षय होता है, मैंने वर्णन कर दिया । अब आप सुखपूर्वक प्रस्थान कीजिए ॥३५२-३५६॥” धीमान् रघुकुलनायक रामचन्द्र का यह वचन सुनकर मैं प्रदक्षिणापूर्वक प्रणाम करके चल पड़ा । विप्र ! यह हनुमान् का सुख तथा मोक्ष देने वाला चरित्र तुम्हें सुना दिया । अब बोलो, दूसरा क्या सुनना चाहते हो ? ॥३५७-३५८॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में हनुमच्चरित्र वर्णन नामक उन्यासीवाँ अध्याय समाप्त ॥७९॥ अध्याय ८० श्रीकृष्ण-सम्बन्धी मंत्रों की अनुष्ठानविधि सूतजी बोले-विप्रवृन्द ! सनत्कुमार की बात सुनकर मुनि नारद ने पुनः जो प्रश्न किया, वह मैं आप लोगों को बता देता हूँ । कार्तवीर्य तथा हनुमान् का कवच एवम् पुण्यदायक चरित्र सुनकर नारद ने यह कहा- नारद बोले-मुनिश्रेष्ठ ! आप अत्यन्त कृपालु हैं । आपने जो शिव तथा हनुमान् का पवित्र चरित्र