बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 726, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण एवं यथावत् लिप्यंतरण है:
एकोनाशीतितमोऽध्यायः [दाएँ पृष्ठ संख्या: ७०७] देवोऽथ वीरमाहूय किं वीरेत्यब्रवीद्वचः । वीरोऽप्याह कपेर्लिंगे पीठाभावादिदं कृतम् ॥३३८॥ तच्छ्रुत्वाऽह शिवो देवो मुनींस्तान्भयविह्वलान् । कपेश्चित्तं परिज्ञातुं मया कृतमिदं द्विजाः ॥३३९॥ मा भैष्ट भवतां सौख्यं सदा संपादयाम्यहम् । इत्युक्त्वा तु यथापूर्वं देवदेवः कृपानिधिः ॥३४०॥ दधानप्यखिलाँल्लोकान्पूर्वतः शोभनान्विभुः । कल्पयामास विश्वात्मा वीरभद्रमथाब्रवीत् ॥३४१॥ साधु वत्स यतो भद्रं भक्तानामीहसे सदा । ततस्ते विपुला कीर्तिर्लोके स्थास्यति शाश्वती ॥३४२॥ इत्युक्त्वालिङ्ग्य शिरसि समाघ्राय महेश्वरः । तांबूलं वीरभद्राय दत्तवान्प्रीतमानसः ॥३४३॥ अथासौ हनुमानीशपूजनं कृतवान्यथा । समाप्तायां तु पूजायां हनुमान्प्रीतमानसः ॥३४४॥ एकं वनचरं तत्र गंधर्वं सविपंचकम् । ददर्श तमथाभ्याह वीणा मे दीयतामिति ॥३४५॥ गंधर्वोऽप्याह न मया त्याज्या वीणा प्रिया मम । ममापीष्टेह गंधर्व वीणेत्याह कपीश्वरः ॥३४६॥ यदा न दत्ते गंधर्वो वल्लकीं कपये प्रियाम् । तदा मुष्टिप्रहारेण गंधर्वः पातितः क्षितौ ॥३४७॥ वीणामादाय महतीं स्वरतंतुसमन्विताम् । हनुमान्वानरश्रेष्ठो गायन्रागाञ्छिवांतिकम् ॥३४८॥ ततो गानेन महता प्रसाद्य जगदीश्वरम् । बृहतीकुसुमैः शुद्धैर्देवपादावपूजयत् ॥३४९॥ ततः प्रसन्नो विश्वात्मा मुनीनां सन्निधौ तदा । दैत्यानां देवतानां च नृपाणां शंकरोऽपि च ॥३५०॥ तस्मै वरमथ प्रादात्कल्पांतं जीवितं पुनः । समुद्रलंघनं शक्ति शास्त्रज्ञत्वं बलोन्नतिम् ॥३५१॥ एवं दत्तं वरं प्राप्य महेशेन महात्मना । प्रत्यक्षं मम विप्रेंद्र हनुमान्हर्षमागतः ॥३५२॥ समस्तभूषासुविभूषितांगः स्वदीप्तिमंदीकृतदेवदीप्तिः । प्रसन्नमूर्तिस्तरुणः शिवांशः संभावयामास समस्तदेवान् ॥३५३॥ आज्ञप्तो हनुमांस्तत्र मत्सेवाये मुनीश्वरः । महेशेनाहमप्येनं शशिमौलिमवैमि च ॥३५४॥
[हिन्दी अनुवाद]
'हाँ, कपि को लिंगपीठ न मिलने के कारण मैंने ऐसा किया है।' ॥३२९-३३८॥ वीर की बात सुन कर भग- वान् शंकर ने भयविह्वल मुनियों से कहा—'द्विजगण ! कपि की परीक्षा करने के लिये मैंने ऐसा किया। आप लोग डर मत करें। आपलोगों को मैं सदा आनन्दित रखूंगा।' इतना कह कर कृपानिधि एवम् विश्वात्मा शंकर ने निखिल लोकों को यथापूर्व सुशोभित कर दिया। पुनः वीरभद्र से कहा 'वत्स ! साधुवाद ! तुम सदा मेरे भक्तों का हित चाहते हो। इसलिये लोक में तुम्हारी विपुल एवम् शाश्वती कीर्ति रहेगी।' यह कह कर महेश्वर ने वीरभद्र का आलिंगन करते हुए मस्तक संघा तथा हर्षित मन से उन्हें तांबूल दिया। तब हनुमान् ने शिवलिंग की पूजा की। पूजा समाप्ति के बाद प्रसन्नचित्त हनुमान् ने वीणा बजाते हुए एक गंधर्व को देखकर उससे वीणा मांगी, परन्तु गंधर्व ने उत्तर दिया 'नहीं, मैं वीणा नहीं दे सकता। यह मुझे बहुत प्रिय है।' जब गंधर्व ने कपिश्रेष्ठ हनुमान् को अपनी प्रिय वीणा नहीं दी तब उन्होंने मुष्टिप्रहार से उसे निहत कर पृथ्वी पर गिरा दिया और स्वरतन्तुयुक्त वीणा लेकर गाते हुए शिव के समीप पहुँचे ॥३३९-३४७॥ वहाँ महासंगीत से जगदीश्वर को प्रसन्न कर बृहती वृक्ष के कुसुमों से शिव के चरणों की पूजा की। तब प्रसन्न होकर शिवात्मा शंकर मुनियों, दैत्यों, देवताओं तथा नृपों के समक्ष हनुमान् को वर दिया कि 'तुम कल्पांत तक जीवित रहो, समुद्र लांघने का सामर्थ्य, शास्त्रज्ञता तथा बलोन्नति तुम्हें प्राप्त हो ॥३३९-३५१॥" विप्रवर ! इस प्रकार महात्मा महेश से वर प्राप्त कर मेरे सामने ही हनुमान् आनन्द से विभोर हो गया। वह प्रसन्नमूर्ति तरुण हनुमान्, जो शिव का अंश ही है, अपनी कान्ति से देवगणों की प्रभा को मन्द करते हुए संपूर्ण अङ्गों में आभूषण धारण कर अत्यन्त सुशोभित हुआ। अनन्तर शङ्कर ने उसे मेरी सेवा करने की