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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 725, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 725

७०६ नारदीयपुराणम् नमस्ते शिवायादिदेवाय कुर्मो नमो व्यालयज्ञोपवीतप्रधर्त्रे । नमस्ते सुराविन्दुवर्षार्पनाय त्रयीमूर्तये कालकालाय नाथ ॥३२४॥ धरित्रीमरुद्व्योमतोयेन्दुवह्निप्रभामंडलात्माष्टधाम्नेतिधत्रे । शिवायाशिवघ्नायवीराय भूयात्सदा नः प्रसन्नो जगन्नाथकेज्यः ॥३२५॥ कलानाथभालाय आत्मा महात्मा मनो ह्यप्रयानो निरूप्यो न वाग्भिः । जगज्जाड्यविध्वंसनो भुक्तिमुक्तिप्रदः स्तात्प्रसन्नः सदा शुद्धकीर्तिः ॥३२६॥ यतः संप्रसूतं जगज्जातमीशात्स्थितं येन रक्षावता भावितं च । लयं यास्यते यत्र वाचां विदूरे स वै नः प्रसन्नोऽस्तु कालत्रयात्मा ॥३२७॥ यदादिं च मध्यं तथांतं न केऽपि विजानन्ति विज्ञा अपि स्वानुमानाः । स वै सर्वमूर्तिः सदा नो विभूत्यै प्रसन्नोऽस्तु किं ज्ञापयामोऽत्र कृत्यम् ॥३२८॥ एतां स्तुतिमथाकर्ण्य भगनेत्रप्रदः शिवः । विष्णुमाह मुनीनेतानानयस्व मदंतिकम् ॥३२६॥ अथ विष्णुः समागत्य तपोलोकनिवासिनः । मुनीन्सांत्वय्य विश्वेशं दर्शयामास शंकरम् ॥३३०॥ तानाह शंकरो वाक्यं किमर्थं यूयमागताः । तपो लोकाद्भूमिकों मुनयो मुक्तकिल्बिषाः ॥३३१॥ तच्छ्रुत्वा शूलिनो वाक्यं प्रोचुस्ते मुनिसत्तमाः । देव द्वादशलोकानां दृश्यंते भस्मराशयः ॥३३२॥ स्थितमेकं वनमिदं पश्य तल्लोकसंक्षयम् । तच्छ्रुत्वा गिरिशः प्राह तान्मुनीनूर्ध्वरेतसः ॥३३३॥ भूर्लोकस्य तु संदाहे पातालानां तथैव च । सन्देहो नास्ति मुनयः स्थितानां नो रहःस्थले ॥३३४॥ ऊर्ध्वपंचकलोकानां दाहे संवेह एव नः । कथमंगारवृष्टिश्च कथं नो वा महाध्वनिः ॥३३५॥ तदाकर्ण्य विभोर्वाक्यं शंकरस्य मुनीश्वराः । प्रोचुः प्रांजलयो देवं बह्मादिसुरसंगतम् ॥३३६॥ भीतिरस्माकमधुना वर्तते वीरभद्रतः । स एवांगारवृष्टिं च पिपासुरपिवद्विभोः ॥३३७॥ प्रसन्न हों। ललाट पर इन्दु धारण करने वाले, आत्मा एवम् महात्मस्वरूप, मन से परे, वाणी से अनिर्वचनीय, जगत् की जड़ता के विध्वंसक, भुक्तिमुक्तिदायक और विमल यश वाले देव सदा हम पर प्रसन्न हों। जिनसे संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय होता है और जो वाचामगोचर हैं, वे त्रिकालात्मा देव हम पर प्रसन्न हों। जिनके आदि, अन्त तथा मध्य को कोई नहीं जानता तथा विज्ञ पुरुष भी जिनके विषय में अपना अनुमान ही लगाते हैं, वे सर्वमूर्ति देव हमें प्रसन्न होकर ऐश्वर्य प्रदान करें, और हम क्या निवेदन करें ॥३१६-३२८॥ इस स्तुति को सुन कर भग देवता को नेत्र देने वाले शिव विष्णु से बोले- 'इन मुनियों को मेरे समीप ले आओ।' तब केशव तपोलोक निवासी मुनियों को सान्त्वना देते हुए ले आये और विश्वेश शंकर का दर्शन करा दिया। शंकर ने उनसे पूछा 'निष्पाप मुनियो ! आपलोग किस लिये तपोलोक से भूमिलोक में पधारे हैं? शंभु की बात सुन कर मुनिवरों ने उत्तर दिया--'देव ! बारह लोक तो भस्मसात् हो गये। एक हमारा ही लोक बच गया है। वह भी अब नष्ट होने वाला है।' यह सुन कर गिरीश ने उन ऊर्ध्वरेता मुनियों से कहा- 'भूलोक तथा पातालों का दाह हो सकता है, इसमें मुझे सन्देह नहीं है, पर ऊपरवाले पाँच लोकों के दग्ध होने में मुझे सन्देह हो रहा है। वहाँ कैसे अग्निवृष्टि तथा महाशब्द हो सकता है !? विभु शंकर की बात सुन कर मुनीश्वरों ने हाथ जोड़ कर ब्रह्मा आदि सहित महादेव से कहा-'भगवन् ! हमें डर तो वीरभद्र से हो रहा है। वे ही इस अग्निवृष्टि के उत्पादक हैं।' तब पशुपति ने वीरभद्र को बुलाकर पूछा-'क्या यह बात ठीक है ?' वीर ने उत्तर दिया