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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 724, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 724

एकोनाशीतितमोऽध्यायः ७०५ इति निश्चित्य मनसा जजाप शतरुद्रियम् । यदा तु न समायातो महेशोऽथ कपीश्वरः ॥३११॥ रुद्रं न्यपातयद्भूभौ वीरभद्रः समागतः । किमर्थं रुद्यते भद्र रुदिते कारणं वद ॥३१२॥ तच्छ्रुत्वा प्राह हनुमान्वीरभद्रं मनोगतम् । पीठहीनमिदं लिंगं पश्य मे पापसंचयम् ॥३१३॥ वीरभद्रस्ततः प्राह श्रुत्वा कपिसमीरितम् । यदि नायाति पीठं ते लिंगे मा साहसं कुरु ॥३१४॥ दाहयिष्याम्यहं लोकान्यदि नायाति पीठकम् । पश्य दर्शय मे लिंगं पीठं चात्रागतं न वा ॥३१५॥ अथ दृष्ट्वा वीरभद्रो लिंगे पीठमनागतम् । दग्धुकामोऽखिलाँल्लोकान्वीरभद्रः प्रतापवान् ॥३१६॥ अनलं भुवि चिक्षेप क्षणाद्दग्धा मही तदा । अथ सप्ततलान्दग्ध्वा पुनरूर्ध्वमवर्ततं ॥३१७॥ पञ्चोर्ध्वलोकानदहज्जनलोकनिवासिनः । ललाटनेत्रसंसूतं नखेनादाय चानलम् ॥३१८॥ जंबीरफलसंकाशं कृत्वा करतले विभुः । तपः सत्यं च संदग्धुमुद्यतोऽभून्मुनीश्वरः ॥३१९॥ ततस्तु मुनयो दृष्ट्वा तपोलोकनिवासिनः । दग्धुकामं वीरभद्रं गौतमाश्रममागताः ॥३२०॥ न दृष्ट्वा तत्र देवेशं शंकरं स्वात्मनि स्थितम् । अस्तुवन्भक्तियुक्ताः स्तोत्रैर्वेदसमुद्भवैः ॥३२१॥ ओं वेदवेद्याय देवाय तस्मै शुद्धप्रभाचिन्त्यरूपाय कस्मै । ब्रह्माद्यधीशाय सृष्ट्यादिकर्त्रे विष्णुप्रियायार्तिहृदेंतकर्त्रे ॥३२२॥ नमस्तेऽखिलाधीश्वरायांबराय नमस्ते चरस्थावर व्यापकाय । नमो वेदगुह्याय भक्तिप्रियाय नमः पाकभोक्त्रे मखेशाय तुभ्यम् ॥३२३॥

परन्तु ऐसा करने पर भी जब पीठ नहीं आया तब कपीश्वर ने लिंग को भूमि पर रख दिया। रखते ही वीरभद्र आ धमके और पूछने लगे- 'भद्र ! क्यों तुम रो रहे हो ? रोने का कारण बतलाओ।' यह सुनकर हनुमान् ने वीरभद्र से अपना अभिप्राय यों व्यक्त किया कि मैं बड़ा पापो हूँ। इसी कारण यह लिंग पीठहीन हो गया है। तब वीरभद्र कपि की बात सुनकर कहने लगे- 'यदि पीठ नहीं आता है तो लिंग का पूजन मत करो। यदि यही होगा तो मैं संपूर्ण ब्रह्माण्ड को जला दूंगा। तुम देखो, ओर मुझे दिखाओ कि पीठ अब तक आया है कि नहीं।' इतना कहकर वीरभद्र ने लिग को देखा; किन्तु पीठ नहीं आया था। तब प्रतापो वीरभद्र निखिल लोकों को जला डालने की इच्छा से पृथ्वी पर अग्नि प्रक्षेप किया। क्षण भर में पृथ्वी जल गई। सातों तलों (पाताल आदि) को जला कर वह अगिन ऊपर के लोकों को जलाने लगी ॥३११-३१५॥ जब पाँच ऊर्ध्व लोक तथा जन लोक निवासी जल चुके तब शक्तिमान् वीरभद्र अपने ललाटस्थ नेत्र से उद्भूत अग्नि को नख से तोड़-तोड़ कर नींबू के बराबर बना दिया और उससे सत्यलोक को दग्ध करना चाहा। तब तपोलोकनिवासी मुनिगण वीरभद्र की यह इच्छा जानकर गौतमाश्रम में पहुँचे। परन्तु वहाँ शंकर को न देखकर वे अपने हृदस्थित विभु की भक्तिपूर्वक वेदमूलक स्तोत्रों से स्तुति करने लगे- "वेदों से जानने योग्य, शुद्ध प्रभा के तुल्य तथा अचिन्त्यरूप देव को नमस्कार है। ब्रह्मा आदि के अधीश, सृष्टि आदि के कर्ता, विष्णु के प्रिय, अतिनाशक, संहारकारक, सब के अधीश्वर दिगंबर को नमस्कार है। चराचर में व्याप्त रहने वाले देव को नमस्कार है। वेदों में अप्रमेय कहे जाने वाले भक्तप्रिय को नमस्कार है। हविर्पाकभोक्ता यज्ञेश को नमस्कार है। शिव, आदिदेव, व्यालरूपी यज्ञोपवीत के धारण करने वाले को नमस्कार है। चन्द्रधारी, वेदमूति तथा कालनाथ को नमस्कार है। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, चंद्र, अग्नि, प्रभा तथा मंडल रूप आठ मूर्तियों को धारण करने वाले, कल्याण रूप, अकल्याण का नाश करने वाले, वीर को नमस्कार है। पूज्य जगन्नाथ सदा मेरे ऊपर ८६ ना० पु०