बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७०४ नारदीयपुराणम् भूषणं च तथा छत्रं चामरव्यजने अपि । उपवीतं च कथं षोडशोपचारकान् ॥२६५॥ द्वात्रिंशदुपचारैस्तु यः समाराधयेच्छिवम् । एकेनाह्ना समस्तानां पातकानां क्षयो भवेत् ॥२६६॥ एतच्छ्रुत्वा हनुमतो वचनं प्राह शंकरः । एवमेतत्कपिश्रेष्ठ यदुक्तं पूजनं मम ॥२६७॥ सारभूतमहं तुभ्यमुपदेश्यामि सांप्रतम् । आराधनं यथा लिंगे विस्तरेण त्वयोदितम् ॥२६८॥ मत्पादयुगलं प्रार्च्य पूजाफलमवाप्नुहि । ततः प्राह कपिश्रेष्ठो देवदेवमुमापतिम् ॥२६९॥ गुरुणालिंगपूजैव नियता परिकल्पिता । तां करोमि पुरा देव पश्चात्त्वत्पादपूजनम् ॥३००॥ इत्युक्त्वेशं नमस्कृत्य शिवलिंगार्चनाय च । सरसस्तीरमागत्य कृत्वा सैकतवेदिकाम् ॥३०१॥ तालपत्रैर्विरचितमासनं पर्यकल्पयत् । प्रक्षाल्य पादौ हस्तौ च समाचम्य समाहितः ॥३०२॥ भस्मस्नानमथो चक्रे पुनराचम्य वाग्यतः । देववेद्यामथो चक्रे पद्मं च सुमनोहरम् ॥३०३॥ अनंतरं तालपत्रे पद्मासनगतः कपिः । प्राणानायम्य संन्यस्य शुक्लध्यानसमन्वितः ॥३०४॥ प्रणम्य गुरुमोशानं जपन्नासीदतः परम् । अथ देवार्चनं कर्तुं यत्नमास्थितवान्कपिः ॥३०५॥ पलाशपत्रपुटकद्वयानीतजलं शुचि । शिरः कमंडलुगतं निधायाग्निनिमंत्रितम् ॥३०६॥ आवाहनादि कृत्वार्थ स्नानपर्यंतमेव च । अथ स्नापयितुं देवमादाय करसंपुटे ॥३०७॥ कृत्वा निरीक्षणं देवपीठं नो दृष्टवान्कपिः । लिङ्गमात्रं करगतं दृष्ट्वा भीतिसमन्वितः ॥३०८॥ इदमाह महायोगी किंवा पापं मया कृतम् । यदेतत्पीठरहितं शिवलिंगं करस्थितम् ॥३०९॥ ममाद्य मरणं सिद्धं न पीठं चागमिष्यति । अथ रुद्रं जपिष्यामि तदायाति महेश्वरः ॥३१०॥ कहलाते हैं । भूषण, छत्र, चामर, व्यजन, यज्ञोपवीत तथा दास्यभाव—ये भी पूजोपचार हैं। इस तरह सोलह उपचारों से पूजा करनी चाहिये । जो व्यक्ति बत्तीस उपचारों से शिव की अर्चना करता है, उसके समस्त पाप एक ही दिन में नष्ट हो जाते हैं ॥२९३-२९६॥” हनुमान् की यह बात सुनकर शंकर ने कहा—'कपिवर ! जो तुमने पूजा का प्रकार निवेदन किया है, उसका निचोड़ मैं तुम्हें कह देता हूँ, देखो, तुमने विस्तारपूर्वक लिंगपूजा का जितना वर्णन किया है, उतना फल तो तुम मेरे पादपूजन से भी प्राप्त कर सकते हो । देवेश्वर उमापति की बात सुनकर कपिश्रेष्ठ हनुमान् ने कहा—'परन्तु गुरु ने मुझे लिंगपूजा ही करने को कहा है। देव ! इसलिये मैं पहिले लिंगपूजा कर लेता हूँ पश्चात् आपके चरणों की अर्चा करूँगा । इतना कहकर महेश को नमस्कार करके शिवलिंगार्चन के लिये पवन- नन्दन सरस्वती नदी के तट पर पहुँचे । वहाँ बालू की वेदिका बना कर तालपत्र का आसन बनाया । हाथ-पैर धो आचमन करके सावधानी से भस्मस्नान किया । पुनः वाक्संयमपूर्वक देववेदी में सुमनोहर पद्म की रचना कर तालपत्र के आसन पर बैठ कर प्राणायामपूर्वक ईश के शुक्ल रूप का ध्यान किया । अनन्तर गुरु महादेव को प्रणाम कर मंत्र जप करके देवार्चन करने के लिये कपि उद्यत हुए ॥२६७-३०५॥ पलाशपत्रों के बने दो पुटकों (दोना) में शुद्ध जल लाकर उसे अभिमंत्रित करके कमंडलु में रखा तथा अपने मस्तक को सिक्त किया । पश्चात् शिवलिंग को स्नान कराने के लिये अपने हाथ में लिया । परन्तु लिंग का पीठ कपि को नहीं दिखाई पड़ा । इससे वे बहुत चिन्तित हुए और कहने लगे—'हाय ! मैंने कौन-सा पाप किया, जिससे पीठ रहित शिव- लिंग मेरे हाथ में पड़ा ? यदि पीठ नहीं मिलेगा तो आज मेरी मृत्यु निश्चित है । अच्छा ! मैं रुद्र का जप करता हूँ, इससे संभवतः आ जाय ।' मन में ऐसा निश्चय करके वे शतरुद्रीपाठ करने लगे ॥३०६-३१०॥