बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 722, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमंतस्तु संशोध्य बहिरंतस्तु शोधयेत् । सुस्निग्धं लघु कृत्वाथ नांगं छिद्यात्कथंचन ॥२८०॥ नीचैकदेशविध्यस्तद्वारद्रोण्या सुहृत्तया । कृशानुयुक्तं स्नानं तु देवाय परिकल्पयेत् ॥२८१॥ एवं गवयश्रृंगस्य जलपूर्तिरथोच्यते । द्वारे निषिद्धलोहार्द्धसंधिद्वारासमन्विते ॥२८२॥ योगवक्रं नागदंडं नागाकारं प्रकल्पयेत् । फलस्थाने तु चषकं दंडेने समरंध्रकम् ॥२८३॥ तत्रैव पातयेत्तोयं मूर्द्धयंत्रघटे स्थितम् । पातयेदथ वाम्येन वामेनैव करेण वा ॥२८४॥ मुक्तिधारा कृता तेन पवित्रं पापनाशनम् । एवं संस्थाप्य देवेशं पंचगव्यैस्तथैव च ॥२८५॥ पंचामृतैरथ स्नाप्य मधुरत्रितयेन च । विभूष्य भूषणैर्देवं पुनः स्नाप्य महेश्वरम् ॥२८६॥ शीतोपचारं कृत्वाथ तत आचमनादिकम् । वस्त्रं तथोपवीतं च गंधद्रव्यकमेव च ॥२८७॥ कर्पूरमगरुं चापि पाटीरमथवा भवेत् । उभयमिश्रितं चापि शिवलिंगं प्रपूजयेत् । कृत्स्नं पीठं गंधपूर्णं यद्वा विभवसारतः । तूष्णीमथोपचारं वा कालीयं पुष्पमेव च ॥२८८॥ श्रीपत्रमरुचित्याज्यं यथाशक्त्यखिलं यथा । अनेकद्रव्यधूपं च गुग्गुलं केवलं तथा ॥२८९॥ कपिलाघृतसंयुक्तं सर्वधूपं प्रशस्यते । धूपं दत्वा यथाशक्ति कपिलाघृतदीपकान् ॥२९०॥ अथवा पूजामात्रेण दीपान्दत्त्वोपहारकम् । नैवेद्यमपूपन्तं च दत्त्वा पुष्पसमन्वितम् ॥२९१॥ मुखशुद्धिं ततः कृत्वा दत्वा तांबूलमादरात् । प्रदक्षिणनमस्कारौ पूजैवं हि समाप्यते ॥२९२॥ गीत्यंगपंचकं पश्चात्तानि विज्ञापयामि ते । गीतिर्वाद्यं पुराणं च नृत्यं हासोक्तिरेव च ॥२९३॥ नीराजनं च पुष्पाणामंजलिश्वाखिलार्पणम् । क्षमापनं चोद्वसनं प्रोक्तं पंचोपचारकम् ॥२९४॥
श्रृंग के भीतर तथा बाहर अच्छी तरह साफ कर उसे चिकना बनाये । वह कटा-फटा नहीं होना चाहिए । उसका निचला भाग ऐसा बनाया जाय, जिससे जल की सूक्ष्मधारा अविच्छिन्न गति से गिरे । पहिले हाथ में कुश लेकर तब शंकर को स्नान कराना चाहिये । इस प्रकार नीलगाय के नर के सींग का बना श्रृङ्ग जल-पूर्ति के लिए कहा गया है । उस श्रृङ्ग के मुखभाग में तथा जोड़ों में वैध धातु को मढ़ देना चाहिए । उस श्रृङ्ग को टेढ़ा, नागदंडाकार या नागाकार बनाना चाहिए । उसका अग्रभाग प्याले की तरह हो और दंड के अन्त में छिद्र हो । उसी छिद्र के द्वारा शिवलिंग के ऊपर स्थापित यंत्र-घट के जल को गिरावे । उस श्रृङ्ग को बायें हाथ या दाहिने हाथ से पकड़कर जल गिराना चाहिए । जो शंकर को मुक्तिधारा (अर्थात् मुक्तिस्नान) कराता है वह पवित्र एवम् पाप- रहित हो जाता है ॥२७९-२८४३॥ देवेश को पंचगव्य, पंचामृत तथा त्रिमधुरयुक्त जल से नहलाकर आभूषणों से विभूषित करे । पुनः स्नान तथा आचमन आदि कराकर वस्त्र, यज्ञोपवीत, सुगंधित द्रव्य, कर्पूर, अगर या चंदन या दोनों से शिवलिंग की पूजा करे । संपूर्ण पीठ को सुवासित करके पूजन करना चाहिये । अथवा अपने सामर्थ्य के अनुसार अर्चना करे । चुपचाप या मंत्रपूर्वक कालीय पुष्प, बिल्वपत्र तथा कुरवक-पुष्पों की राशि, घी, अनेक द्रव्यों का बना धूप तथा केवल गुग्गुल समर्पण करे । कपिला गौ के घी से मिश्रित धूप सर्वोत्तम माना जाता है । यथाशक्ति धूप देकर कपिलाघृतपूर्ण दीप समर्पित करे । तदनन्तर उपहार, नैवेद्य तथा पुष्प समर्पण कर मुखशुद्धि करने के लिये तांबूल अर्पित करे । फिर प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके पूजा समाप्त करे ॥२८५- २९२॥ पश्चात् पांच अंगों से युक्त संगीत करना चाहिये । गीति, वाद्य, पुराण, नृत्य तथा हास्योक्ति- ये पाँचों गीत्यंग कहलाते हैं । नीराजन, पुष्पांजलि, सर्वसमर्पण, क्षमाप्रार्थना तथा उद्धसन-ये पाँचों उपचार