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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 721, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 721

७०२ नारदीयपुराणम्

कृतपद्मासनो वापि स्वस्तिकासन एव वा । दर्भभस्मसमासीनः प्राणानायम्य वाग्यतः ॥२६४॥ तावत्स देवरूपो ध्यानं जातः समाचरेत् । शिखांते द्वादशांगुल्ये स्थितं सूक्ष्मतनुं शिवम् ॥२६५॥ अंतश्चरंतं भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखम् । सर्वारणरसंसंयुक्तमणिमादिगुणान्वितम् ॥२६६॥ ध्यात्वा तं धारयेच्चित्ते तद्दीप्या पूरयेत्तनुम् । तया दीप्या शरीरस्थं पापं नाशमुपागतम् ॥२६७॥ स्वर्णपादेरसंपकार्रक्तं श्वेतं यथा भवेत् । तद्द्वादशदलावृत्तमष्ट पंच त्रिरेव वा ॥२६८॥ परिकल्प्यासनं शुद्धं तत्र लिंगं निधाय च । गुहास्थितं महेशानं लिंगेशं चिंतयेत्तथा ॥२६९॥ शोधिते कलशे तोयं शोधितं गंधवासितन् । सुगन्धपुष्पं निक्षिप्य प्रणवेनाभिमंत्रितम् ॥२७०॥ प्राणायामश्च प्रणवः शूद्रेषु न विधीयते । प्राणायामपदे ध्यानं शिवेत्योंकारसंन्वितम् ॥२७१॥ गन्धपुष्पाक्षतादीनि पूजाद्रव्याणि यानि च । तानि स्थाप्य समीपे तु ततः संकल्पमाचरेत् ॥२७२॥ शिवपूजां करिष्यामि शिवतुष्ट्यर्थमेव च । इति संकल्पयित्वा तु तत आवाहनादिकम् ॥२७३॥ कृत्वा तु स्नानपर्यंतं ततः स्नानं प्रकल्पयेत् । नमस्तेत्यादिमंत्रेण शतरुद्रविधानतः ॥२७४॥ अविच्छिन्ना तु या धारा मुक्तिधारेति कीर्त्तिता । तया यः स्नापयेन्मासं जपन् रुद्रमुखांश्च वा ॥२७५॥ एकवारं त्रिवारं च पंच सप्त नवापि वा । एकादश तथा वारमथैकादशधान्वितम् ॥२७६॥ मुक्तिस्नानमिदं ज्ञेयं मासं मोक्षप्रदायकम् । शैव्या विद्यया स्नानं केवलं प्रणवेन वा ॥२७७॥ मृण्मयैर्नालिकेरस्य शकलैर्रोमभिस्तथा । कांस्येन मुक्ताशुक्त्या च पुष्पादिकेसरेण वा ॥२७८॥ स्नापयेद्देवदेवेशं यथासंभवमीरितैः । शृंगस्य च विधि वक्ष्ये स्नानयोग्यं यथा भवेत् ॥२७९॥


सन या स्वस्तिकासन लगाकर बैठे । कुश तथा भस्म धारण कर वाक्संयमपूर्वक प्राणायाम करे ॥२६१-२६४॥ स्वयं देवरूप बनकर अन्तःकरण में शिव का ध्यान करे । ध्यान इस तरह करे कि मेरी द्वादशांगुलिप्रमाण शिखा के अन्त में सूक्ष्म शरीर वाले, प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले, सब ओर मुख वाले, समस्त आभूषणों एवम् अणिमा आदि गुणों से युक्त शंकर अवस्थित हैं। ध्यानोपरान्त चित्त में उनको धारण कर उनके प्रकाश से अपने शरीर को प्रकाशित करे। ऐसा करने से शरीरस्थ पाप नष्ट हो जाता है। पश्चात् सुवर्ण का बारह या आठ या पाँच या तीन पत्र वाला कमल बना कर उस पर शिवलिंग की स्थापना करे । फिर गुहास्थित महेश लिंगेश का ध्यान कर पवित्र घट में सुवासित निर्मल जल तथा सुगंधित पुष्प डाल कर प्रणव से जल को अभि- मंत्रित करे ॥२६५-२७०॥ परन्तु शूद्र प्राणायाम तथा प्रणवोच्चारण न करे। वह प्राणायाम के बदले ध्यान तथा प्रणव के स्थान में 'शिव' पद का उच्चारण करे । गंध, पुष्प, अक्षत आदि पूजाद्रव्यों को लिंग के समीप रखकर संकल्प करे कि मैं शंकर की प्रसन्नता के लिये शिवपूजा करूंगा। संकल्प करने के उपरान्त आवाहन आदि करके "नमस्ते" इत्यादि मंत्र से शतरुद्री विधान के अनुसार स्नपन करे । जलधारा अविच्छिन्न होनी चाहिये । ऐसी ही धारा मुक्तिधारा कहलाती है । उसी धारा से शतरुद्रीपाठ करते हुए एक मास तक शिव को स्नान कराये । एक बार या तीन बार या पाँच बार या सात बार या नौ बार या ग्यारह बार स्नान कराने का ही नाम मुक्तिस्नान है । एक मास तक ऐसा करने से मोक्ष मिलता है ! स्नान शिव मन्त्र या केवल प्रणव से ही कराना चाहिये । मिट्टी, नारियल, काँसा, मोती तथा सीप के पात्र से पुष्प तथा केसर के साथ महेश का स्नपन करे ॥२७१-२७८१/२॥ अब मैं शृंग का विधान बतलाता हूँ, जिससे समुचित प्रकार से शिव को स्नान कराया जा सकता है ।