बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 720, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनाशीतितमोऽध्यायः ७०१ नमः शिवायेत्युच्चार्यं सर्वाङ्गोद्धूलनं स्मृतम् । प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य दर्भपाणिः समाहितः ॥२४८॥ दर्भाभावे सुवर्णं स्यात्तदभावे गवालुकाः । तदभावे तु दूर्वाः स्युस्तदभावे तु राजतम् ॥२४६॥ संध्योपास्ति जपं देव्याः कृत्वा देवगृहं व्रजेत् । देववेदीमथो वापि कल्पितं स्थंडिलं तु वा ॥२५०॥ मृण्मयं कल्पितं शुद्धं पद्मादिरचनायुतम् । चातुर्वर्णकरं गैरैश्च श्वेतेनैकेन वा पुनः ॥२५१॥ विचित्राणि च पद्मानि स्वस्तिकावि तथैव च । उत्पलादिगदाशंखत्रिशूलडमरूं स्तथा ॥२५२॥ शरोक्तपंचप्रासादं शिवलिंगमथैव च । सर्वकामफलं वृक्षं कुलकं कोलकं तथा ॥२५३॥ षट्कोणं च त्रिकोणं च नवकोणमथापि वा । कोणे द्वादशकांदोलापादुकाब्यजनानि च ॥२५४॥ चामरच्छत्रयुगलं विष्णुब्रह्मादिकांस्तथा । चूर्णैरिवरचेद्वेद्यां धीमान्देवालयेऽपि वा ॥२५५॥ यत्रापि देवपूजा स्यात् तत्रैव कल्पयेद्बुधः । स्वहस्तरचितं मुख्यं क्रीतं चव तु मध्यमम् ॥२५६॥ याचितं तु कनिष्ठं स्याद्वलात्कारमयोऽधनम् । अर्हेषु यत्त्वनर्हेषु बलात्कारात्तु निष्फलम् ॥२५७॥ रक्तशालिजपाशाणकलमासिरक्तकैः । ततंदुलैर्ब्रीहिमाषोत्थैः कणैश्चैव यथाक्रमम् ॥२५८॥ उत्तमैर्मध्यमैश्चव कनिष्ठैरधमैस्तथा । पद्मादिस्थापनैरेव तत्सम्यग्यागमाचरेत् ॥२५६॥ प्रागुत्तरमुखो वापि यदि वा प्राङ्मुखो भवेत् । आसनं च प्रवक्ष्यामि यथादृष्टं यथा श्रुतम् ॥२६०॥ कौशं चार्मं चैलतल्पे दारवं तालपत्रकम् । कांचनं चैव राजतं ताम्रमेव च ॥२६१॥ गोकरीषाकंजैर्वापि ह्याससनं परिकल्पयेत् । वैयाघ्रं रौरवं चैव हारिणं मार्गमेव च ॥२६२॥ चार्मं चतुर्विधं ज्ञेयमथ बंधुकमेव च । यथासंभवमेतेषु ह्यासनं परिकल्पयेत् ॥२६३॥
भस्मस्नान के उपरान्त साधक हाथ धोकर आचमन कर हाथ में कुश ले समाहितचित्त से संध्योपासन तथा जप करे । यदि कुश न मिले तो सुवर्ण, उसके अभाव में गवालुक (गोरोचन), तदभाव में दूर्वा और उसके भी अभाव में चांदी ग्रहण करे । तदनन्तर देवमंदिर (शिवालय) में जाकर देववेदी का निर्माण करे । वेदी मृत्तिका की होनी चाहिये । उसमें गेरू या किसी श्वेत द्रव्य से कमल आदि का चित्र लिखना चाहिये । अर्थात् तरह-तरह के पद्म, स्वस्तिक, उत्पल, गदा, शंख, त्रिशूल, डमरू, पांच प्रासाद, शिवलिंग, सकल कामना रूपी फल वाला वृक्ष, कुलक, कोलक, षट्कोण, त्रिकोण, नवकोण, द्वादश कोण, दोला, पादुका, व्यजन, चामर, छत्र, विष्णु तथा ब्रह्मा आदि देवों के चित्र लिखे ॥२४८-२५४॥ धीमान् व्यक्ति वेदी, देवालय अथवा जहाँ कहीं देव पूजा करे, वहाँ भी इसी प्रकार रचना करे । अपने हाथ से इसकी रचना करना उत्तम है । द्रव्य देकर दूसरे से कराना मध्यम, मंगनी में कराना कनिष्ठ और बलपूर्वक कराना अधम है । योग्य एवम् अयोग्य कर्मों में बलात्कार करने से कर्म निष्फल हो जाता है । लाल चावल, जपाकुसुम, शाण (?), कलमी धान्य, काले और लाल रंग के चावल और सामान्य धान्य के कणों से क्रमशः याग करना चाहिये । उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ और अधम प्रकार के पद्म आदि के स्थापन द्वारा याग का सम्यक् अनुष्ठान करना चाहिए । पूर्व-उत्तर मुंह होकर अथवा पूर्व मुंह होकर कर्म करना चाहिये । अब मैं आसन का विधान, जैसा देखा एवम् सुना है, बतलाता हूँ ॥२५५-२६०॥ कुश, चर्म, वस्त्र, तल्प, दारु, लालपत्र, कंबल, सुवर्ण, चांदी, तांबा, गौ के गोबर तथा आक की लकड़ी का आसन बनाना चाहिये । चर्म चार प्रकार के कहे गये हैं । व्याघ्र चर्म, रुरु चर्म, हरिण चर्म और मृग चर्म से आसन बना सकते हैं । बन्धुक (दपहरिया फूल) के काष्ठ का भी आसन होता है । इन चीजों में से यथासंभव आसन बनाकर उस पर पद्मा-