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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 719, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 719

An exact line-by-line transcription of the Hindi and Sanskrit text in the image:

७०० नारदीयपुराणम् योगगम्याय देवाय ज्ञानिनां पतये नमः । वेदानां पतये तुभ्यं देवानां पतये नमः ॥२३२॥ ध्यानाय ध्यानगम्याय ध्यातॄणां गुरवे नमः । अष्टमूर्ते नमस्तुभ्यं पशूनां पतये नमः ॥२३३॥ अंबकाय त्रिनेत्राय सोमसूर्याग्निरुचक्षुषे । भृङ्गिराजधत्तूरद्रोणपुष्पप्रियस्य ते ॥२३४॥ बृहतीपूगपुन्नागचंपकादिप्रियाय च । नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु भूय एव नमोनमः ॥२३५॥ शिवो हरिमय प्राह मा भैषीर्वद मेऽखिलम् । ततस्त्यक्तत्वा भयं प्राह हनुमान् वाक्यकोविदः ॥२३६॥ शिवलिंगार्चनं कार्यं भस्मोद्धूलितदेहिना । दिवा संपादितैस्तोयैः पुष्पाद्यैरपि तादृशैः ॥२३७॥ देव विज्ञापयिष्यामि शिवपूजाविधिं शुभम् । सायंकाले तु संप्राप्ते अशिरःस्नानमाचरेत् ॥२३८॥ क्षालितं वसनं शुष्कं धृत्वाचम्य त्रिस्सुधीः । अथ भस्म समादाय आग्नेयं स्नानमाचरेत् ॥२३६॥ प्रणवेन समामंत्र्य अष्टवारमथापि वा । पञ्चाक्षरेण मन्त्रेण नाम्ना वा येन केनचित् ॥२४०॥ सप्ताभिमंत्रितं भस्म दर्भपाणिः समाहरेत् । ईशानः सर्वविद्यानामुक्त्वा शिरसि पातयेत् ॥२४१॥ तत्पुरुषाय विद्महे मुखे भस्म प्रसेचयेत् । अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यः भस्म वक्षसि निक्षिपेत् ॥२४२॥ वामदेवाय नमः इति गुह्यस्थाने विनिक्षिपेत् । सद्योजातं प्रपद्याम निक्षिपेदथ पादयोः ॥२४३॥ उद्धूलयेत्समस्तांगं प्रणवेन विचक्षणः । त्रैवर्णिकानामुदितः स्नानादिविधिरुत्तमः ॥२४४॥ शूद्रादीनां प्रवक्ष्यामि यदुक्तं गुरुणा तथा । शिवेति पदमुच्चार्य भस्म संमन्त्रयेत्सुधीः ॥२४५॥ सप्तवारमथादाय शिवायति शिरस्यथ । शंकराय मुख प्रोक्तं सर्वज्ञाय हृदि क्षिपेत् ॥२४६॥ स्थाणवे नम इत्युक्त्वा मुखे चापि स्वयंभुवे । उच्चार्य पादयोः क्षिप्त्वा भस्म शुद्धमतः परम् ॥२४७॥ द्वारा प्राप्य देव, ज्ञानियों के स्वामी, वेदों के पति, देवों के पति, ध्यानरूप ध्यानमग्न तथा ध्यान करने वालों के गुरु को नमस्कार है। अष्टमूर्ते ! आपको नमस्कार है। पशुओं के पति को नमस्कार है। अम्बक तथा त्रिनेत्र को नमस्कार है। सोम, सूर्य तथा अग्निरूप नेत्र वाले, भृंगराज धत्तूर तथा द्रोण पुष्पों के प्रिय और बृहती, पूग, पुन्नाग तथा चंपक आदि के प्रिय को नमस्कार है। आपको नमस्कार है। बार-बार आपको नमस्कार है" ।।२२८-२३५।। इसके बाद शिव ने कपि से कहा—'डर मत करो। मुझे सब कुछ कह डालो।' तब निर्भय होकर वाक्- चतुर हनुमान् बोले--'देव! कल्याण देने वाली शिवपूजा की विधि मैं श्रीमान् से निवेदन करता हूँ। साधक संपूर्ण शरीर में भस्म रमा कर शिवलिंग की अर्चना करे। दिन में जल आदि से पूजन और सायंकाल बिना शिर भिगोये स्नान करके वस्त्र पहन कर सावधानी से तीन बार आचमन करे। तदनन्तर भस्म लेकर आग्नेय स्नान करना चाहिये ।।२३६-२३६।। भस्म को प्रणव से आठ बार आमन्त्रित कर पंचाक्षर मन्त्र या जिस किसी नाम (मन्त्र) से सात बार अभिमन्त्रित करे। फिर हाथ में कुश लेकर 'ईशानः सर्वविद्यानाम्' यह कहते हुए शिर पर भस्म डाले। 'तत्पुरुषायविद्महे' यह पढ़कर मुख में, 'अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यः' यह पढ़ कर छाती में, 'वामदेवाय नमः' यह कह कर गुह्यस्थान में, 'सद्योजातम् प्रपद्यामि' यह कह कर पैरों में और प्रणव का उच्चारण कर संपूर्ण अङ्गों में भस्म लगाये। यह स्नान आदि की विधि तीन वर्णों के लिये उत्तम कही गई है और शूद्र आदि के लिये तो जैसा गुरु ने मुझे बतलाया है, वह मैं निवेदन कर देता हूँ। वे (शूद्र आदि) 'शिव' इस पद का सात बार उच्चारण कर भस्म को अभिमन्त्रित करें। पुनः उसे लेकर 'शिवाय नमः' इसका उच्चारण करते हुए शिर में, 'शंकराय नमः' यह पढ़ते हुए हृदय में, 'सर्वज्ञाय नमः' यह पढ़ते हुए हृदय में, 'स्थाणवे नमः' यह कहते हुए पुनः मुख में 'स्वयंभुवे नमः' यह कहते हुए पैरों में और 'नमः शिवाय' कह कर संपूर्ण अंगों में भस्म लेपे ॥२४०-२४७॥