सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 718, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 718

एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६८६ नासाभूषणमेतत्त्वे सत्यमेव वदामि ते । ततः प्राह शिवा शंभुं स्मित्वा पर्वतनंदिनी ॥२१७॥ अहो त्वन्मंदिरे शंभो सर्ववस्तु समृद्धिमत् । पूर्वमेव मया सर्वं ज्ञातप्रायमभूत्किल ॥२१८॥ सर्वद्रविणसंपत्तिर्भूषणैरेवगम्यते । शिरो विभूषितं देव ब्रह्मशीर्षस्य मालया ॥२१९॥ नरकस्रग् तथा माला वक्षःस्थलविभूषणम् । शेषश्च वासुकिश्चैव सविषौ तव कङ्कणौ ॥२२०॥ दिशोऽम्बरं जटा केशा भसितं चांगरागमम् । महोक्षो वाहनं गोत्रं कुलं चाज्ञातमेव च ॥२२१॥ ज्ञायेते पितरौ नैव विरूपाक्षं तथा वपुः । एवं वदन्तीं गिरिजां विष्णुः प्राहातिकोपनः ॥२२२॥ किमर्थं निंदसे देवि देवदेवं जगत्पतिम् । दुष्प्राणा न प्रिया भद्रे तव नूनमसंयमात् ॥२२३॥ यत्रेशानिंदनं भद्रे तत्र नो मरणव्रतम् । इत्युक्तवाथ नखाभ्यां हि हरिश्चेत्तुं शिरो गतः ॥२२४॥ महेशस्तत्करं गृह्य प्राह मा साहसं कृथाः । पार्वतीवचनं सर्वं प्रियं मम न चाप्रियम् ॥२२५॥ ममाप्रियं हृषीकेश कर्तुं यत्किंचिदिष्यते । ओमित्युक्तवाथ भगवांस्तूष्णींभूतोऽभवद्धरिः ॥२२६॥ हनुमानथ देवाय व्यज्ञापयदिदं वचः । अर्थयामि विनिष्कामं मम पूजाव्रतं तथा ॥२२७॥ पूजार्थमप्यहं गच्छे मामनुज्ञातुमर्हसि । तच्छ्रुत्वा शंकरो देवः स्मित्वा प्राह कपीश्वरम् ॥२२८॥ कस्य पूजा क्व वा पूजा किं पुष्पं किं दलं वद । को गुरुः कश्च मंत्रस्ते कीदृशं पूजनं तथा ॥२२९॥ एवं वदति देवेशे हनुमान्नितिसंयुतः । वेपमान समस्तांग स्तोतुमेवं प्रचक्रमे ॥२३०॥ नमो देवाय महते शंकरायामितात्मने । योगिने योगधात्रे च योगिनां गुरवे नमः ॥२३१॥ फिर नासिका भूषण लेकर कहने लगे--'यह तुम्हारी नाक का आभूषण है, मैं सत्य कहता हूँ। इसे पहन लो।' तब पर्वतनन्दिनी शिवा मुस्कराती हुई बोली--'शंभो; आपके घर में किसी वस्तु की कमी नहीं है, यह पहले ही समझ गई थी। आभूषणों से ही तो प्रचुर धन-संपत्ति का पता चलता है। देखिये न, आपका मस्तक ब्रह्ममुण्डमाला से कैसा शोभित हो रहा है। वक्षःस्थल भी तो आपका नरमुण्डमाला से विभूषित है ॥२१७-२१८३॥ अहा ! यह आपके कंगन विषधर शेष तथा वासुकी हैं, वस्त्र दिशायें हैं, अंगराग भस्म है, वाहन गवेन्द्र है, गोत्र- वंश तो अज्ञात ही है। आपके माता-पिता को भी तो कोई नहीं जानता। शरीर में नेत्र भी दो नहीं तीन हैं।, इस तरह, उपहास करती हुई गिरिजा से विष्णु ने क्रोधपूर्वक कहा- देवि ! क्यों तुम देवदेव जगदीश्वर की निन्दा कर रही हो ? भद्रे ! मालूम पड़ता है कि तुम्हें अपने असंयम के कारण स्वकीय प्राण प्रिय नहीं हैं। शुभे ! जहां शंकर की निंदा होती है वहां हमलोगों को मरणव्रत आरम्भकर देना चाहिये । ॥२१९-२२३३॥ इतना कह कर विष्णु अपने नखों से ही उमा का शिर काटने को तैयार हो गये। परन्तु महेश ने उनका हाथ पकड़ लिया और समझाया-'ऐसा साहस मत करो। पार्वती की सभी बातें मुझे प्रिय लगती हैं, अप्रिय नहीं। हृषिकेश! तुम जो कुछ करने जा रहे हो, वही मुझे अप्रिय लग रहा है।' शिव का वचन सुनकर हरि 'अस्तु' कहते हुए चुप हो गये। तब हनुमान् ने महादेव से निवेदन किया--'देव! मैं निष्काम पूजा व्रत करना चाहता हूँ ॥२२४-२२७॥ इस लिये आप आज्ञा प्रदान कीजिये।' यह सुन कर शंकर मन्द हास्य करते हुए कपीश्वर से बोले-'किसकी पूजा करोगे ? कहाँ करोगे ? पत्र-पुष्प क्या होंगे ! गुरु कौन है ? तथा पूजा किस प्रकार की होगी। देवेश की यह बात सुनकर हनुमान् अत्यंत विनयावनत हो गये । उनके समस्त अंग काँपने लगे। तब उन्होंने इस तरह स्तुति करना प्रारंभ किया- "महान् देव, शंकर, अमितात्मा, योगी, योगघाता तथा योगियों के गुरु को नमस्कार है। योग