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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 729, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 729

७१० नारदीयपुराणम् अथाकाशादिस्थलेषु वासुदेवादिकांस्ततः । वासुदेवः संकर्षणः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः ॥११८॥ नारायणश्च क्रमशः परमेष्ठ्यादिभिर्युताः । परमेष्ठिपुमांछौचविश्वनिवृत्तिसर्वकाः ॥११९॥ श्वेतानिलाग्न्यंबुभूमिवर्णैः प्राग्वत्प्रविन्यसेत् । स्वबीजाद्यं कोपतत्त्वं नृसिंहं व्यापकेन च ॥१२०॥ प्राग्वद्विन्यस्य सर्वांगे तत्त्वन्यासोऽयमीरितः । मकाराद्या आद्यवर्णाः सर्वे स्युश्चंद्रजूर्जिताः ॥१२१॥ वासुदेवादिका ज्ञेया डेंताः साधकसत्तमैः । प्राणायामं ततः कृत्वा पूरकुम्भकरेचकैः ॥१२२॥ चतुर्भिः षड्भिरष्टाभ्यां च मूलमंत्रेण मंत्रवित् । केचिदाहुरिहाचार्याः प्राणायामोत्तरं पुनः ॥१२३॥ पीठन्यासं विधायाथ न्यासानन्यान्समाचरेत् । दशतत्त्वानि विन्यस्य वक्ष्यमाणविधानतः ॥१२४॥ मूर्तिपंजरनामानं पूर्वोक्तं विन्यसेद्बुधः । सर्वांगे व्यापकं कृत्वा किरीटमनुना सुधीः ॥१२५॥ ततस्तारपुटं मंत्रं व्यापय्य करयोस्त्रिशः । पंचांगुलीषु करयोः पंचांगं विन्यसेत्ततः ॥१२६॥ त्रिशो मूलेन मूर्द्धादिपादांतं व्यापकं न्यसेत् । सकृदुच्चारय्य तारेण मंत्रन्यासं ततश्चरेत् ॥१२७॥ शिरोललाटे भ्रूमध्ये कर्णयोश्चक्षुषोस्तथा । घ्राणयोर्वदने कंठे हृदि नाभौ तथा पुनः ॥१२८॥ कट्यां लिंगे जानुनोश्च पादयोर्विन्यसेत्क्रमात् । हृदंतान्मंत्रवर्णांश्च ततो मूर्ध्नि ध्रुवं न्यसेत् ॥१२९॥ पुनर्नयनयोरास्ये हृदि गुह्ये च पादयोः । विन्यसेद्धृदयांतानि मनोः पंचपदानि च ॥१३०॥ आदि स्थलों में (अर्थात् मूर्ध, मुख, हृदय, गुह्य तथा चरणों में) परमेष्ठि आदि सहित वासुदेव आदिकों का क्रमशः न्यास करे । वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ये वासुदेवादि कहलाते हैं ॥११८-११९॥ और परमेष्ठी, पुमान्, शोच, विश्व, निवृत्ति तथा सर्वक-ये परमेष्ठी कहे गये हैं । परमेष्ठि पुरुष आदि क्रमशः श्वेतवर्ण, अनिलवर्ण, अग्निवर्ण, अम्बुवर्ण तथा भूमिवर्ण के हैं । इन सब का पूर्ववत् न्यास करे । (यथा श्वेतवर्णपरमेष्ठिपुरुषात्मने वासुदेवाय नमः मूर्धनि । अनिलवर्णशोचात्मने संकर्षणाय नमः मुखे । अग्निवर्णविश्वात्मने प्रद्युम्नाय नमः हृदये । अम्बुवर्णानिवृत्त्यात्मनेऽनिरुद्धाय नमः गुह्ये । भूमिवर्णसर्वात्मने नारायणाय नमः पादयोः । ओं क्ष्रौं कोप- तत्त्वात्मने नमः नृसिंहाय नमः इति सर्वांगे) । इस प्रकार सम्पूर्ण अंग में न्यास करे । यह तत्त्वन्यास कहा गया है। इसी प्रकार श्रेष्ठ साधकों को यह जानना चाहिये कि वासुदेव आदि नामों के विभक्त्यन्त रूप ही न्यास में ग्राह्य है । तत्त्वन्यास के बाद मंत्रज्ञ पुरुष मूलमंत्र को चार बार पढ़कर पूरक, छह बार पढ़कर कुम्भक और दो बार पढ़कर रेचक करते हुए प्राणायाम सम्पन्न करे । किन्हीं आचार्यों का कथन है कि प्राणायाम के बाद पीठ- न्यास करके फिर अन्य न्यासों को करे । आगे कहे जानेवाले विधान के अनुसार दस तत्त्व आदि का न्यास करके पूर्वोक्त मूर्तिपंजर नामक न्यास करे । पुनः किरीटमंत्र से संपूर्ण अंगों में व्यापक न्यास कर प्रणवसंपुटित मंत्र को तीन बार दोनों हाथों की पांचों अंगुलियों में न्यस्त करे । उसके बाद तीन बार पंचांग न्यास करे । फिर मूल मन्त्र से मस्तक से लेकर चरण तक व्यापक न्यास करे ॥११९-२६ १/२॥ फिर केवल प्रणव द्वारा एक एक व्यापक न्यास करके मन्त्रन्यास करे । अनन्तर शिर, ललाट, भौंहों के मध्य, कर्ण, नेत्र, नासिका, मुख, कंठ, हृदय, नाभि, कटि, लिंग, जानु तथा चरणों में क्रमशः न्यास करे । पुनः नेत्र, मुख, हृदय, गुह्य तथा दोनों चरणों में क्रमशः पांच पदों का अन्त में 'नमः' लगाकर न्यास करे (यथा-क्लीं नमः नेत्रद्वये । कृष्णाय नमः मुखे । गोविन्दाय नमः हृदये । गोपीजनवल्लभाय नमः गुह्ये । स्वाहा नमः पादयोः) पुनः ऋषि आदि न्यास करके पूर्वोक्त पंचांग न्यास करे ॥२७-३० १/२॥