बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअशीतितमोऽध्यायः ७१५
भूयो मुन्यादिकं न्यस्य पंचांगं पूर्ववन्न्यसेत् । अथ वक्ष्ये महागुह्यं सर्वान्यासौत्तमोत्तमम् ॥३१॥ यस्य विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भवेन्नरः । अणिमाद्यष्टसिद्धीनामीश्वरः स्यान्न संशयः ॥३२॥ यस्याराधनतो मंत्री कृष्णसांनिध्यतां व्रजेत् । ताराद्याभिर्व्याहृतिभिः संपुटं विन्यसेन्मनुम् ॥३३॥ मंत्रेण पुटितांश्चापि प्रणवाद्यांस्ततो न्यसेत् । गायत्र्या पुटितं मंत्रं विन्यसेन्मातृकास्थले ॥३४॥ मंत्रेण पुटितां तां च गायत्रीं विन्यसेत्क्रमात् । मातृकापुटितं मूलं विन्यसेत्साधकोत्तमः ॥३५॥ मूलेन पुटितां चैव मातृकां विन्यसेत्क्रमात् । नृचं न मातृकावर्णान्पूर्वं तत्तत्स्थले सुधीः ॥३६॥ विन्यसेन्न्यासषट्कं च षोढा न्यासोऽयमीरितः । अनेन न्यासवर्येण साक्षात्कृष्णसमो भवेत् ॥३७॥ न्यासेन पुटितं दृष्ट्वा सिद्धगंधर्वकिन्नराः । देवा अपि नमंत्येनं किंपुनर्मानवा भुवि ॥३८॥ सुदर्शनस्य मंत्रेण कुर्याद्दिग्बंधनं ततः । देवं ध्यायन्स्वहृदये सर्वाभीष्टप्रदायकम् ॥३९॥ उत्फुल्लकुसुमव्रातनम्रशाखैर्वरद्रुमैः । सस्मेयमंजरीवृन्दवल्लरीवेष्टितैः शुभैः ॥४०॥ गलत्परागधूलीभिः सुरभीकृतविङ्मुखः । स्मरेच्छिशिरितं वृन्दावनं मंत्री समाहितः ॥४१॥ उन्मीलन्नवकुंजा लविगलनमधुसंचयैः । लुब्धांतःकरणैर्गु जदद्विरेफपटलैः शुभम् ॥४२॥ मरालपरभृत्कीरकपोतनिकरैर्मृहुः । मुखरीकृतमानृत्यन्मायूरकुलमंजुलम् ॥४३॥ कालिंद्या लोलकल्लोलविप्रुषैमंदवाहिभिः । उत्निद्रांबुरुहव्रातरजोभिश्चूसरैः शिवैः ॥४४॥ प्रदीपितस्मरैर्रगोष्ठसुंदरीमृदुवाससाम् । विलोलनपरैः संसेवितं वा तैर्निरंतरम् ॥४५॥ स्मरेत्तदंते गीर्वाणभूरुहं सुमनोहरम् । तदधः स्वर्णवेद्यां च रत्नपीठमनुत्तमम् ॥४६॥ रत्नकुट्टिमपीठेऽस्मिन्नरुणं कमलं स्मरेत् । अष्टपत्रं च तन्मध्ये मुकुन्दं संस्मरेत्स्थितम् ॥४७॥
अब मैं समस्त न्यासों में उत्तम तथा महागोपनीय न्यास को बता रहा हूँ, जिसके जान लेने से मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और जिसकी आराधना करने वाला मानव निःसंदेह अष्टसिद्धियों का ईश्वर होकर अन्त में कृष्णसान्निध्य मोक्ष को प्राप्त करता है । प्रणव आदि व्याहृतियों से संपुटित मंत्र का और मन्त्र से संपुटित प्रणव का और मंत्र से संपुटित गायत्री का मातृका स्थल में न्यास करे । उत्तम साधक मातृका संपुटित मूल मंत्र का और मूलसंपुटित मातृका वर्णों का क्रमशः न्यास करें । विद्वान् पुरुष पहिले तत्तत् स्थान में मातृका वर्णों का न्यास कर ले । उसके बाद पूर्वोक्त न्यास करना चाहिए । इस प्रकार उपर्युक्त छह प्रकार के न्यास करे । यह षोढान्यास कहलाता है । इस उत्तम न्यास का साधक साक्षात् कृष्ण के समान हो जाता है । ॥३१-३७॥
जो इस न्यास से संपन्न है, उसे सिद्ध, गंधर्व, किन्नर तथा देवता भी प्रणाम करते हैं, मनुष्यों की तो बात ही क्या । इस न्यास को कर लेने के उपरान्त (ओं नमः सुदर्शनाय अस्त्राय फट्) इस सुदर्शनमंत्र से दिग्बंधन करते हुए हृदय में सकलकामनादायक देव का ध्यान करे । साधक समाहित चित्त से यह सोचे कि शिशिर ऋतु में वृन्दावन शोभित हो रहा है । उसमें फूले हुए कुसुमों के भार से वृक्षों की शाखायें नत हो रही हैं । वृक्ष लताओं से वेष्टित तथा शोभन मंजरियों से लदे हैं । वायु पुष्पों के पराग को उड़ाते हुए दशों दिशाओं को सुरभित कर रहा है । खिले हुए कमलों पर मधुपान करने में मत्त भौंरे गुंजार कर रहे हैं ॥३८-४२॥
हंस, कोकिल, शुक तथा कपोतों का समूह शब्द कर रहा है । मयूर नाच रहे हैं । कालिन्दी की चंचल तरंगों के जलकणों के पड़ने से कमल खिल रहे हैं । उनके रज से धूसरित, सुखदायक, कामोदीपक तथा व्रजसुंदरियों के सूक्ष्म वस्त्रों को विलोलित करने वाले वायु मंद-मंद बह रहे हैं । उस वृन्दावन में एक अतिमनोहर कल्पवृक्ष है, जिसके नीचे स्वर्णवेदी में एक अत्युत्तम रत्नपीठ है । उस रत्नपीठ पर रक्तवर्ण अष्टदल कमल का ध्यान करे । कमल के बीच मुकुन्द भगवान् का संस्मरण करना चाहिये ॥४३-४७॥ जिनकी कान्ति विकसित नील-