बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७१२ नारदीयपुराणम् फुल्लेन्दीवरकांतं च केकिबर्हावतंसकम्। पीतांशुकं चंद्रमुखं सरसीरुहनेत्रकम् ॥४८॥ कौस्तुभोद्भासितांगं च श्रीवत्सांकं सुभूषितम्। व्रजस्त्रीनेत्रकमलाभ्यर्चितं गोगणावृतम् ॥४९॥ गोपवृन्दयुतं वंशीं वादयंतं स्मरेत्सुधीः। एवं ध्यात्वा जपेदादावयुतद्वितयं बुधः ॥५०॥ जुहुयादरुणांभोजैस्तद्दशांशं समाहितः। जपेत्पश्चान्मंत्रसिद्धयै क्षुतलक्षं समाहितः ॥५१॥ अरुणैः कमलैर्हुत्वा सर्वसिद्धीश्वरो भवेत्। पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे मूत्तिं संकल्प्य मूलतः ॥५२॥ तस्यामावाह्य चाभ्यर्चेद्गोपीजनमनोहरम्। मुखे वेणुं समभ्यर्च्य वनमालां च कौस्तुभम् ॥५३॥ श्रीवत्सं च हृदि प्राच्यं ततः पुष्पांजलिं क्षिपेत्। ततः श्वेतां च तुलसीं शुक्लचंदनपंकिलाम् ॥५४॥ रक्तां च तलसीं रक्तचंदनावक्तां क्रमात्सुधीः। अर्पयेद्दक्षिणे वामभागे ध्यायन्सुरेश्वरम् ॥५५॥ हयमारद्वयेनैव हृदि मूर्ध्नि तथा पुनः। पद्मद्वयं च विधिवत्ततः शीर्षे समर्पयेत् ॥५६॥ तुलसीद्वयमंभोजद्वयमश्वारियुग्मकम् । ततः सर्वाणि पुष्पाणि सर्वाङ्गेषु समर्पयेत् ॥५७॥ दक्षिणे वासुदेवाख्यं स्वच्छं चैतन्यमव्ययम्। वामे च रुक्मिणीं तद्वन्नित्यां रक्तां रजोगुणाम् ॥५८॥ एवं संपूज्य गोपालं कुर्यादावरणार्चनम्। यजेद्दामसुदामौ च वसुदामं च किंकिणीम् ॥५९॥ पूर्वाद्याशासु दामाद्या ङेऽन्तोन्तध्रुवादिकाः। अग्निनैर्ऋतिवाय्वीशकोणेषु हृदयादिकान् ॥६०॥ दिक्ष्वस्त्राणि समभ्यर्च्य पत्रेषु महिषीर्यजेत्। रुक्मिणी सत्यभामा च नाग्नजित्यभिधा पुनः ॥६१॥ सुविंदा मित्रविंदा च लक्ष्मणा चर्क्षजा ततः। सुशीला च लसद्रम्यविचित्रांबरभूषणा ॥६२॥ ततो यजेद्दलाग्रेषु वसुदेवञ्च देवकीम्। नंदगोपं यशोदां च बलभद्रं सुभद्रिकाम् ॥६३॥ कमल के समान है। मयूर पिच्छ शिर का आभूषण है। जो पीताम्बर पहने हुए हैं। जिनका मुख चन्द्रमा के समान है। नेत्र कमल के सदृश हैं। शरीर कौस्तुभ मणि तथा श्रीवत्स चिह्न से विभूषित है। ब्रजनारियाँ अपने नेत्रकमलों से जिनकी समर्चंना करती हैं। जो गोओं एवम् गोपी से आवृत्त होकर वंशी बजाते हैं। इस प्रकार ध्यान कर विद्वान् साधक बीस हजार मंत्र का जप करे और उसका दशांश लाल कमलों से सावधानता- पूर्वक हवन करे। पश्चात् मंत्र-सिद्धि के लिये सावधानी से पांच लाख जप करना चाहिये। जो व्यक्ति (इस मंत्र को पढ़ते हुए) रक्त कमलों से हवन करता है, उसे समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं ॥४८-५१३॥ पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूलमंत्र से मूत्ति की प्रतिष्ठा करके उसमें श्रीकृष्ण का आवाहन तथा पूजन करना चाहिये। उनके मुखस्थित वंशी और हृदयस्थित श्रीवत्स चिह्न, वनमाला तथा कौस्तुभ मणि की पूजा कर पुष्पांजलि प्रदान करे (अनन्तर शुक्ल चंदनयुक्त श्वेत तुलसी तथा रक्त चन्दन युक्त रक्त तुलसी क्रमशः उनके दाहिने-बायें भाग में समर्पित कर हृदय तथा मस्तक पर एक-एक करवीर का पुष्प समर्पण करे। पुनः शिर पर दो कमल, चरणों पर दो-दो तुलसीपत्र तथा पद्म और अतिरिक्त अंगों में अन्य समस्त प्रकार के पुष्प समर्पित करने चाहिये ॥५२-५७॥ दक्षिण भाग में निर्मल, चिद्रूप तथा अविनाशी वासुदेव की और वाम भाग में नित्या, रक्तवर्णा तथा रजोगुणमयी रुक्मिणी की पूजा करे। गोपाल की अर्चना कर लेने के बाद उनके आवरणों (गणों) की पूजा करे। पूर्व आदि दिशाओं में दाम, सुदाम, वसुदाम तथा किंकिणी की और अग्नि, निऋर्ति, वायु तथा ईशान कोण में हृदय आदि की पूजा करे। पुनः दिशाओं में अस्त्रों का पूजन कर पत्रों पर मनोहर तथा चित्रित वस्त्र-आभूषणों वाली राजरानियों की अर्चना करे। रुक्मिणी, सत्यभामा, नाग्न- जिती, अभिधा, सुविंदा, मित्रविंदा, लक्ष्मणा, जांबवती तथा सुशीला—ये राजमहिषी कहलाती हैं ॥५८-६२॥ इनकी पूजा करने के बाद पत्रों के अन्तिम छोर पर वसुदेव, देवकी, नंदगोप, यशोदा, बलभद्र, सुभद्रा, गोविन्द