बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
७१२ नारदीयपुराणम् फुल्लेन्दीवरकांतं च केकिबर्हावतंसकम्। पीतांशुकं चंद्रमुखं सरसीरुहनेत्रकम् ॥४८॥ कौस्तुभोद्भासितांगं च श्रीवत्सांकं सुभूषितम्। व्रजस्त्रीनेत्रकमलाभ्यर्चितं गोगणावृतम् ॥४९॥ गोपवृन्दयुतं वंशीं वादयंतं स्मरेत्सुधीः। एवं ध्यात्वा जपेदादावयुतद्वितयं बुधः ॥५०॥ जुहुयादरुणांभोजैस्तद्दशांशं समाहितः। जपेत्पश्चान्मंत्रसिद्धयै क्षुतलक्षं समाहितः ॥५१॥ अरुणैः कमलैर्हुत्वा सर्वसिद्धीश्वरो भवेत्। पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे मूत्तिं संकल्प्य मूलतः ॥५२॥ तस्यामावाह्य चाभ्यर्चेद्गोपीजनमनोहरम्। मुखे वेणुं समभ्यर्च्य वनमालां च कौस्तुभम् ॥५३॥ श्रीवत्सं च हृदि प्राच्यं ततः पुष्पांजलिं क्षिपेत्। ततः श्वेतां च तुलसीं शुक्लचंदनपंकिलाम् ॥५४॥ रक्तां च तलसीं रक्तचंदनावक्तां क्रमात्सुधीः। अर्पयेद्दक्षिणे वामभागे ध्यायन्सुरेश्वरम् ॥५५॥ हयमारद्वयेनैव हृदि मूर्ध्नि तथा पुनः। पद्मद्वयं च विधिवत्ततः शीर्षे समर्पयेत् ॥५६॥ तुलसीद्वयमंभोजद्वयमश्वारियुग्मकम् । ततः सर्वाणि पुष्पाणि सर्वाङ्गेषु समर्पयेत् ॥५७॥ दक्षिणे वासुदेवाख्यं स्वच्छं चैतन्यमव्ययम्। वामे च रुक्मिणीं तद्वन्नित्यां रक्तां रजोगुणाम् ॥५८॥ एवं संपूज्य गोपालं कुर्यादावरणार्चनम्। यजेद्दामसुदामौ च वसुदामं च किंकिणीम् ॥५९॥ पूर्वाद्याशासु दामाद्या ङेऽन्तोन्तध्रुवादिकाः। अग्निनैर्ऋतिवाय्वीशकोणेषु हृदयादिकान् ॥६०॥ दिक्ष्वस्त्राणि समभ्यर्च्य पत्रेषु महिषीर्यजेत्। रुक्मिणी सत्यभामा च नाग्नजित्यभिधा पुनः ॥६१॥ सुविंदा मित्रविंदा च लक्ष्मणा चर्क्षजा ततः। सुशीला च लसद्रम्यविचित्रांबरभूषणा ॥६२॥ ततो यजेद्दलाग्रेषु वसुदेवञ्च देवकीम्। नंदगोपं यशोदां च बलभद्रं सुभद्रिकाम् ॥६३॥ कमल के समान है। मयूर पिच्छ शिर का आभूषण है। जो पीताम्बर पहने हुए हैं। जिनका मुख चन्द्रमा के समान है। नेत्र कमल के सदृश हैं। शरीर कौस्तुभ मणि तथा श्रीवत्स चिह्न से विभूषित है। ब्रजनारियाँ अपने नेत्रकमलों से जिनकी समर्चंना करती हैं। जो गोओं एवम् गोपी से आवृत्त होकर वंशी बजाते हैं। इस प्रकार ध्यान कर विद्वान् साधक बीस हजार मंत्र का जप करे और उसका दशांश लाल कमलों से सावधानता- पूर्वक हवन करे। पश्चात् मंत्र-सिद्धि के लिये सावधानी से पांच लाख जप करना चाहिये। जो व्यक्ति (इस मंत्र को पढ़ते हुए) रक्त कमलों से हवन करता है, उसे समस्त सिद्धियां प्राप्त होती हैं ॥४८-५१३॥ पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूलमंत्र से मूत्ति की प्रतिष्ठा करके उसमें श्रीकृष्ण का आवाहन तथा पूजन करना चाहिये। उनके मुखस्थित वंशी और हृदयस्थित श्रीवत्स चिह्न, वनमाला तथा कौस्तुभ मणि की पूजा कर पुष्पांजलि प्रदान करे (अनन्तर शुक्ल चंदनयुक्त श्वेत तुलसी तथा रक्त चन्दन युक्त रक्त तुलसी क्रमशः उनके दाहिने-बायें भाग में समर्पित कर हृदय तथा मस्तक पर एक-एक करवीर का पुष्प समर्पण करे। पुनः शिर पर दो कमल, चरणों पर दो-दो तुलसीपत्र तथा पद्म और अतिरिक्त अंगों में अन्य समस्त प्रकार के पुष्प समर्पित करने चाहिये ॥५२-५७॥ दक्षिण भाग में निर्मल, चिद्रूप तथा अविनाशी वासुदेव की और वाम भाग में नित्या, रक्तवर्णा तथा रजोगुणमयी रुक्मिणी की पूजा करे। गोपाल की अर्चना कर लेने के बाद उनके आवरणों (गणों) की पूजा करे। पूर्व आदि दिशाओं में दाम, सुदाम, वसुदाम तथा किंकिणी की और अग्नि, निऋर्ति, वायु तथा ईशान कोण में हृदय आदि की पूजा करे। पुनः दिशाओं में अस्त्रों का पूजन कर पत्रों पर मनोहर तथा चित्रित वस्त्र-आभूषणों वाली राजरानियों की अर्चना करे। रुक्मिणी, सत्यभामा, नाग्न- जिती, अभिधा, सुविंदा, मित्रविंदा, लक्ष्मणा, जांबवती तथा सुशीला—ये राजमहिषी कहलाती हैं ॥५८-६२॥ इनकी पूजा करने के बाद पत्रों के अन्तिम छोर पर वसुदेव, देवकी, नंदगोप, यशोदा, बलभद्र, सुभद्रा, गोविन्द
अशीतितमोऽध्यायः ७१३ गोपान् गोपीश्च गोविन्द विलीनमतिलोचनान् । ज्ञानमुद्राभयकरौ पितरौ पीतपांडुरौ ॥६४॥ दिव्यमाल्यांबरालेपभूषणे मातरौ पुनः । धारयन्त्यौ चरुं चैव पायसों पूर्णपात्रिकाम् ॥६५॥ अरुणश्यामले हारमणिकुंडलमंड़िते । बलः शंखेंदुधवलॊ मुशलं लांगलं दधत् ॥६६॥ हालालोलो नीलवासा हलवानेककुंडलः । कला या श्यामला भद्रा सुभद्रा भद्रभूषणा ॥६७॥ वराभययुता पीतवसना रूढयौवना । वेणुवीणामहेमयष्टिशंखशृंगाग्निपाणयः ॥६८॥ गोपा गोप्यश्च विविधप्रामृतान्रकरांबुजाः । मंदारादींश्च तद्बाह्ये पूजयेत्कल्पपादपान् ॥६६॥ मंदारश्च तथा संतानको वै पारिजातकः । कल्पद्रुमस्ततः पश्चाद्धरिचन्दनसंज्ञकः ॥७०॥ मध्ये दिक्षु समभ्यर्च्य बहिः शक्रादिकान्यजेत् । तदस्त्राणि च संपूज्य यजेत्कृष्णाष्टकेन च ॥७१॥ कृष्णं च वासुदेवं च देवकीनन्दनं तथा । नारायणं यदुश्रेष्ठं वार्ष्णेयं धर्मपालकम् ॥ ७२॥ असुराक्रांतभूभारहारिणं पूजयेत्ततः । एभिरावरौः पूजा कर्तव्यासुरवैरिणः ॥७३॥ संसारसागरीत्तीर्यै सर्वकामाप्तये बुधैः । एवं पूजादिभिः सिद्धो भवेद्वैश्रवणो यमः ॥७४॥ त्रिकालपूजनं चास्य वक्ष्ये सर्वार्थसिद्धिदम् । श्रीमदुद्यानसंवीतिहेमभूरत्नमंडपे ॥७५॥ लसत्कल्पद्रुमाधस्थरत्नाब्जपीठसंस्थितम् । सुत्रामरत्नसंकाशं गुडस्निग्धालकं शिशुम् ॥७६॥ चलत्कनककु'डलोल्लसितचारुगंडस्थलं सुघोणधरमद्भुतस्मितमुखांबुजं सुन्दरम् । स्फुरद्विमलरत्नयुक्तकनकसूत्रनद्धं दधत्सुवर्णपरिमंडितं सुभगपोंडरीकं नखम् ॥७७॥ में आसक्त चित्त वाले गोप तथा गोपी, ज्ञानमुद्रा तथा अभयमुद्रा धारण करने वाले और पीत एवम् पांडुर वर्ण वाले पुनः माता-पिता दिव्यमाला, वस्त्र, लेप तथा आभूषणों से सुशोभित, हारों एवम् मणिकुण्डलों से अलंकृत, चरु तथा पायस-पूर्ण पात्र धारण करने वाली ओर रक्त तथा श्याम वर्ण वाली माताओं, शंख तथा चंद्रमा के समान धवल, मद्य पोकर मत्त, मुशल, हल, नीलवस्त्र तथा एक कुंडल धारण करने वाले बलभद्र, श्यामवर्णा, पूर्णयौवना, पीतवसना, मनोरम आभूषणों से विभूषिता, वरमुद्रा तथा अभयमुद्रा धारण करने वाली सुभद्रा और भाँति-भाँति के उप- हार एवम् अन्न अपने करकमलों में धारण करने वाले गोप-गोपियों की पूजा कर पत्रों से अलग दिशाओं के मध्य में मंदार आदि कल्पवृक्षों की अर्चना करे। मंदार, संतानक, पारिजातक, कल्पद्रुम तथा हरिचंदन--ये कल्पवृक्ष कहलाते हैं। इनके बाद शक्र आदि देवों तथा उनके अस्त्रों की पूजा कर कृष्ण, वासुदेव, देवकीनंदन, नारायण, यदुश्रेष्ठ, वार्ष्णेय, धर्मपालक तथा असुरों से आक्रान्त पृथ्वी का भार हरण करने वाले अष्टकृष्ण की पूजा करे। विद्वान् साधक संसारसागर से पार होने के लिए और सकल कामनाओं को प्राप्त करने के लिये श्रीकृष्ण की उपर्युक्त आवरणों के साथ पूजा करे। पूजा की सिद्धि हो जाने पर मनुष्य कुबेरतुल्य तथा धर्मराजतुल्य हो जाता है ॥६३-७४॥ अब मैं समस्त कामनाओं को सिद्ध करनेवाला (कृष्ण का) त्रिकाल पूजन बतलाता हूँ। साधक इस प्रकार ध्यान करे कि सुमनोहर उद्यान में सुवर्ण तथा रत्नों के बने मण्डप पर कल्पद्रुम सुशोभित हो रहा है। उसके नीचे रत्नमय कमलासन पर एक शिशु बैठा है, जिसका वर्ण मकरतमणि के समान ओर बाल घुंघराले हैं। गंडस्थल चंचल सुवर्णकुण्डलों से सुशोभित एवम् मनोहर है, नासिका, अधर तथा विचित्र मन्दहास्य करने वाला कमलमुख सुन्दर हैं। वे चमकते हुए निर्मल रत्न एवम् सुवर्ण की बनी करधनी धारण किये हैं। पद्म के समान नाखून हैं। अंग सुदृढ एवम् सुडौल हैं। गायों की पदधूलि से उरःस्थल धूसरित हो गया है। शरीर की आभा कांचन के ६० ना० पृ०
७१४ नारदीयपुराणम् समुद्धूसरोरस्थले धेनुधूल्या [सुपुष्टांगमष्टापदकल्पदीप्तम् । कटीलस्थले चारुजंघान्तयुग्मं पिनद्धं क्वणत्किंकिणीजालदाम्ना ॥७८॥ हसन्तं हसद्बन्धुजीवप्रसूनप्रभापाणिपादांबुजोदारकान्त्या । दधानं करे दक्षिण पायसान्न सुहैंयगवीनं तथा वामहस्ते ॥७९॥ लसद्गोपगोपीगवां वृन्दमध्ये स्थितं वासवाद्यैः सुरैरर्चितांघ्रिम् । महीभारभूतामरा रातियूथांस्ततः पूतनादीन्निहंतुं प्रवृत्तम् ॥८०॥ एवं ध्यात्वाचार्येद्देवं पूर्ववत्स्थिरमानसः । दध्ना गुडेन नैवेद्यं दत्वा दशशतं जपेत् ॥८१॥ मध्यंदिने यजेद्देवं विशिष्टरूपधारिणम् । नारदाद्यैर्मुनिगणैः सुरवृन्दैश्च पूजितम् ॥८२॥ लसद्गोपगोपीगवां वृन्दमध्यस्थितं सांद्रमेघप्रभं सुन्दरांगम् । शिखंडिच्छदापीडमब्जायताक्षं लसच्चिल्लिकं पूर्णचंद्राननं च ॥८३॥ चलत्कुण्डलोल्लासिगंडस्थलश्रीभरं सुन्दरम् मंदहासं सुनासम् । सुकात्तंस्वराभांबरं दिव्यभूषं क्वणत्किंकिणीजालमत्तानुलेपम् ॥८४॥ वेणुं धमंतं स्वकरे दधानं सव्ये दरं यष्टिमुदारवेषम् । दक्षे तथैवेप्सितदानदक्षं ध्यात्वार्चयेन्नंदजमन्दिराप्त्यै ॥८५॥ एवं ध्यात्वार्चयेत्कृष्णं पूर्ववद्वैष्णवोत्तमः । अपूपपायसान्नाद्यैनैवेद्यं परिकल्पयेत् ॥८६॥ हुत्वा चाष्टोत्तरशतं पयोऽन्नैः सर्पिषाप्लुतैः । स्वस्वदिक्षु बलिं दद्याद्दिशेदाचमनं ततः ॥८७॥ अष्टोत्तरसहस्रं च प्रजपेन्मंत्रमुत्तमम् । अह्नो मध्ये यजेद्देवं यः कृष्णं वैष्णवोत्तमः ॥८८॥ समान है। कमर में बँधी किंकिणियों की लड़े शब्द कर रही हैं ॥७५-७८॥ दोनों जंघायें अति मनोरम हैं। कर- कमलों तथा चरणाम्बुजों की प्रभा दुपहरिया फूल के समान हैं। वे दाहिने हाथ में पायस और बाँये हाथ में नवनीत (मक्खन) लिये हुए हैं। गोपों, गोपियों तथा गौओं के बीच स्थित होकर शोभा पा रहे हैं। इन्द्र आदि देवगण उनकी चरण वंदना कर रहे हैं। पृथ्वी पर भारस्वरूप दैत्यगण तथा पूतना आदि अरिष्टों को मारने के लिये वे उद्यत हैं ॥७९-८०॥ इस प्रकार ध्यान कर पहिले की तरह स्थिर चित्त से देव की अर्चना करे। दही-गुड़ का नैवेद्य चढ़ाकर मन्त्र का दस सहस्र जप करे । पुनः मध्याह्न कालीन पूजन के समय नारद आदि मुनिगण तथा सुरवृन्द से पूजित मुकुन्द के इस विशिष्ट रूप का ध्यान करे कि वे गोपों, गोपियों तथा गौओं के बीच स्थित होकर शोभित हो रहे हैं। उनकी कांति सघन घन के समान है। अंग सुदृढ़ एवम् सुडौल हैं। मुकुट मयूरपिच्छों से विभूषित है। नेत्र कमलदल के तुल्य हैं। बाल घुंघराले हैं। मुख पूर्णचन्द्र के सदृश है। चंचल कुण्डलों से गण्डस्थल की अपूर्व शोभा हो रही है। मन्द मुसकान आकर्षक है। नासिका सुन्दर है। वे स्वर्णिम आभामय वस्त्र तथा दिव्य आभूषण पहने हुए हैं। उनके शरीर में (चन्दन आदि का) लेप लगा है। किंकिणियों का शब्द हो रहा है। वे वंशी बजा रहे हैं। बाँये हाथ में यष्टि (लाठी) और दाहिने हाथ में अभिलषित दान देने का पात्र धारण किये हुए हैं। उनका वेश उदार है । लक्ष्मीप्राप्ति के लिये कृष्ण के इस रूप का ध्यान कर उत्तम विष्णुभक्त पूर्ववत् उनकी पूजा करे ॥८१-८५॥ पकवान, खीर आदि नैवेद्य चढ़ा कर एक सौ आठ बार घृतमिश्रित खीर से हवन करे। अनन्तर सब दिशाओं में बलि चढ़ाकर आचमन करे और अष्टोत्तरशत मन्त्र को जपे । जो वैष्णवश्रेष्ठ इस प्रकार मध्याह्न में कृष्ण की आरा-
अशीतितमोऽध्यायः ७१५
देवाः सर्वे नमस्यंति लोकानां वल्लभो नरः । मेधायुः श्रीकांतियुक्तः पुत्रैः पौत्रैश्च वर्द्धते ॥८६॥ तृतीयकालपूजायामस्ति कालविकल्पना । सायाह्ने निशि वेत्यत्र वदंत्येके विपश्चितः ॥६०॥ दशाक्षरेण चेद्रात्रौ सायाह्नेऽष्टादशार्णतः । उभयीमुभयेनैव कुर्यादित्यपरे जगुः ॥६१॥ सायाह्ने द्वारवत्यां तु चित्रोद्यानोपशोभिते । अष्टसाहस्रसंख्यातैर्भवनैरुपमंडिते ॥६२॥ हंससारससंकीर्णकमलोत्पलशालिभिः । सरोभिर्निर्मलांभोभिः परीते भवनोत्तमे ॥६३॥ उद्यत्प्रद्योतनोद्योतद्युतौ श्रीमणिमंडले । हेमांभोजासनासीनं कृष्णं त्रैलोक्यमोहनम् ॥६४॥ मुनिवृंदैः परिवृतमात्मतत्त्वविनिर्णये । तेभ्यो मुनिभ्यः स्वं धाम दिशंतं परमक्षरम् ॥६५॥ उन्नित्रेदीवरश्यामं पद्मपन्नायतेक्षणम् । स्निग्धं कुंतलसंभिन्नकिरीटवनमालिनम् ॥६६॥ चारुप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरकुंडलंम् । श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं सुमनोहरम् ॥६७॥ काश्मीरकपिशोरस्कं पीतकौशेयवाससम् । हारकेयूरकटककटिसूत्रैरलंकृतम् ॥६८॥ हृतविश्वंभराभारिभारं मुदितमानसम् । शंखचक्रगदापद्मराजद्भुजचतुष्टयम् ॥६९॥ एवं ध्यात्वार्चयेन्मन्त्री स्यादंगैः प्रथमावृतिः । द्वितीया महिषीभिस्तु तृतीयायां समर्चयेत् ॥१००॥ नारदं पर्वतं जिष्णुं निशठोद्धवदारुकान् । विष्वक्सेनं च शैनेयं दिक्ष्वग्रे विनतासुतम् ॥१०१॥ लोकपालैश्च वज्राद्यैः पूजयेद्वैष्णवोत्तमः । एवं संपूज्य विधिवत्पायसं विनिवेदयेत् ॥१०२॥ तर्पयित्वा खंडमिश्रदुग्धबुद्ध्या जलेरिह । जपेदष्टशतं मन्त्री भावयन्पुरुषोत्तमम ॥१०३॥
भना करता है, वह मनुष्यों का अधिनायक तथा देववंद्य होता है । उसे श्री, मेधा, आयु, कान्ति तथा पुत्र-पौत्रों की प्राप्ति होती है ॥८६-८९॥ तीसरे काल की पूजा में समय का मतभेद है । कोई आचार्य कहते हैं कि सायंकाल पूजन होना चाहिये और कोई कहते हैं कि रात्रि में पूजन किया जाय । कोई कहते हैं कि रात्रि में दशाक्षरमन्त्र से और सन्ध्याकाल में अष्टाक्षर मन्त्र से पूजन किया जाय, तो कोई कहते हैं कि दोनों समय दोनों मन्त्रों से पूजन करना चाहिए । सायंकाल इस प्रकार ध्यान करे कि द्वारका के आनन्द बाग में आठ हजार भवन विद्यमान हैं । वहां सरोवरों के विमल जल में कुमुद आदि पुष्प खिले हुए हैं । हंस, सारस आदि पक्षी कलरव कर रहे हैं और एक श्रीमणि- मंडित सर्वोत्तम भवन विद्यमान है । उस भवन की कान्ति उदयकालीन सूर्यरश्मि के समान है । उसी में स्वर्ण कमलासन पर त्रैलोक्यमोहन मधुसूदन विराजमान हैं ॥६०-६४॥ वे आत्मतत्त्व के निर्णय करने के लिये मुनिगणों से परिवेष्टित हैं । उन मुनियों को परमाक्षर (ओं) रूप भगवान् अपने धाम की ओर संकेत कर रहे हैं । उनका श्यामवर्ण विकसित नील कमल के समान है । लम्बे नेत्र पद्मपत्र के सदृश हैं । केश कोमल हैं । वे मुकुट एवम् वनमाला धारण किये हुए हैं । उनका मुख प्रसन्न है । कुण्डल मकराकृति है । वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न तथा मनोहर कौस्तुभमणि सुशोभित हो रही है, जिससे उनकी छाती का रंग पुष्करमूल की तरह मटमैला प्रतीत होता है । वे पीत रेशमी वस्त्र पहने हुए हैं । उनका शरीर हार, केयूर, वलय तथा करधनी से अलंकृत है ॥६५-९८॥ वे पृथ्वी के अत्यन्त भार का व्यपहरण करनेवाले हैं । उनका चित्त प्रसन्न है और चारों भुजायें शंख, चक्र, गदा और पद्म से विभूषित हैं ॥६६॥ इस प्रकार ध्यान कर साधक प्रथम बार में अंग देवताओं के साथ पूजन करे । द्वितीय बार में राज- महिषियों के साथ और तृतीय बार में नारद, पर्वत, विष्णु, निशठ, उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन, शैनेय तथा गरुड़ के साथ पूजन कर दिशाओं में वज्र आदि आयुधों समेत लोकपालों की अर्चना करे । पूजन के बाद पायस समर्पण कर जल को ही दूध-मिसरी समझते हुए उससे तर्पण करे । तदुपराग्त पुरुषोत्तम का स्मरण करते हुए एक
७१६ नारदीयपुराणम् पूजासु होमं सर्वासु कुर्यान्मध्यांदिनेऽथवा । आसनादर्घ्यपर्यन्तं कृत्वा स्तुत्वा नमेत्सुधीः ॥१०४॥ समर्थ्यात्मानबुद्धास्य स्वीयहृत्सरसीरुहे । विन्यस्य तन्मयो भूत्वा पुनरात्मानमर्चयेत् ॥१०५॥ सायाह्ने वासुदेवं यो नित्यमेवं समर्चयेत् । सर्वान्कामानवाप्यांते सा याति परमां गतिम् ॥१०६॥ रात्रौ चेन्मदनाक्रांतचेतसं नन्दनन्दनम् । यजेद्रासपरिश्रांतं गोपीमंडलमध्यगम् ॥१०७॥ विकसत्कुंदकह्लारमल्लिकाकुसुमोद्गतैः । रजोभिर्धूसरैर्मंदमारुतैः शिशिरीकृते ॥१०८॥ उन्मीलन्नवकैरवालिविगलन्माध्वीकलव्धांतरं भ्राम्यन्मत्तमिलद्गीतललिते सन्मल्लिकोज्जृम्भिते । पीयूषांशुक रैर्विशालितहरित्प्रांते स्मरोद्दीपने कालिन्दीतुलिनांगणे स्मितमुखं वेणुंरणंतं मुहुः ॥१०८॥ अन्तस्तोयलसन्नवांबुदघटासंघट्टकारत्विषं चंचच्चिल्लिकमंबुजावतदृशं बिम्बाधरं सुन्दरम् । मायूरच्छदबद्धमौलिविलसद्धम्मिल्लमालं चलं दीप्यत्कुण्डलरत्नरश्मिविलसद्गंडद्वयोद्भासितम् ॥११०॥ कांचीनूपुरहारकंकणलसत्केयूरभूषान्वितं गोपीनां द्वितयांतरे सुललितं वन्यप्रसूनस्रजम् । अन्योन्यं विनिबद्धगोपदियतादोर्वल्लिवीतं लसद्रासक्रीडनलोलुपं मनसिजाक्रांतं मुकुन्दं भजेत् ॥१११॥ विविधश्रुतिभिन्नमनोज्ञतरस्वरसप्तक मूच्छेनातानगणैः । भ्रममाणमभूमिहृदारमणस्फुटमंडनसिजितचारुतनूम् । ॥११२॥ इतरेतरबद्धकरप्रमदागणकल्पितरासविहारविधौ । मणिशंकुगमप्यमुना वपुषा बहुधा विहितस्वकदिव्यतनुम् ॥११३॥ सौ आठ बार मन्त्र को जपे । मध्याह्नकालीन पूजा अथवा सकल पूजाओं में हवन करना चाहिये । विद्वान् साधक आसन से लेकर अर्घ्य-दान पर्यन्त समस्त कर्म करके स्तुति एवम् नमस्कार करे । पुनः अपने हृदयारविन्द में समाहित चित्त से आत्मा का ध्यान करके अर्चना करे । जो व्यक्ति सायंकाल इस तरह वासुदेव की आराधना करता है वह सम्पूर्ण कामनाओं को सफल करके अन्त में परमगति को प्राप्त करता है ॥१००-१०६॥ रात्रि में नन्दनन्दन का इस प्रकार ध्यान करना चाहिये कि वे रासलीला करते-करते थक गये हैं। उनका चित्त काम से विह्वल है। वे गोपियों के बीच में चलते हैं तथा कालिन्दी के तट पर, जहाँ विकसित कुन्द, कह्लार, मल्लिका आदि कुसुमों के पराग से सुगंधित शीतल मन्द पवन बह रहा है, वे मन्द मुसकान के साथ वंशी बजा रहे हैं। उनकी कान्ति सजल घनघटा के समान है, बाल घुंघराले हैं। नेत्र कमलपत्र के सदृश दीर्घ हैं। अधर सुन्दर तथा बिम्बफल के समान हैं। मुकुट पर मयूर के पंख लगे हैं। संयत संवारे हुए बालों पर पुष्प- माला शोभित हो रही है। चंचल एवम् चमकते हुए रत्ननिर्मित कुण्डलों की रश्मि से कपोल उद्भासित हो रहे हैं। करधनी, नूपुर, हार, कंकण तथा केयूर आदि आभूषणों से सम्पूर्ण शरीर विभूषित है। वे गोपियों के मन को लुभा रहे हैं। वन्य पुष्पों की माला धारण किये हुए हैं। एक दूसरी से अपनी बाँहों को मिलाये हुए नृत्य करने वाली गोपांगनाओं की बाहुवल्लारियों से वे घिरे हुए हैं। इस प्रकार परम सुन्दर शोभामयी दिव्य रासलीला के लिए सदा उत्सुक रहने वाले प्रेम के आश्रयभूत भगवान् मुकुन्द का भजन करे। वे नाना प्रकार की श्रुतियों के भेद से युक्त परम मनोहर सात स्वरों की मूर्च्छना और तानों के साथ-साथ गोपाङ्गनाओं सहित थिरक रहे हैं। सुन्दर मणिमय स्वच्छ आभूषणों के मधुर शिंजन से भगवान् का सम्पूर्ण मनोहर अंग ही झनकारमय हो उठा है। एक दूसरी से हाथ बाँधकर मण्डलाकार खड़ी हुई गोपांगनाओं के समूह से कल्पित रासलीला मण्डल की रचना में यद्यपि भगवान् श्यामसुन्दर बीच में मणिमय मेरु की भाँति स्थित हैं तथापि इसी शरीर से उन्होंने अपने बहुत
अशीतितमोऽध्यायः ७१७ एवं ध्यात्वार्चयेन्मन्त्री स्यादङ्गैः प्रथमावृतिः । श्रीकामः सस्वराद्यानि कलाब्जैर्वैष्णवोत्तमः ॥११४॥ यजेत्केशवकीर्त्यादिमिथुनानि च षोडश । इन्द्राद्यानपि वज्रादीन्पूजयेत्तदनन्तरम् ॥११५॥ पृथुं सुवृत्तं मसृणं वितस्तिमात्रोन्नतं कौ विनिखन्य शंकुम् । आक्रम्य पद्भ्यामितरेतरैस्तु हस्तैर्भ्रमोऽयं खलु रासगोष्ठी ॥११६॥ संपूज्यैवं च पयसा ससितो पलसर्पिषा । नैवेद्यमर्चयित्वा तु चषकैर्नृपसंख्यकैः ॥११७॥ ससितं पायसं मंत्री मिथुनेष्वर्पयेत्क्रमात् । विधाय पूर्ववच्छेषं सहस्रं प्रजपेन्मनुम् ॥११८॥ स्तुत्वा नत्वा च सम्प्रार्थ्य पूजाशेषं समापयेत् । एवं यः पूजयेत्कृष्णं स समृद्धेःपदं भवेत् ॥११९॥ अणिमाद्यष्टसिद्धीनामीश्वरः स्यान्न संशयः । भुक्त्वेह विविधन्भोगानंते विष्णुपदं व्रजेत् ॥१२०॥ एवं पूजादिभिः सिद्धे मन्तौ काम्यानि साधयेत् । अष्टाविंशतिवारं वा त्रिकालं पूजयेत्सुधीः ॥१२१॥ स्वकालविहितान् भूयः परिवारांश्च तर्पयेत् । प्रातर्दध्ना गुडाक्तेन मध्याह्ने पयसा पुनः ॥१२२॥ नवनीतयुतेनाथ सायाह्ने तर्पयेत्पुनः । ससितोपलमिश्रेण पयसा वैष्णवोत्तमः ॥१२३॥ तर्पयामिपदं योज्यं मंत्रांते स्वेषु नामसु । द्वितीयांतेषु तु पुनः पूजाशेषं समापयेत् ॥१२४॥ अभ्युक्ष्य तत्प्रसादाद्भिरमात्मानं प्रपिबेदपः । तत्तत्स्थमथोद्वास्य तन्मयः प्रजपेन्मनुम् ॥१२५॥ अथ द्रव्याणि काम्येषु प्रोच्यंते तर्पणेषु च । तानि प्रोक्तविधानानाश्रित्यान्यतमं भजेत् ॥१२६॥ पायसं दाधिकं चाज्यं गौडान्नं कृसरं पयः । दधीनि कदली मोचा चिंचा रजस्वला तथा ॥१२७॥ से दिव्य स्वरूप प्रकट कर लिये हैं । और उन स्वरूपों से प्रत्येक दो गोपियों के बीच में स्थित हैं ॥१०७-११३॥ इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक भगवान् की पूजा करे । हृदय आदि अंगों द्वारा प्रथम आवरण की पूजा होती है । धन-सम्पत्ति की इच्छा रखने वाला श्रेष्ठ वैष्णव पूर्वोक्त केशव-कीर्ति आदि सोलह जोड़ों की कमल पुष्पों द्वारा पूजा करे । उन सब के नाम के आदि में क्रमशः सोलह स्वरों को संयुक्त करे । तदनन्तर इन्द्र आदि दिक्पालों और वज्र आदि आयुधों की पूजा करे, एक मोटा, गोल और चिकना खूँटा जिसकी उँचाई एक बित्ते की हो, पृथ्वी में गाड़ दे और उसे पैरों से दबाकर एक दूसरे से हाथ मिलाकर उसके चारों ओर चक्कर देना रासगोष्ठी कही गई है । इस प्रकार पूजा करके दूध, घी और मिश्री मिलाकर भगवान् को नैवेद्य अर्पण करे और सोलह प्याले लेकर उनमें मिश्री मिलाई हुई खीर परोसे और पूर्वोक्त जोड़ों को क्रमशः अर्पण करे । फिर शेष कार्य पूर्ववत् करके मन्त्रोपासक एक हजार मन्त्र जप करे । तत्पश्चात् स्तुति, नमस्कार और प्रार्थना करके पूजन का शेष कार्य भी समाप्त करे । इस प्रकार जो उपासक श्रीकृष्ण की आराधना करता है, वह महासमृद्धिशाली होता है । अणिमा आदि सिद्धियां उसकी अनुगत हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं । वह ऐहलोकिक सकल भोगों को भोग कर अन्त में विष्णुपद को प्राप्त करता है ॥११४-१२०॥ इस तरह पूजा आदि से सिद्धि प्राप्त कर लेने पर मनुष्य काम्य तर्पर्णों का साधन करे । जैसे विद्वान् व्यक्ति (एक ही समय) अट्ठाईस बार या तीनों काल कृष्ण की पूजा कर अंग देवता सहित उनका तर्पण करें । प्रातःकाल गुड़ मिश्रित दही से, मध्याह्न में दूध से और सायंकाल मक्खन से तर्पण करना चाहिये । (अन्य काल) उत्तम वैष्णव शक्कर मिलाये दूध से तर्पण करे । मन्त्र के अन्त में अपने नाम के साथ 'तर्पयामि' इस पद को जोड़ देना चाहिये । पूजा समाप्ति के बाद तर्पणीय जल से अपने को सिक्त कर वह जल पी ले अनन्तर मन्त्र का जप करे ॥१२१-१२५॥ काम्य तर्पण करने के लिये जिन द्रव्यों की आवश्यकता होती है, वे खीर, दहीवड़ा, घी, गुड़ में पकाया अन्न, खिचड़ी, दूध, दही, केला, (मोचा), सहिजन, चिंचा (इमली), चीनी, पूआ, लड्डू,
अपूपा मोदका लाजाः पृथुका नवनीतकम् । द्रव्यषोडशकं ह्येतत्कथितं पद्मजातिभिः ॥१२८॥ लाजांते पृथुकं प्राक्च समर्प्य च सितोपलम् । चतुःसप्ततिवारं यः प्रातरेवं प्रतर्पयेत् ॥१२९॥ ध्यात्वा कृष्णपदं मंत्री मंडलाविष्टमाप्नुयात् । धारोष्णपक्वपयसा नवनीतं दधीनि च ॥१३०॥ दोग्धान्नाज्यं मत्स्यंडी क्षौद्रं कीलालमेव च । पूजयेन्नवभिर्द्रव्यैः प्रत्येकं रविसंख्यया ॥१३१॥ एवमष्टोत्तरशतसंख्याकं तर्पणं पुनः । यः कुर्याद्वैष्णवश्रेष्ठः पूर्वोक्तं फलमाप्नुयात् ॥१३२॥ किं बहूक्तेन सर्वेष्टदायकं तर्पणं त्विदम् । ससितोपलधारोष्णदुग्धबुद्ध्या जलेन वै ॥१३३॥ कृष्णं प्रतर्पयन् ग्रामे व्रजन्नाप्नोति साधकः । धनवस्त्राणि भोज्यं च परिवारगणैः सह ॥१३४॥ यावत्संतर्पयेन्मंत्री तावत्संख्यं जपेन्मनुम् । तर्पणेनैव कार्याणि साधयेदखिलान्यपि ॥१३५॥ काम्यहोममथो वक्ष्ये साधकानां हिताय च । श्रीपुष्पैर्जुहुयान्मंत्री श्रियमिच्छन्ननिंदिताम् ॥१३६॥ साज्येनान्नेन जुहुयाद्घृतान्नस्य समृद्धये । वन्यपुष्पैर्द्विजान् जातीपुष्पैश्च पृथिवीपतीन् ॥१३७॥ असितैः कुसुमैर्वैश्यान् शूद्रान्नीलोत्पलैस्तथा । वशयेल्लवणैः सर्वानंबुजैर्युवतीजनम् ॥१३८॥ गोशालासु कृतो होमः पायसेन ससर्पिषा । गवां शांतिं करोत्याशु गोपालो गोकुलेश्वरः ॥१३९॥ शिक्षावेषधरं कृष्णं किंकिणीजालशोभितम् । ध्यात्वा प्रतर्पयेन्मंत्री दुग्धबुद्ध्या शुभैर्जलैः ॥१४०॥ धनं धान्यं सुतान्कीर्ति प्रीतस्तस्मै ददाति सः । ब्रह्मवृक्षसमिद्भिर्वा कुशैर्वा तिलतंडुलैः ॥१४१॥ लाजा (लावा) पृथुक (चिउरा) तथा नवनीत । इन्हीं सोलह द्रव्यों का नाम ब्रह्मा आदि (मुनियों) ने बताया है। इन द्रव्यों से तर्पण कर पश्चात् लाजा, पृथुक तथा शक्कर चढ़ाना चाहिये । जो व्यक्ति प्रातःकाल कृष्ण का ध्यान कर उक्त रीति से चौहत्तर बार तर्पण करता है उसे वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है ॥१२६-१२९१/२॥ धारोष्ण दूध, आग पर गर्म किया हुआ दूध, नवनीत, दही, छेना, घी, राब, मधु तथा जल—इन नौ द्रव्यों में प्रत्येक से बारह-बारह बार तर्पण करना चाहिए । जो वैष्णवश्रेष्ठ इस तरह एक सौ आठ बार तर्पण करता है, उसे पूर्वोक्त फल का लाभ होता है । इसके सम्बन्ध में बहुत क्या कहूँ ! यह (तर्पण) तो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जो व्यक्ति जल ही में धारोष्ण दूध तथा शक्कर की भावना कर उससे तर्पण करता है, उसे भी गांव, ब्रज (गोष्ठ) धन, वस्त्र, भोज्य तथा पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है । साधक जितने बार तर्पण करे उतने ही बार मंत्र का भी जप करे । इस तर्पण से सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥१३०-१३५॥ अब मैं साधकों के हित के लिये काम्य हवन का वर्णन करता हूँ । अतुल संपत्ति की कामना करने वाला साधक श्रीपुष्पों से होम करे। जो व्यक्ति घी तथा अन्नों की समृद्धि चाहता है, वह घृतमिश्रित अन्नों से हवन करे । वन्य पुष्पों से होमने वाला (साधक) द्विजों को, जातीपुष्पों से होमने वाला राजाओं को, कृष्ण पुष्पों से होमने वाला वैश्यों को, नीलकमलों से होमने वाला शूद्रों को, लवण से होमने वाला सबको और कमलों से होमने वाला युवतियों को वशीभूत करता है। गोशाला में खीर तथा घी से हवन करने से गोकुलेश्वर कृष्ण गौओं के अरिष्ट को शान्त कर देते हैं। जो साधक प्रातःकाल लोकशिक्षा के लिये अवतार धारण करने वाले, किंकिणियों से सुशोभित कृष्ण का ध्यान कर दुग्धबुद्ध्या पवित्र जल से तर्पण करता है, उसके ऊपर प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण धन, धान्य, पुत्र एवम् यश प्रदान करते हैं ॥१३६-१४०१/२॥ पलाश की समिधा या कुश या तिल-तंडुल में त्रिमधु मिला कर हवन करने से ब्राह्मण वशीभूत होते हैं।
अशीतितमोऽध्यायः ७१६ जुहुयादयुतं मंत्री त्रिमध्वाक्तैर्हुताशने । वशयेद्ब्राह्मणांश्चाथ राजवृक्षसमुद्भवैः ॥१४२॥ प्रसूनैः क्षत्रियान्वैश्यान्कुरंडुकुसुमैस्तथा । पाटलोत्थैश्च कुसुमैर्वशयेदंतिमान्सुधीः ॥१४३॥ श्वेतपद्मै रक्तपद्मैश्चंपकैः पाटलैः क्रमात् । हुत्वायतं त्रिमध्वाक्तैर्वशयेत्तद्वरांगनाः ॥१४४॥ नित्यं हयारिकुसुमैर्निशीथे त्रिमधुप्लुतैः । वरस्त्रीर्वशयेत्प्राज्ञः सम्यग्धूत्वा दिनाष्टकम् ॥१४५॥ अयुतत्रितयं रात्रौ सिद्धार्थैस्त्रिमधुप्लुतैः । प्रत्यहं जुह्वतो मासात्सुरेशोऽपि वशीभवेत् ॥१४६॥ आहृत्य बल्लवीवस्त्राण्यारूढं नीपभूरुहे । स्मरेत्कृष्णं जपेद्रात्रौ सहस्रं खेदहात्सुधीः ॥१४७॥ हठादाकर्षयेच्छीघ्रममुर्वशीमपि साधकः । बहुना किमिहोक्तेन मंत्रोऽयं सर्ववश्यकृत् ॥१४८॥ रहस्यं परमं चाथ वश्ये मोक्षप्रदं नृणाम् । ध्यायेत्स्वहृत्सरसिजे देवकीनंदनं विभुम् ॥१४६॥ श्रीमत्कुन्देन्दुगौरं सरसिजनयनं शङ्खचक्रे गदाब्जे । बिभ्राणं हस्तपद्मैर्नवनलिनलसन्मालयादीप्य मानम् वंदे वेद्यं मुनींद्रैः कणिकमुलिसद्दिव्यभूषाभिरामं ॥१५०॥ दिव्यांगालेपभासं सकलभयहरं पीतवस्त्रं मुरारिम् एवं ध्यात्वा पुमांसं स्फुटहृदयसरोजासनासीनमाद्यं । सांद्रांभोदाच्छबिंबादद्भुतकनकनिभं संजपेदर्कलक्षम् मन्वोरेकं द्वितारांतरितमथ हुनेदर्कसाहस्रमिष्मैः ॥१५१॥ क्षीरिवृत्थैर्यथोक्तैः समधुघृतसितेनाथवा पायसेन एवं लोकेश्वरा Backyard आराध्यं कृष्णं स्वहृदयांबुजे । ध्यायन्ननुदिनं मंत्री त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् ॥१५२॥
राजवृक्ष की समिधा से हवन करने वाला साधक क्षत्रियों को वश में करता है । कुरंडवृक्ष के पुष्पों से होमने वाला वैश्यों को और पाटल के कुसुमों से हवन करने वाला शूद्रों को वश में कर लेता है । त्रिमधु मिला कर श्वेतपद्म रक्तपद्म तथा पाटल से होम करने से वेश्यायें वशीभूत होती हैं । नित्य आठ दिनों तक रात्रि में त्रिमधुयुक्त करवीर-कुसुमों से हवन करने वाला बुद्धिमान् व्यक्ति श्रेष्ठ वनिता को वश में कर लेता है । जो एक मास तक रात्रि में त्रिमधु मिला कर उजले सरसो से तीस हजार (बार) हवन करता है, उसके वश में इन्द्र भी हो जाते हैं । यदि चतुर साधक दश दिनों तक रात्रि में गोपियों के वस्त्र चुराकर कदम्ब वृक्ष के ऊपर चढ़ जाने वाले कृष्ण का ध्यान कर एक हजार कृष्णमन्त्र का जप करे तो वह उर्वशी को भी शीघ्र आकृष्ट कर सकता है । अधिक कहां तक कहें, उस मन्त्र के प्रभाव से मनुष्य सब को वश में कर सकता है ॥१४१-१४८॥ अब मैं मनुजों को मोक्ष देने वाला कृष्णरहस्य बतला रहा हूँ । पहले अपने हृदयकमल में देवकी- नन्दन विभु का इस तरह ध्यान करे कि वे कुन्दपुष्प तथा चंद्र के समान गौर हैं । कमल के सदृश उनके नेत्र हैं । करकमलों में शंख, चक्र, गदा पद्म धारण किये हैं, नवीन कमलपुष्पों की माला से उनके शरीर की आभा खिल रही है । बड़े-बड़े मुनि ही उन्हें जान पाते हैं । मणि-रत्नों के बने दिव्य रत्नों के बने दिव्य आभूषणों से वे विभूषित हैं । उनके दिव्य अंगों में चन्दन आदि का लेप लगा है । वे सकल- भयहारी, पीतवस्त्रधारी तथा मुर नामक दैत्य के विनाशक हैं । वे मेरे विकसित हृदयारविन्द रूपी आसन पर आसीन हैं । लोग आद्यपुरुष भी उन्हीं को कहते हैं । उनकी वर्णच्छटा सघनघन के समान है । कान्ति अद्भुत सुवर्ण तुल्य है । इस प्रकार आदिपुरुष का ध्यान कर बारह लाख मन्त्र जप करे और बारह हजार एक सौ
७२० नारदीयपुराणम् सायाह्नोक्तेन विधिना संपूज्य हवनं पुनः । कृत्वा पूर्वोक्तविधिना मंत्री तद्गतमानसः ॥१५३॥ एवं यो भजते नित्यं विद्वान् गोपालनंदनम् । समुत्तीर्य भवांभोधिं स याति परमं पदम् ॥१५४॥ मध्ये कोणेषु वाह्येऽध्वनलपुरपुटस्यालिखेत्कर्णिकायां कंदर्प साध्ययुक्तं विवरगतषडर्णद्विशः केशरेषु । शक्तिः श्रीपूर्विकाणि द्विनवलिपिमनेारक्षराणिच्छदानां मध्ये वर्णान्दशान्तो दशलिपिमनुवर्यस्य वैकैकशोऽब्जम् ॥१५५॥ भूसद्मनाभिवृतमलग्मन्मथेन गोरोचनाविलिखितं तपनीयसूच्या । पट्टे हिरण्यरचिते गुलिकीकृतं तद्गोपालयंत्रमखिलार्थदमेतदुक्तम् ॥१५६॥ संपातसिक्तमभिजप्तमिमं महद्धिमर्धायं जगत्त्रयवशीकरणैकदक्षम् । रक्षायशः सुतमहीधनधान्यलक्ष्मी सौभाग्यलिप्सुभिरजस्रमनर्ध्यवीर्यम् ॥१५७॥ स्मरस्त्रिविक्रमाक्रांतश्चाक्रीष्टचाय हृदिष्यसो । षडक्षरोऽयं संप्रोक्तः सर्वसिद्धिकरो मनुः ॥१५८॥ क्रोडः शान्तो॑ऽवुवह्नयाढ्यो मायाबीजं प्रकीर्तितम् । गोविद्वह्रिचन्द्राढ्यो मनुः श्रीबीजमीरितम् ॥१५९॥
आठ बार दूध वाले वृक्षों (आम, पीपल आदि) की समिधाओं से या घी, मधु तथा चीनी सहित पायस से हवन करे । इस तरह प्रतिदिन अपने हृदयारविन्द में लोकों के अधिपति तथा आराध्य कृष्णदेव का ध्यान करते हुए तीन हजार मंत्र का जप करना चाहिये । साधक उन्ही में अपने मन को लगा कर सायंकालीन विधि के अनुसार पूजन तथा हवन भी करे । जो विद्वान् इस प्रकार नित्य गोपालनंदन की आराधना करते हैं, वे संसारसागर से पार होकर विष्णुलोक को जाते हैं ॥१४९-१५४॥ पहले दो त्रिभुज अंकित करे, जिसमें एक ऊर्ध्वमुख ओर दूसरा अधोमुख हो । एक के ऊपर दूसरा त्रिकोण होना चाहिए। इस प्रकार छह कोण हो जाएँगे । कोण बाह्य भाग में होंगे । उनके बीच में जो षट्कोण चक्र होगा, उसे अग्निपुर कहते हैं । उस अग्निपुर की कर्णिका (मध्यभाग) में 'क्लीं' यह बीजमंत्र अंकित करे । उसके साथ साध्य पुरुष एवं कार्य का भी उल्लेख करे । बहिर्गत कोणों के विवर में षडक्षर मंत्र लिखे । छह कोणों के ऊपर एक गोलाकार रेखा खींचकर उसके बाह्यभाग में दशदल कमल अंकित करे । उन दश- दलों के केसरो में एक-एक में दो-दो अक्षर के क्रम से 'ह्रीं' और 'श्रीं' पूर्वक अष्टादशाक्षर मंत्र के अक्षरों का उल्लेख करे । तदनन्तर दलों के मध्य भाग में दशाक्षर मंत्र के एक-एक अक्षर को लिखे । इस प्रकार लिखे हुए दशदल चक्र को भूपुर (चौकोर रेखा) से आवृत करे । भूपुर में अस्त्रों के स्थान में कामबीज (क्लीं) का उल्लेख करे । इस यंत्र को सोने के पत्र पर सोने की ही शलाका से गोरोचन द्वारा लिखकर उसकी गुटिका बना ले । यही गोपाल यंत्र है । यह सम्पूर्ण मनोरथों को देने वाला कहा गया है । जो रक्षा, यश, पुत्र, पृथ्वी, धन-धान्य, लक्ष्मी और सौभाग्य के इच्छुक हों, उन श्रेष्ठ पुरुषों को निरन्तर यह यन्त्र धारण करना चाहिए। इसका अभि- षेक करके मंत्रजपपूर्वक इसे धारण करना उचित है। यह तीनों लोकों को वश में करने के लिए एकमात्र उपाय है । इसकी महती शक्ति अवर्णनीय है ॥१५५-१५७॥ स्मर (क्लीं), त्रिविक्रम (ऋ) युक्त चक्री (क्) अर्थात् कृ, इसके पश्चात् ष्णाय तथा हृत् (नमः) - यह (क्लीं कृष्णाय नमः) षडक्षर-मंत्र कहा गया है जो संपूर्ण मनोरथों को सिद्ध करने वाला है । वाराह (हृ.) अग्नि
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अशीतितमोऽध्यायः ७२१ आभ्यामष्टादशलिपिः स्याद्विंशत्यक्षरो मनुः । शालग्रामे मणौ यंत्रे मंडले प्रतिमासु वा ॥१६०॥ नित्यं पूजा हरेः कार्या न तु केवलभूतले । एवं यो भजते कृष्णं स याति परमां गतिम् ॥१६१॥ विशाणंशय मुनिर्ब्रह्मा गायत्री छन्द ईरितम् । कृष्णश्च देवता कामो बीजं शक्तिर्द्विठो बुधैः ॥१६२॥ रामाग्निवेदवेदाब्दैर्नेत्रार्णैरंगकल्पनम् । मूलेन व्यापकं कृत्वा मनुना पुटितानथ ॥१६३॥ मातृकार्णान्न्यसेत्तत्तत्स्थानेषु सुसमाहितः । दशतत्त्वानि विन्यस्य मूलेन व्यापकं चरेत् ॥१६४॥ मंत्रन्यासं ततः कुर्याद्देवताभावसिद्धये । शीर्षे ललाटे भ्रूमध्ये नेत्रयोः कर्णयोस्तथा ॥१६५॥ नसोर्वक्त्रे च चिबुके कण्ठे दोर्मूलके हृदि । उदरे नाभिदेशे च लिंगे मूलसरोरुहे ॥१६५॥ कट्यां जान्वोर्जंघयोश्च गुल्फयोः पादयोः क्रमात् । न्यसेद्गदंतान्मंत्राणां सृष्टिन्यासोऽयमीरितः ॥१६७॥ हृदये चोदरे नाभौ लिंगे मूलसरोरुहे । कट्यां जान्वोर्जंघयोश्च गुल्फयोः पादयोस्तथा ॥१६८॥ मूर्ध्नि कपोले भ्रूमध्ये नेत्रयोः कर्णयोर्नसोः । वदने चिबुके कंठे दोर्मूले विन्यसेत्क्रमात् ॥१६६॥ नमोऽन्तान्मंत्रवर्णांश्च स्थितिन्यासोऽयमीरितः । पादयोर्गुल्फयोश्चैव जंघयोर्जानुनोस्तथा ॥१७०॥ कट्यां मूले ध्वजे नाभौ जठरे हृदये पुनः । दोर्मूले कंठदेशे च चिबुके वदने नसोः ॥१७१॥ कर्णयोर्नेत्रयोश्चैव भ्रूमध्ये निटिले तथा । मूर्ध्नि न्यसेन्मंत्रवर्णान्संहाराह्वयोऽयमीरितः ॥१७२॥ पुनः सृष्टिस्थितिन्यासौ विधाय वैष्णवोत्तमः । मूर्तिपंजरनामानं विन्यसेत्पूर्ववत्ततः ॥१७३॥ पुनः षडंगं कृत्वाथ ध्यायेत्कृष्णं हृदंबुजे । द्वारवत्यां सहस्रार्कभास्वरैर्भवनोत्तमैः ॥१७४॥ अनल्पैः कल्पवृक्षैश्च परीते मणिमण्डपे । ज्वलद्रत्नमयस्तं भद्वारतोरणकुड्यके ॥१७५॥
(२), शान्ति (ईं) और इन्दु (अनुस्वार) से युक्त हो तो श्रीबीज—'श्रीं' कहा गया है। इन दोनों बीजों से युक्त होने पर अष्टादशाक्षर मन्त्र (ह्रीं श्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) बीस अक्षरों का हो जाता है । हरि की नित्य पूजा शालग्राम, मणि, यंत्र, मंडल तथा प्रतिमाओं में करनी चाहिये, केवल भूमि पर न करे । उक्त प्रकार से कृष्ण की आराधना करने वाला व्यक्ति उत्तम गति को प्राप्त करता है । उक्त बीस अक्षर वाले मंत्र का ऋषि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता कृष्ण; बीज क्लीं और शक्ति स्वाहा है। मन्त्र के बीस अक्षरों से अङ्गन्यास करना चाहिये। मन्त्रसंपुटित मूल से व्यापकन्यास कर देवभाव की सिद्धि के लिये मन्त्रन्यास भी करे । शिर, ललाट, भ्रू मध्य, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, ठुड्डी, कंठ, बाहुमूल, हृदय, उदर, नाभि, लिंग, मूलाधार पद्म, कटि, जानु, ऊरु, जंघा, गुल्फ तथा चरणों में 'नमः' पर्यन्त मन्त्राक्षरों का क्रमशः न्यास करे । इसका नाम सृष्टिन्यास है । १५८-१६७।। हृदय, उदर, नाभि, लिंग, मूलाधारपद्म, कटि, जानु, ऊरु, जंघा, गुल्फ, चरण, मस्तक, कपोल, भ्रू मध्य, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, ठुड्डी, कंठ तथा बाहुमूल, में 'नमः' पर्यन्त मन्त्रवर्णों का क्रमशः न्यास करना स्थितिन्यास कहलाता है। चरण, गुल्फ, जंघा, जानु, कटि, मूलाधार, लिंग, नाभि, उदर, हृदय, बाहुमूल, कंठ, ठुड्डी, वदन, नासिका, कर्ण, नेत्र, भ्रू मध्य ललाट तथा मस्तक में मंत्रवर्णों का न्यास करना संहारन्यास कहलाता है। उत्तम वैष्णव को इन न्यासों के कर लेने के बाद पुनः सृष्टिन्यास तथा स्थितिन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् मूर्तिपंजरन्यास एवम् षडंगन्यास करके अपने हृदयारविन्द में श्रीकृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि द्वारका में सहस्र दिनकरों के समान चमकनेवाले कतिपय उत्तम भवनों तथा कल्पवृक्षों से वेष्टित एक मणिमय मंडप है, जिसके स्तंभ, द्वार, तोरण तथा कुड्य जाज्वल्यमान रत्नों के बने हैं। उस मण्डप में तरह-तरह के चित्र लिखे हैं। उसमें टंगे वितान से मोतियां लटक रही हैं ॥१६८-१७५॥ उसके मध्य में पद्मरागमणि
६१ ना० पु०
७२२ नारदीयपुराणम् फुल्लप्रफुल्लसच्चित्रवितानालंबिमौक्तिकै । पद्मरागस्थलीराद्रत्नसंघैश्च मध्यतः ॥१७६॥ अनारतगलद्रत्नधाराढ्यस्वस्तरोधः । रत्नप्रदीपावलिभिः प्रदीपितदिगंतरे ॥१७७॥ उद्यदादित्यसंकाशमणिसिंहासनांबुजे । समासीनोऽच्युतो ध्येयो द्रुतहाटकसन्निभः ॥१७८॥ समानोदितचंद्राकतडित्कोटिसमद्युतिः । सर्वांगसुंदरः सौम्यः सर्वाभरणभूषितः ॥१७९॥ पीतवासाः शंखचक्रगदांभोजलसत्करः । अनाहतोच्छलद्रत्नधारौघकलशं स्पृशन् ॥१८०॥ वामपादांबुजाग्रेण मुष्णता पल्लवच्छविम् । रुक्मिणीसत्यभामेऽस्य मूर्ध्नि रत्नोघधारया ॥१८१॥ सिंचंत्यौ दक्षवामस्थे स्वदोस्थकलशोत्थया । नाग्नजिती सुनंदा च दिशंत्यौ कलशौ तयोः ॥१८२॥ ताभ्यां च दक्षवामस्थमित्रविंदासुलक्ष्मणे । रत्ननद्याः समुद्धृत्य रत्नपूर्णौ घटौ तयोः ॥१८३॥ जांबवती सुशीला च दिशंत्यौ दक्षवामके । बहिः षोडश साहस्त्रसंख्याकाः परितः प्रियाः ॥१८४॥ ध्येयाः कनक रत्नोघधारायुक्तकलशोज्ज्वलाः । तद्बहिश्चाष्टनिधयः पूरयंतो धनैर्धराम् ॥१८५॥ तद्बहिर्वृष्णयः सर्वे पुरोवच्च स्वरादयः । एवं ध्यात्वा जपेलक्षपंचकं तद्दशांशतः ॥१८६॥ अरुणैः कमलैर्हुत्वा पीठे पूर्वोदिते यजेत् । विलिप्य गंधपंकेन लिखेद्दष्टदलांबुजम् ॥१८७॥ कर्णिकायां च षट्कोणं साध्यं तत्र मन्मथम् । शिष्टैस्तु सप्तदशभिरक्षरैर्वेष्टयेत्स्वरम् ॥१८८॥ प्राग्रक्षोऽनीलकोणेषु श्रियं शिष्टेषु संविदम् । षट्सु संधिषु षट्कर्णे केसरेषु त्रिंशस्त्रिशः ॥१८९॥ विलिखेत्स्मरणायत्रीं मालामंत्रं दलाष्टके । षट्शः संलिख्य तद्बाह्ये वेष्टयेन्मातृकाक्षरैः ॥१९०॥ तथा बहुमूल्य रत्नों का काम इस तरह किया हुआ है कि देखते ही बनता है । वहीं कल्पवृक्ष के नीचे सतत प्रल- वित होनेवाले रत्नों से मानों धारायें निकल रही हैं । रत्नों की बनी दीपावलियां दिग्-दिगन्त को प्रकाशित कर रही हैं, उसी मण्डप में उदित होते हुए आदित्य के समान मणिमय सिंहासनकमल पर संतप्त सुवर्ण के सदृश कांतिवाले केशव समासीन हैं । उनकी द्युति एक काल में उदित होते हुए करोड़ों सूर्य, चन्द्र तथा विद्युत् के समान है । वे सर्वाङ्गसुन्दर, सौम्य तथा समस्त आभूषणों से आभूषित हैं । पीताम्बर पहने हुए हैं। हाथों में शंख, चक्र, गदा एवम् पद्म धारण किये हैं। और एक ऐसे कलश को उठाये हैं, जो बिना टकराये ही रत्नों की धारा बहा रहा है ।। १७६-१८०।। उनके बाँयें पैर का नाखून नवकिसलय की छवि को लज्जित कर रहा है । उनके बाँयें तथा दाहिने भाग में रुक्मिणी तथा सत्यभामा खड़ी होकर अपने हाथों में दिव्य कलश ले उनसे निकलती हुई रत्नराशिमयी धाराओं से उन (श्री कृष्ण) के मस्तक पर अभिषेक कर रही हैं । नाग्नजिती और सुनन्दा उन दोनों को कलश पकड़ा रही हैं । मित्रविन्दा और सुलक्ष्मणा रत्ननदी से रत्न ले-ले कर कलशों को भर रही हैं। उनके दाहिने और बाँयें भाग में जांबवती तथा सुशीला और चतुर्दिक्षु सोलह हजार स्त्रियां सुवर्ण एवम् रत्नों की धारा बहानेवाले शुक्ल कलश धारण किये खड़ी हैं । उनके पीछे आठों निधियां धन से धरा को परिपूर्ण कर रही हैं ।।१८१-१८५।। निधियों के पीछे समस्त वृष्णिवंशी उपस्थित हैं। इस प्रकार ध्यान कर पाँच लाख मंत्र का जप करे और उसका दशांश लाल कमल से पूर्वोक्त पीठ पर हवन करे । तदनन्तर अष्टगंध से अष्टदलकमल लिखे जिसकी कर्णिका पर षट्कोण, साध्यनाम तथा क्लीं लिख कर मन्त्र के सत्रह अक्षरों से स्वर को वेष्टित करे । पूर्व, नैर्ऋत्य तथा वायव्यकोण में श्री, अवशिष्ट कोणों में संवित्, छः संधियों, षट्कर्ण तथा केसरों के ऊपर तीस तीस प्रणव लिख कर अष्ट दल पर काम गायत्री तथा मालामंत्र को लिखे। उसे मातृकाक्षरों से वेष्टित कर
अशीतितमोऽध्यायः ७२३ भूबिंबं च लिखेद्वाह्ये श्रीमायादिग्वििदक्ष्वपि । भूग्रहं चतुरस्रं स्यादष्टवज्रविभूषितम् ॥१८६॥ एतद्यंत्रं हाटकादिपट्टेष्वालिख्य पूर्ववत् । संस्कृतं धारयेद्यो वै सोऽर्च्यते त्रिदशैरपि ॥१८२॥ स्याद्गायत्री वामदेवपुष्पबाणौ तु ङेतिमौ । विद्महेधीमहियुतौ तन्नोऽनंगः प्रचोदयात् ॥१८३॥ जप्य जप्यौ गोपालमूलां जनरंजनी । हृदयं कामदेवाय ङेतं सर्वजनप्रियम् ॥१८४॥ उक्त्वा सर्वजनांते तु संमोहनपदं तथा । ज्वल ज्वल प्रज्वलेति प्रोच्य सर्वजनस्य च ॥१८५॥ हृदयं मम च ब्रूयाद्वशं कुरु युगं शिरः । प्रोक्तो मदनमंत्रोऽष्टचत्वारिंशद्भिभक्षरैः १८६॥ जपादौ स्मरबीजाद्यो जगत्त्रयवशीकरः । पीठं प्राग्वत्समभ्यर्च्य मूर्ति संकल्प्य मूलतः ॥१८७॥ तत्रावाहाच्युतं भक्त्या सकलीकृत्य पूजयेत् । आसनादिविभूषांतं पुनर्न्यासक्रमाद्यजेत् ॥१८८॥ सृष्टि स्थितिं षडंगं च किरीटं कुंडलद्वयम् । शंखं चक्रं गदां पद्मं मालां श्रीवत्सकौस्तुभौ ॥१८६॥ गन्धपुष्पैः समभ्यर्च्य मूलेन वैष्णवोत्तमः । षट्कोणेषु षडंगानि दिग्दलेषु क्रमाद्यजेत् ॥२००॥ वासुदेवाविकान्कोणेषु तु शांत्यादिकांस्ततः । पत्राग्रगा महिष्योऽष्टौ यजेत्साधकत्तमः ॥२०१॥ ततः षोडशसाहस्रं सकृद्देवार्चयेत्प्रियाः । इंद्रनीलमुकुन्दांश्च करालांनद कच्छपान् ॥२०२॥ शंखपद्मौ ततः पश्चात्वान्निधीनष्टौ क्रमाद्यजेत् । तद्वर्हिलोकपालांश्च वज्राद्यानपि पूजयेत् ॥२०३॥ एवं सप्तावृतितवृतं कृष्णमभ्यर्च्य चादरात् । प्रीणयेद्दधिखंडाज्यमिश्रेण तु पयोऽधसा ॥२०४॥ दिव्योपचारं दत्त्वाथ स्तुत्त्वा नत्वा च केशवम् । उद्वासयेत्स्वहृदये परिवारगणैः सह ॥२०५॥ न्यस्यात्मानं समभ्यर्च्य तन्मयो विहरेत्सुधीः । रत्नाभिषेकध्यानेज्या विंशत्यर्णाश्रितेरिता ॥२०६॥
बाहर भूबिम्ब लिखे। फिर दिशा-विदिशाओं में श्री, माया आदि लिखकर भूग्रह तथा अष्टवज्रविभूषित चतुरस्र लिखे। यह यंत्र सुवर्ण आदि के पट्ट पर लिखना चाहिये। इस यन्त्र को सुसंस्कृत करके जो धारण करता है, वह देवताओं से भी पूजित होता है। "वामदेव पुष्पबाणौ विद्महे धीमहि तन्नोऽनंगः प्रचोदयात्" यह काम गायत्री है ॥१८६-१८६॥ कृष्णमंत्रों के जप करने से पहिले इसका जप करना चाहिये। यह मनुष्यों को आनन्द देनेवाली है। "हृदयम्.....युगं शिरः" यह काममन्त्र है, जिसमें चालीस अक्षर होते हैं। जप के आदि में इस स्मर- बीजमन्त्र को जपने से तीनों लोक वशीभूत होते हैं। पूर्वोक्त रीति से पीठ की अर्चना कर उस पर मूलमंत्र से मूर्ति की स्थापना करके उसमें कृष्ण का आवा- हन करे और उसमें पूर्णता की भावना से पूजा करे। आसन से लेकर आभूषण तक भगवान् को अर्पण करके फिर न्यासक्रम से आराधना करे। सृष्टि, स्थिति, षडंग किरीट, दोनों कुण्डल, शंख, चक्र, गदा, पद्म, माला, श्रीवत्स तथा कौस्तुभ की गंध पुष्पों से पूजा कर श्रेष्ठ वैष्णव मूलमंत्र द्वारा छह कोणों में छह अंगों का और पूर्वादि दलों में क्रमशः वासुदेव आदि तथा कोणों में शान्ति आदि का क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ साधक दलों के अग्रभाग में आठ राजमहिषियों की अर्चना कर सोलह हजार कृष्ण-प्रियाओं का एक ही साथ पूजन करे ॥१९४- २०१३॥ तदनन्तर इन्द्र, नील, मुकुन्द, कराल, आनन्द, कच्छप, शंख तथा पद्म इन अष्ट निधियों का क्रमशः पूजन कर लोकपालों तथा उनके अस्त्रों की भी पूजा करे। इस प्रकार सात बार आदर पूर्वक कृष्ण की आरा- धना कर उन्हें दही, मिश्री, घी, दूध, अन्न तथा दिव्य उपहार समर्पण कर स्तुति एवम् नमस्कार करे। पुनः अपने हृदय में सपरिवार कृष्ण का ध्यान कर भगवत्स्वरूप आत्मा का पूजन करके विद्वान् पुरुष तन्मय होकर विचरे । उनका रत्नाभिषेक, ध्यान, पूजन आदि बीस अक्षरों वाले मंत्र के अधीन है-ऐसा कहा गया है ॥२०२-२०६॥
७२४ नारदीयपुराणम्
एवं यो भजते मन्त्रं स समृद्धेः पदं भवेत् । जपहोमार्चनध्यानैयों मनुं प्रजपेदमुम् ॥२०७॥ तद्देश्म पूर्यते रत्नैः स्वर्णधान्यैरनारतम् । पृथ्वी पृथ्वी करे तस्य सर्वसस्यसमाकुला ॥२०८॥ पुत्रैर्मित्रैः सुसंपन्नः प्रयात्यंते परां गतिम् । वह्नावभ्यर्च्य गोविन्दं शुक्लपुष्पैः सतंडुलैः ॥२०६॥ आज्याक्तै रयुतं हुत्वा भस्म तन्मूर्ध्नि धारयेत् । तस्यान्नादिसमृद्धिः स्यात्तद्वशं सर्वयोषितः ॥२१०॥ रक्तांभोजैस्त्रिमध्वक्तैर्हुनेल्लक्षं समाहितः । श्रिया तस्यैद्रमैश्वर्यं तृणलेशायते ध्रुवम् ॥२११॥ त्रिमध्वक्तैः सितैः पुष्पैराष्टोत्तरसहस्रकम् । या हुनेत्प्रत्यहं मासात्पुरोधा नृपतेर्भवेत् ॥२१२॥ एवमादिप्रयोगांश्च साधयेन्मनुनामुना । मन्त्रराजमथो वक्ष्ये दशार्णं सर्वसिद्धिदम् ॥२१३॥ स्मृतिः सद्यान्विता साक्षिलोहितो जनवल्लभा । पवनोऽग्निप्रियांतोऽयं दशार्णो मन्त्र ईरितः ॥२१४॥ नारदोऽस्य मुनिश्च्छंदो विराट् कृष्णोऽस्य देवता । कामो बीजं वह्निजाया शक्तिः प्रोक्ता मनीषिभिः ॥२१५॥ आचक्रं च विचक्रं च सुचक्रं तदनन्तरम् । त्रैलोक्यरक्षणं चक्रंसुरांतकचक्रकम् २१६॥ एतैरैंङद्वयांतैश्च चक्रैः पंचांगकं मनोः । ततस्तारपुटं मन्त्रं व्याप्य करयोस्त्रिशः ॥२१७॥ सेंदून्हृदंतान्मंत्रवर्णान्प्रणवांतरितान्यसेत् । दक्षांगुष्ठाच्च वामांगुष्ठांतमंगुलिपर्वसु ॥२१८॥ सृष्टिन्यासोऽयमुदितः स्थितिन्यासोऽधुनोच्यते । न्यसेद्दामकनिष्ठानिकनिष्ठांतं स्थितौ सुधीः ॥२१६॥ वामांगुष्ठान्न्यसेद्दक्षांगुष्ठांतं संहृतौ तथा । संहृतिर्दोषसंघातहारिणी परिकीर्तिता ॥२२०॥
जो विद्वान् उक्त प्रकार से कृष्णमन्त्र को उपासना करते हैं, वे समृद्धिशाली होते हैं। जो मनुष्य जप, होम, अर्चन तथा ध्यान पुरस्सर उक्त मन्त्र का जप करता है, उसका घर सतत धन-धान्य तथा स्वर्ण से परिपूर्ण रहता है। उसके खेतों में सब प्रकार के अन्न उपजते हैं। वह पुत्र-मित्रों से सुसम्पन्न होकर अन्त में उत्तम गति को प्राप्त करता है। जो गोविन्द की अर्चना कर तन्दुल, घी तथा श्वेत पुष्पों से अग्नि में हवन करता है, उसे प्रचुर अन्न आदि तथा रमणियाँ प्राप्त होती हैं। जो त्रिमधुयुक्त रक्त कमलों से एक लाख हवन करता है उसके ऐश्वर्य के सामने इन्द्र का भी ऐश्वर्य नगण्य-सा हो जाता है, जो एक मास तक प्रत्येक दिन त्रिमधुयुक्त श्वेत पुष्पों से एक सौ आठ बार हवन करता है, उसे राजपुरोहित का पद प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक प्रयोग उक्त मंत्र से सिद्ध किये जा सकते हैं। अब मैं दस अक्षरोंवाले सर्वसिद्धिदायक मंत्रराज को बतलाता हूँ ॥२०७-२१३॥ स्मृति (ग्) यह सद्य (ओ) से युक्त हो और लोहित (प्) वामनेत्र (ई) से संलग्न हो। इसके बाद 'जनवल्लभा' ये अक्षर समुदाय हों तत्पश्चात् पवन (य) हो और अन्त में अग्निप्रिया (स्वाहा) हों तो यह (गोपीजनवल्लभाम स्वाहा) दशाक्षर मंत्र है। इसके मुनि नारद, छंद विराट्, देवता कृष्ण, बीज क्लीं और स्वाहा शक्ति है। आचक्र, विचक्र, सुचक्र, त्रैलोक्यरक्षण चक्र और सुरांतकचक्र ये पाँचों चक्र मन्त्र के अंग कहलाते हैं। इन शब्दों के अन्त में ङे विभक्ति और स्वाहा पद जोड़ कर इन पंचविधचक्रों द्वारा पंचांगन्यास करे। तदनन्तर प्रणवसंपुटित मन्त्र पढ़कर दोनों हाथों में तीन बार व्यापक न्यास तत्पश्चात् मन्त्र के प्रत्येक अक्षर को अनुस्वारयुक्त करके उनके आदि में प्रणव और अन्त में नमः जोड़कर उनका दाहिने हाथ के अंगूठे से लेकर बाँयें हाथ के अंगूठे तक के अंगुलिपर्वों में भी न्यास करे। इसका नाम सृष्टिन्यास है। अब स्थितिन्यास कहा जाता है ॥२१४-२१८॥ वाम हस्त की कनिष्ठा से लेकर दक्षिण हस्त की कनिष्ठा तक पूर्वोक्त रूप से मंत्राक्षरों का न्यास
अशीतितमोऽध्यायः ७२५ विद्याप्रदश्च सृष्ट्यंतो वर्णिनां शुद्धचेतसाम् । स्थित्यंतः स्याद्गृहस्थानामेवं काम्यादिरूपतः ॥२२१॥ संहारान्तो मुनींद्राणां विरक्तानां च सर्वशः । पुनः स्थितिक्रमेणार्णान्मनोरंगुलिषु न्यसेत् ॥२२२॥ पुनश्चक्रैश्च पूर्वोक्तैः पंचांगं करयोर्न्यसेत् । ततो मूलेन पुटितान्मातृकार्णान्सबिंदुकान् ॥२२३॥ विन्यसेन्मातृकान्यासस्थानेषु प्रणतः सुधीः । ततस्तारपुटं मूलं व्यापकत्वेन विन्यसेत् ॥२२४॥ संहारसृष्टिभेदेन दशत्तत्वानि विन्यसेत् । नमोंतमूलमंत्राणंपदायाम्यानि चात्मने ॥२२५॥ मत्यंतानि च तत्त्वानि पृथिव्याद्यानि च क्रमात् । पृथ्वी जलं तथा वह्निर्वायुराकाशमेव च ॥२२६॥ अहंकारो महत्तत्त्वं प्रकृतिं पुरुषं परम् । प्रविन्स्येन्मस्तके च नेत्रयोः श्रोत्रयोर्नसोः ॥२२७॥ वदने हृदये नाभौ लिंगे जान्वोश्च पादयोः । प्रणवांतरितान्वर्णान्हृदंतान्विन्यसेन्मतोः ॥२२८॥ सृष्टिन्यासोऽयमाख्यातः स्थितिन्यासं शृणु द्विज । हृदि नाभौ ध्वजे जान्वोः पाद्योर्मस्तके पुनः ॥२२८ 1/2॥ नेत्रयोः कर्णयोर्घ्राणे वदने विन्यसेत्क्रमात् । पदोर्जान्वोलिंगदेशे नाभौ हृदि मुखे नसोः ॥२३०॥ कर्णयोर्नेत्रयोर्मूर्ध्नि संहाराख्योऽयमीरितः । सृष्ट्यंतो वर्णिनां न्यासः स्थित्यंतो गृहमेधिनाम् ॥२३१॥ यतेर्वैराग्ययुक्तस्य संहारान्तः प्रकीर्तितः । चतुर्द्धा वर्णिनां चैव गृहस्थानां च पंचधाः ॥२३२॥ यतीनां च त्रिधा न्यासः प्रोक्तोऽयं क्रमशः शुभः । केचिद्विरक्ते गृहगे संहारान्तं विदुबुधाः ॥२३३॥ विभूतिपंजरं न्यासं कुर्यादिष्टप्तये ततः । मनोर्दशावृत्तिमयं कृष्णसांनिध्यकारकम् ॥२३४॥ आधारे च ध्वजे नाभौ हृदि कंठे मुखे शये । ऊर्ध्वांच कंधरायां च नाभौ कुक्षौ तथा हृदि ॥२३५॥ करे। संहारन्यास में वामांगुष्ठ से लेकर दक्षिणांगुष्ठ तक उक्त मन्त्राक्षरों का न्यास करे। क्योंकि संहारन्यास दोषसमूह का नाश करने वाला है। शुद्ध चित्त वाले संन्यासियों के लिये उक्त न्यासद्वय के साथ सृष्टि न्यास विद्या को देने वाला है। अन्त में किया जाने वाला स्थितिन्यास गृहस्थों की कामनाओं को सफल करता है। अन्त में किया जाने वाला संहारन्यास मुनीन्द्रों और विरक्तों के लिये लाभदायक है। तदनन्तर साधक पुनः स्थितिन्यासक्रम से मंत्राक्षरों को अंगुलियों में न्यस्त करे। तदनन्तर पूर्वोक्त चक्रों से हाथों में पंचाङ्ग- न्यास करे। पश्चात् मूलमन्त्र से संपुटित तथा सबिंदुक मातृकाक्षरों का मातृकान्यासस्थानों में प्रणामपूर्वक न्यास करे। पश्चात् प्रणव संपुटित मूलमन्त्र का उच्चारण करके व्यापकन्यास करे। संहार और सृष्टि के भेद से दस तत्त्वों का विन्यास करे। मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासिकापुटों, मुख, हृदय, नाभि, लिंग, जानुओं तथा चरणों में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति तथा पुरुष का न्यास कर मन्त्र के हृदंत अक्षरों को प्रणवान्तरित करके न्यस्त करना चाहिये। यह सृष्टिन्यास कहलाता है। अब स्थितिन्यास सुनो ॥२१९-२२८ 1/2॥ हृदय, नाभि, लिंग, जानुओं, चरणों, मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासिका तथा मुख में क्रमशः न्यास करने का नाम सृष्टि न्यास है। चरणों, जानुओं, लिंग, नाभि, हृदय, मुख, नासिका, कर्णों, नेत्रों तथा मस्तक में न्यास करने का नाम संहारन्यास है। संन्यासियों के लिये सृष्टिन्यास, गृहस्थों के लिये स्थितिन्यास और वैराग्ययुक्त यतियों के लिये संहारन्यास करना चाहिये। सन्यासियों को चार प्रकार के, गृहस्थों को पांच प्रकार के और यतियों को तीन प्रकार के न्यास क्रमशः करने चाहिये। कोई कहते हैं कि जो घर छोड़कर विरक्त हो गये हैं, उनके लिये संहारन्यास ही ठीक है। ॥२२९-२३३॥ इष्ट प्राप्ति के लिये विभूतिपंजरन्यास करना चाहिये। यह न्यास मन को सुस्थिर करने वाला तथा कृष्णसान्निध्यमोक्ष को देने वाला है। मूलाधार, लिंग, नाभि, हृदय, कंठ, मुख, स्कंधों, ऊरुओं, नाभि, कुक्षि, स्तनों, पार्श्वों, श्रोणियों, मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासापुटों, कपोलों, दक्षिण भुजा के मूल तथा अंगुलियों में न्यास कर शिर, पूर्व आदि दिशाओं, अपनी कलाओं, भुजाओं, सबन्धियों, शिर,
७२६ नारदीयपुराणम् स्तनयोः पार्श्वयोः श्रोण्योर्मस्तके वदने तथा । नेत्रयोः कर्णयोर्नासापुटयोश्च कपोलयोः ॥२३६॥ एवं दक्षिणदोर्मूलसंध्यग्रेष्वंगुलीषु च । ततः शिरसि तत्पूर्वाद्याशासु स्वकलासु च ॥२३७॥ दोष्णोः सक्थ्नोः शिरोश्वास्यकंठहृज्जठरेषु च । मूलाधारे लिंगदेशे जानुनोः पादयोस्तथा ॥२३८॥ श्रोत्रगंडांसवक्षोजपार्श्वलिंगेषु विन्यसेत् । ऊर्वोर्जान्वोर्जंघयोश्च पादयोर्विन्यसेत्क्रमात् ॥२३९॥ विभूतिपंजराख्योऽयं न्यासः सर्वार्थसिद्धिदः । अनेन न्यासवर्येण साक्षात्कृष्णतनुर्भवेत् ॥२४०॥ मूर्तिपंजरनामानं न्यासं पूर्वोदितं न्यसेत् । ततो दशांगपंचांगौ न्यासवर्यौ न्यसे क्रमात् ॥२४१॥ हृदि मूर्ध्नि शिखायां च सर्वांगे दिक्षु पार्श्वयोः । कट्यां पृष्ठे तथा मूर्ध्नि विन्यसेद्वैष्णवोत्तमः ॥२४२॥ पंचांगानि न्यसेद्भूयश्चक्रैः प्राग्वत्समाहितः । अन्योऽप्यष्टादशार्णोक्तः कर्तव्यो न्याससंचयः ॥२४३॥ ततः किरीटमंत्रेण व्यापकं रचयेत्सुधीः । वेणुबिल्वादिमुद्रांश्च दर्शयेत्साधकोत्तमः ॥२४४॥ सुदर्शनस्य मंत्रेण कुर्याद्दिग्बंधनं ततः । अनंगुष्ठाश्च ऋजवः करशाखा भवंति चेत् ॥२४५॥ हृन्मुद्रेयं समाख्याता शिरोमुद्रा तथा भवेत् । अधोगुष्ठा तु या मुष्टिः शिखामुद्रेयमीरिता । प्रसारितांगुल्योवर्ममुद्रेयमीरिता ॥२४६॥ नाराचमुष्ट्या धृतबाहुयुग्मकांगुष्ठतर्जन्यदितो ध्वनिस्तु । विश्वग्विमुक्ता कथितास्त्रमुद्रा यत्राक्षिणी तर्जनीमध्यमे च ॥२४७॥ ओष्ठे वामकरांगुष्ठो लग्नस्तस्य कनिष्ठिका । दक्षिणांगुष्ठसंसक्ता तत्कनिष्ठा प्रसारिता ॥२४८॥
नेत्रों, मुख, कंठ, हृदय, उदर, मूलाधार, लिंग, जानुओं, चरणों, कर्णों, कपोलों, स्तनों, पाश्वों तथा लिंग में न्यास करे । पुनः ऊरुओं, जानुओं, जंघाओं तथा चरणों में क्रमशः न्यास करना चाहिये । इसीका नाम विभूतिपंजर- न्यास है । यह सकल कामनाओं को पूर्ण करता है । इस उत्तम न्यास के करने से साक्षात् कृष्ण-शरीर की प्राप्ति होती है । इसके कर लेने के बाद न्यासों में श्रेष्ठ दशांग तथा पंचांग-न्यास क्रमशः करना चाहिए ॥२३४-२४१॥ उत्तम विष्णुभक्त हृदय, मस्तक, शिखा, समस्त अङ्गों, दिशाओं, पाश्वों, कटि, पृष्ठ तथा शिखर— इन अङ्गों में एक-एक अक्षर का न्यास करे । फिर एकाग्रचित्त हो पूर्वोक्त चक्रों द्वारा पुनः पूर्ववत् पंचांगन्यास करे । अष्टादशाक्षर मन्त्र के अनुसार अन्य-अन्य न्यास भी करने चाहिये । तदनन्तर किरीटमन्त्र से व्यापकन्यास कर वेणु, बिल्व आदि मुद्रायें दिखलाये । पश्चात् सुदर्शनमन्त्र से दिग्बन्ध करे । अंगुष्ठों को छोड़कर अन्य अंगुलियों को सीधी करने का नाम हृदयमुद्रा है । शिरोमुद्रा भी इसी तरह बनाई जाती है । अंगुष्ठ को नीचे करके मुट्ठी बाँधने का नाम शिखामुद्रा है । करांगुलियों को फैला देने का नाम वर्ममुद्रा है ॥२४२-२४६॥ बाण की मुट्ठी तरह उठी हुई दोनों भुजाओं के अंगुष्ठ ओर तर्जनी से चुटकी बजाकर उसकी ध्वनि को सब ओर फैलाना, इसे अस्त्र मुद्रा कहा गया है । तर्जनी और मध्यमा-ये दो अंगुलियां नेत्र मुद्रा हैं । जहाँ तीन नेत्र का न्यास करना हो, वहाँ तर्जनी, मध्यमा के साथ अनामिका अंगुलि को भी लेकर नेत्रत्रय का प्रदर्शन कराया जाता है । बाँयें हाथ का अंगूठा ओष्ठ में लगा हो । उसकी कनिष्ठिका अंगुलि दाहिने हाथ के अंगूठे से सटी हो, दाहिने हाथ की कनिष्ठिका फैली हुई हो और उसकी तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियां कुछ सिकोड़- कर हिलाई जाती हों तो यह वेणुमुद्रा कही गई है । यह अत्यन्त गुप्त होने के साथ ही भगवान् श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय है । वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ नामक मुद्रायें प्रसिद्ध हैं । अतः उनका वर्णन नहीं किया जाता है। बाँये अंगूठे को ऊर्ध्वमुख खड़ा करके उसे दाहिने हाथ के अंगूठे से बाँध ले और उसके अग्रभाग को दाहिने
अशीतितमोऽध्यायः ७२७ तर्जनी मध्यमानामा किञ्चित्संकुच्य चालिता। वेणुमुद्रेयमुदिता सुगुप्ता प्रेयसी हरेः । नोच्यंते तत्र सिद्धत्वान्मालाश्रीवत्सकौस्तुभाः ॥२४६॥ वामांगुष्ठं सनुद्रं तमपरकरांगुष्ठकेनाथ बद्ध्वा संपीड्याग्रं च दक्षांगुलिभिरपि च तां वामहस्तांगुलीभिः । गाढं बद्ध्वा स्वकीये हृदयसरसिजे स्थापयेत्कामबीजं प्रोच्चार्यैषा तु गोप्या सकलसुखकरी बिल्वमुद्रा मुनींद्रैः ॥२५०॥ कायेन मनसा वाचा यत्पापं समुपाजितम् । मुद्रया ज्ञानमात्रेण सर्वं नाशमुपैष्यति ॥२५१॥ ध्यानं जपस्त्रिकालाद्यौ कार्या पूर्वोदिता मनोः । सर्वेष्वेकः क्रमः प्रोक्तो दशाष्टाष्टादशार्णयोः ॥२५२॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री प्रयोगान्कर्तुमर्हति । उद्द्बाहुदोर्दंडधृतगोवर्द्धनाचलम् ॥२५३॥ अन्यहस्तांगुलीव्यक्तस्वरवं शार्पिताननम् । ध्यायन्कृष्णं जपेन्मंत्रं व्रजेच्छत्रं विना सुधीः ॥२५४॥ वर्षवाताशनिभ्योऽपि भयं तस्य न जायते । मोघमेघौघवाताद्गतेन्द्रं तं स्मरन्हुनेत् ॥२५५॥ लोणेरयुतसंख्यैः स्यादानावृष्टिर्न संशयः । क्रीडंतमर्कजातीरे मज्जनस्नापनादिभिः ॥२५६॥ तच्छीकरजलासारैः सिच्यमानं प्रियाजनैः । ध्यात्वायुतं पयः सिक्तैहुनेद्वा नीरतर्पणैः ॥२५७॥ वृष्टिर्भवत्यकालेऽपि महती नात्र संशयः । सबाहमोहैरातंस्य विस्फोटकज्वरादिभिः ॥२५८॥ अमुमेव स्मरन्मूर्ध्नि जपेच्छांतिर्भवेत्क्षणात् । अथवा गरुडारूढं प्रद्युम्नबलसंयुतम् ॥२५६॥ निजज्वरनिष्पिष्टज्वराभिष्टुतमच्युतम् । ध्यात्वा मूर्ध्नि जपेन्मंत्रं ज्वरमुक्तो भवेज्ज्वरी ॥२६०॥ हाथ की अंगुलियों से दबाकर फिर उन अंगुलियों बाँये हाथ की अंगुलियों से खूब कस कर बांध ले और उसे अपने हृदय कमल में स्थापित करे। साथ ही कामबीज (क्लीं) का उच्चारण करता रहे। इसको मुनीन्द्रों ने बिल्वमुद्रा कहा है ॥२४७-२५०॥ यह सब को सुख देनेवाली तथा गोपनीय है। शरीर, मन, एवम् वाणी से जो पाप किया गया हो, वह सब इस मुद्रा के ज्ञानमात्र से नष्ट हो जायगा। ध्यान, जप तथा त्रिकालपूजन ये तीनों चीजें मंत्राराधन में की जाती हैं। मन्त्र चाहे दशाक्षर हो या अष्टादशाक्षर, सब में एक ही क्रम चलता है। मंत्र को भलीभांति सिद्ध कर लेने पर साधक उसका प्रयोग करे । जो श्रीकृष्ण अपनी भुजारूपी दंड पर गोवर्धन पर्वत को धारण कर एक हाथ की अंगुलियों से स्वर मिलाते हुए वंशी को मुंह से बजाते रहे, उनका ध्यान कर पूर्वोक्त मन्त्र का जप करे । जो विद्वान् ऐसा करते हैं, वे यदि बिना छत्र के भी चलें तो वर्षा, वायु एवम् वज्र उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते । मेघों एवम् पवनों समेत इन्द्र के कर्तव्य को व्यर्थ कर देने वाले कृष्ण ध्यान कर यदि दश हजार कोणों (क्षुद्र आंवला या लोनी साग ) से हवन किया जाय तो निःसन्देह वर्षा नहीं होगी ॥२५१-२५५३॥ यमुना तट पर स्नान, मज्जन आदि विविध प्रकार के क्रीडा करते हुए और प्रियाओं द्वारा जल के फुहारों से सिक्त किये जानेवाले कृष्ण का ध्यान कर दश हजार जलसिक्त लोणों से हवन या जलतर्पण किया जाय तो असमय में भी वृष्टि हो जायगी । इसमें संशय नहीं। जिसके शरीर में जलन होती है या जो विस्फोट क ज्वर आदि से पीडित है, उसके मस्तक पर यदि उक्त मन्त्र का जप कर दिया जाय तो तत्क्षण शांति हो जायगी ॥२५६-२५८३॥ कृष्ण गरुड पर आरूढ हैं, प्रद्युम्न तथा बलराम उनके साथ हैं, उनके ज्वर द्वारा पीड़ित हो (शंकर का) ज्वर उनकी स्तुति कर रहे हैं- ऐसा ध्यान कर ज्वरी के मस्तक पर उक्त मन्त्र का जप करने से ज्वर उतर जाता है। ऐसे ही रूप का ध्यान
७२८ नारदीयपुराणम् ध्यात्वैवमग्नावभ्यर्च्य यथोक्तैश्चतुरंगुलैः । जुहुयादमृताखण्डैरयुतं ज्वरशांतये ॥२५९॥ शिलीमुखविनिर्मिन्नभीष्मतापहरं हरिम् । ध्यात्वा जपेत्स्पृशन्नार्तं पाणिभ्यां ज्वरशांतये ॥२६०॥ सांदीपनाय दत्तं पुत्रं ध्यात्वायुतं हुनेत् । यथोक्तैरमृताखंडैरपमृत्युर्निवृत्तये ॥२६१॥ सपार्थं मृतपुत्रायार्पयंतं च द्विजन्मने । सुतं ध्यात्वा जपेल्लक्षं पुत्रपौत्रादिवृद्धये ॥२६४॥ पुत्रजीवफलैर्हुत्वायुतं मधुरसप्लुतैः । तत्काष्ठैरेधिते वह्नौ सुतान्दीर्घायुषो लभेत् ॥२६५॥ क्षीरद्रुक्वथसंपूर्णमभ्यर्च्य कलशं निशि । प्रातर्जप्त्वायुतं नारीमभिषिंचेद्द्विषड्दिनम् ॥२६६॥ एवं कृते तु वंध्यापि लभेत्पुत्रांश्चिरायुषः । प्रातर्वर्चायमाश्र्वत्थदलसंंपुटकं जलम् ॥२६७॥ अष्टोत्तरशतं जप्तं मासं पुत्रार्थिनी पिबेत् । सर्वलक्षणसंपन्नं वंध्यापि लभते सुतम् ॥२६८॥ जित्वा कृत्यां काशिराजप्रेषितां च निजारिणः । तेजसा तस्य नगरं दहंतं भावयन्हरिम् ॥२६९॥ हुनेत्सप्तदिनं मंत्री सुस्नेहाक्तैश्च सर्षपैः । कृत्याकर्तारमेवास्मै कुपिता नाशयेद्ध्रुवम् ॥२७०॥ बदरीद्रुमसंकीर्णे स्थितं दिव्याश्रमे शुभे । स्पृशंतं करपद्माभ्यां घंटाकर्णकलेवरम् ॥२७१॥ ध्यात्वैवं जुहुयाल्लक्षं तिलैस्त्रिमधुराप्लुतैः । महापापयुतोऽप्येवं पूतो भवति तत्क्षणात् ॥२७२॥ द्यूतासक्तौ रुक्मबलौ द्वेषयंतं हरिं स्मरन् । जुहुयाद्विष्टयोर्द्विष्टय गुलिका गोमयोद्भवाः ॥२७३॥ नित्यं सहस्रं सप्ताहान्मिथ्यो विद्वेषयेदरीन् । वर्षंतं गरुडारूढं ज्वलदग्निमुखैः शरैः ॥२७४॥ धावंतं रिपुसंघातमनुधावतमच्युतम् । ध्यात्वा सप्तसहस्रं तु जपेन्मंत्रमनन्यधीः ॥२७५॥ कर कृष्ण पूजन करके अग्नि में चार अंगुलि प्रमाण बहेड़े की लकड़ियों से हवन करने से ज्वर शांत हो जाता है, बाणों से विद्ध शरीरवाले भीष्म के ताप को हरनेवाले कृष्ण का ध्यान कर मन्त्र जप करते हुए हाथो से ज्वरी का स्पर्श करने से ज्वर छूट जाता है ॥२५९-२६२॥ सांदीपन मुनि को पुत्र देते हुए हरि का ध्यान कर बहेड़े की समिधाओं से दश हजार होमने से अपमृत्यु का निवारण होता है, मृतपुत्र ब्राह्मण को पुत्र समर्पित करते हुए अर्जुन सहित कृष्ण का ध्यान कर एक लाख मंत्र का जप करने से पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि होती है । मधु- मिश्रित पुत्रजीव (जियापुता) के फलों से उसी की समिधा से प्रज्वलित अग्नि में दश हजार होम करने से दीर्घायु पुत्र उत्पन्न होते हैं । रात्रि में गूलर के काढ़े से कलश को भर कर रख छोड़े । प्रातःकाल उसे दस हजार मन्त्र से अभिमन्त्रित कर स्त्री को सींचे बारह दिनों तक ऐसा करने से वंध्या भी दीर्घायु पुत्रों को उत्पन्न करती है । जो नारी पुत्र चाहती हो, वह प्रातःकाल मौन होकर पीपल के पत्तों के बने दोने में जल भर कर एक सौ आठ बार कृष्णमन्त्र से अभिमंत्रित करके पान करे । ऐसा करने से वंध्या के भी सर्वलक्षण संपन्न पुत्र उत्पन्न होता है २६३- २६८॥ काशिराज (पौंडू) द्वारा भेजी हुई कृत्या को जीत कर अपने तेज से शत्रु की नगरी को जलाने वाले हरि का ध्यान कर सात दिन स्नेहाक्त सरसों से हवन करने से कृत्या कुपित हो कर प्रयोग करने वाले को ही अर्थात् शत्रु को निश्चय मार देती है । बेर के वृक्षों से व्याप्त पवित्र दिव्याश्रम में अपने करकमलों से घंटाकर्ण के शरीर का स्पर्श करते हुए हरि का ध्यान कर त्रिमधुयुक्त तिलों से एक लाख हवन करने वाला महापापी भी तत्क्षण पवित्र हो जाता है । द्यूतक्रीड़ा करने में आसक्त रुक्मी तथा बल से द्वेष करते हुए हरि का स्मरण कर गोबर की बनी गुलियों से नित्य एक हजार हवन करना चाहिये । सात दिनों तक ऐसा करने से शत्रुओं में पर- स्पर फूट हो जाती है ॥२६९-२७३॥ गरुड़ पर चढ़ कर आग की ज्वाला उगलनेवाले बाणों की वर्षा करते हुए तथा भागने वाले शत्रुओं का पीछा करते हुए हरि का ध्यान कर उन्हीं में चित्त को लगाते हुए सात हजार मंत्र का
अशीतितमोऽध्यायः ७२६ उच्चाटनं भवत्येव शत्रूणां सप्तभिर्दिनैः । ध्यायन्नुत्क्षिप्तवत्सं तु कपित्थफलहारिणम् ॥२७६॥ प्रजपेदयुतं शत्रुमुच्चाटयति तत्क्षणात् । आत्मानं कंसमथनं ध्यायन्मंचान्निपातितम् ॥२७७॥ कंसात्मानं व्यकर्षन्तं गतासुं तं जपेन्मनुम । रिपुजन्मर्क्षवृक्षोत्थसमिद्भिर्मरयुतं निशि ॥२७८॥ जुहुयादेवमुग्रोऽपि सपत्नो निधनं व्रजेत् । अथवा निबंतैलाक्तैहुनेवेधोभिरक्षजैः ॥२७९॥ अयुतं नियतो रात्रौ मारयेदचिराद्वरीन् । निशाविष्टदलव्योषकार्पासास्थिकरैर्निशि ॥२८०॥ हुनेवेरंडतैलाक्तैः श्मशाने रिपुशांतये । न शस्तं मारणं कर्म कुर्याच्चेदेयुतं हुनेत् ॥२८१॥ पायसैर्वा हुनेत्तावच्छांतये शांतमानसः । पारिजातहरं कृष्णं ध्यायन् लक्षं जपेन्मनुम् ॥२८२॥ सर्वत्रैव जयस्तस्य न कदापि पराजयः । व्याख्यामुद्राकरं कृष्णं रथस्थं भावयज्जपेत् ॥२८३॥ पार्थे दिशंतं गीतार्थं धर्मवृद्धं सुमानवः । पालाशपुष्पमध्वक्तैलक्षं विद्याप्तये हुनेत् ॥२८४॥ राष्ट्रपूर्ग्रामवस्तूनां शरीरस्यापि रक्षणे । विश्वरूपधरं प्रोद्यद्भानुकोटिसमप्रभम् ॥२८५॥ अग्नीषोमात्मकं कृष्णं द्रुतचामीकरप्रभम् । अर्कानिद्योतितास्यांघ्रिपंकजं दिव्यभूषणम् ॥२८६॥ नानायुधधरं प्राप्तं विश्वाकाशावकाशकम् । ध्यात्वा लक्षं जपेन्मन्त्रं रक्षणाय समाहितः ॥२८७॥ रक्तैर्वन्यप्रसूनैर्यो दिनादौ पूजयेद्धरिम् । दिनमध्योक्तविधिना जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥२८८॥ सहस्रमंडलामन्त्री वशयेन्मुखरान्द्विजान् । जातिपुष्पैः क्षत्रियांश्च गोपवेषधरं स्मरन् ॥२८९॥ जप करना चाहिये। ऐसा करने से सात ही दिनों के भीतर शत्रुओं का उच्चाटन हो जाता है। कपित्थ (कैथ) का फल तोड़नेवाले तथा वत्सासुर को ऊपर उठा कर फेंकनेवाले कृष्ण का ध्यान कर दस हजार मन्त्र जपते से तत्क्षण शत्रु का उच्चाटन हो जाता है। मंच पर से कंस को गिरा कर घसीटते-घसीटते निष्प्राण कर देने वाले हरि का ध्यान कर शत्रु के जन्मक्षत्र में लगाये गये वृक्ष की समिधाओं से रात्रि में दस हजार हवन करने से भयंकर शत्रु भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। अथवा नीम का तेल मिलाकर बहेड़े की लकड़ी से रात्रि में नियम पूर्वक दश हजार होम करने से शत्रु शीघ्र यमलोक को चला जाता है ॥२७४-२८०॥ यदि शत्रु को मारना हो तो रात्रि में श्मशान जाकर दक्षिणदिशावस्थित अग्नि में रेंडी के तेल में भिगोई हुई कपास की लकड़ियों से दश सहस्र हवन करे। यदि मारण कर्म को दोषावह समझे तो दोषशान्ति के लिये स्वस्थचित्त हो कर खीर से दश हजार हवन कर देना चाहिये। जो व्यक्ति कल्पवृक्ष हरण करने वाले कृष्ण का ध्यान तथा मंत्र जप करता है उसका कभी पराजय नहीं होता ॥२८१-२८२॥ व्याख्या मुद्रा लगाये रथ पर आसीन होकर धर्मवृद्धार्थ अर्जुन को गीता का उपदेश करते हुए कृष्ण का ध्यान कर मधुयुक्त पलाश-कुसुमों से एक लाख हवन करने वाला व्यक्ति विद्या प्राप्त करता है। राष्ट्र, नगर, ग्राम, वस्तु तथा शरीर की रक्षा चाहने वाला व्यक्ति कृष्ण के इस रूप का ध्यान करे कि वे विश्व का रूप धारण करने वाले हैं। उदित होते हुए करोड़ों सूर्य के समान उनकी कान्ति है। अग्नि और सोम उनका रूप है। तपे सोने के सदृश वे चमक रहे हैं। उनके मुख तथा चरणारविन्द भानु तथा अग्नि के समान प्रकाशमान हैं। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों को धारण किये हुए हैं तथा निखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं। इस तरह ध्यान कर समाहित चित्त से एक लाख मंत्र जप करे। जो व्यक्ति प्रातःकाल वन्य रक्तपुष्पों से हरि का पूजन कर मध्याह्न में पूर्वोक्त विधि से एक सौ आठ बार मंत्र का जप करता है, वह सहस्रों वाचाल द्विजों को वशीभूत कर लेता है। गोपवेशधारी कृष्ण का ध्यान कर जूही के फूलों से होम करने से क्षत्रिय वश्य ६२ ना० पु०
७३० नारदीयपुराणम् ध्यायन् क्रीडारतं कृष्णं रक्तैरश्वारिपुष्पकैः । वशयेद्वैश्यजातीयान् शूद्रान्नीलोत्पलैः स्मरन् ॥२८०॥ गीतनृत्यरतं श्वेतपुष्पैः साज्यैश्च तंडुलैः । हुत्वान्वहं सप्तदिनं भस्म भाले च मूर्द्धनि ॥२८१॥ धारयन्वशयेत्कांतांसापि तद्वत्पतिं ध्रुवम् । तांबूलं कुसुमं वासोंऽजनं चंदनमेव च ॥२८२॥ सहस्रं मनुना जप्तं दद्याद्यस्मै नराय च । सोऽचिरादेव वशगः सपुत्रपशुबांधवः ॥२८३॥ वृन्दावनस्थितं ध्यायन्बल्लवीसयुतं हरिम् । अपामार्गसमिद्भिस्तु हुत्वा तु वशयेज्जगत् ॥२८४॥ संप्राप्य सद्गुरोर्दीक्षां कृष्णं यो विधिनामुना । अर्चयेद्वैष्णवश्रेष्ठः सोऽष्टसिद्धीश्वरो भवेत् ॥२८५॥ तस्य दर्शनमात्रेण वादिनो निष्प्रभाः स्मृताः । वसेत्सरस्वती वक्त्रे गृहे चापि सभासदः ॥२८६॥ भुक्त्वा नानाविधान्भोगानंते विष्णुपदं व्रजेत् ॥२८७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे तृतीयपादे कृष्णमन्त्रनिरूपणं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
होते हैं ॥२८३-२८९॥ क्रीडासक्त कृष्ण का ध्यान कर लाल करवीर के फूलों से हवन करने से वैश्य वश्य होते हैं। नृत्य-गीत करने में निरत कृष्ण का ध्यान कर नील कमलों से होम करने से शूद्र वश्य होते हैं। श्वेत पुष्प, घृत तथा तन्दुल से सात दिन हवन कर भस्म को ललाट एवम् मस्तक पर धारण करने से पत्नी वशीभूत होती है। पत्नी यदि ऐसा करे तो पति उसके वश्य होता है इसमें संशय नहीं। तांबूल, कुसुम, वस्त्र, अंजन तथा चन्दन को कृष्णमन्त्र से सहस्रबार अभिमन्त्रित कर जिसको दिया जायेगा, वह पुत्र, पशु तथा इष्ट-मित्रों समेत तुरन्त उस (देने वाले) के वशीभूत हो जायगा ॥२९०-२९३॥ वृन्दावन में गोपियों के साथ अवस्थित हरि का ध्यान कर अपामार्ग (चिचिड़े) से हवन करनेवाला व्यक्ति तीनों लोक को वश में कर लेता है। जो वैष्णवश्रेष्ठ सद्गुरु से कृष्णमन्त्र की दीक्षा लेकर उस विधि से अर्चना करता है, वह अष्ट सिद्धियों का ईश्वर होता है। उसके देखते ही वादी निष्प्रभ हो जाता है। सभाभवन में भी सरस्वती उसके मुख में विराजती है। वह ऐहलोकिक विविध भोगों को भोग कर अन्त में विष्णुलोक को जाता है ॥२६४-२६७॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध के तृतीयपाद में कृष्णमंत्रनिरूपण नामक अस्सीवां अध्याय समाप्त ॥८०॥
एकाशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ कृष्णस्य मंत्राणां वक्ष्ये भेदान् मुनीश्वर । यान्समाराध्य मनुजाः साधयंतीष्टमात्मनः ॥१॥ शक्तिश्रीमारापूर्वश्च श्रीशक्तिस्मरपूर्वकः । मारशक्तिरमापूर्वा दशाणर्णा मनवस्त्रयः ॥२॥ मुनिः स्यान्नारदश्छन्दो गायत्री देवता पुनः । कृष्णो गोविंदनामात्र सर्वकामप्रदो नृणाम् ॥३॥ चक्रैः पूर्ववदंगानि त्रयाणामपि कल्पयेत् । ततः किरीटमनुना व्यापकं हि समाचरेत् ॥४॥ सुदर्शनस्य मनुना कुर्याद्दिग्बंधनं तथा । विंशत्यर्णोक्तवत्कुर्यादाद्ये ध्यानाचनादिकम् ॥५॥ द्वितीये तु दशाणोक्तं ध्यानपूजादिकं चरेत् । तृतीये तु हरि ध्यायेत्समाहितमनाः सुधीः ॥६॥ शंखचक्रधनुर्बाणपाशांकुशधरारुणम् । दोर्भ्यां धृतं धमंतं च वेणुं कृष्णदिवाकरम् ॥७॥
अध्याय ८१ कामना-भेद से कृष्ण-मंत्रों का भेद-निरूपण श्री सनत्कुमार बोले-मुनिवर्य ! अब मैं कृष्णमंत्रों का भेद बतलाऊँगा, जिनकी आराधना करने से मनुष्यों की इष्टसिद्धि होती है। दशाक्षर मंत्र के तीन नूतन भेद हैं- 'ह्रीं श्रीं क्लीं' इन तीन बीजों के साथ 'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह प्रथम भेद है। 'श्रीं ह्रीं क्लीं' इस क्रम से बीज जोड़ने पर दूसरा भेद होता है। 'क्लीं ह्रीं श्रीं' इस क्रम से बीज मन्त्र जोड़ने पर तीसरा भेद बनता है। इनके मुनि नारद, छंद गायत्री और देवता मनुष्यों की समस्त कामनाओं को सफल करनेवाले गोविन्द कृष्ण हैं। तीनों मन्त्रों का चक्रों से पूर्ववत् अंगन्यास करके किरीट मन्त्र से व्यापक न्यास करे । पश्चात् सुदर्शन मन्त्र से दिग्बन्ध करके पहिले मन्त्र में बीस अक्षरों वाले मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे । दूसरे मन्त्र में दशाक्षर मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे ॥१-५॥ तीसरे मन्त्र में समाहित चित्त से कृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे हाथों में शंख, चक्र, धनुष, बाण, पाश तथा अंकुश धारण किये हुए हैं। इससे उनका हाथ रक्तवर्ण का मालूम पड़ता है। फिर वे हाथों में वंशी लेकर बजा रहे हैं। इससे उनका हाथ कृष्ण एवम् श्वेत रंग का भी दिखाई देता है। ऐसा ध्यान कर पांच लाख मन्त्रों का जप करे और उसका दशांश घी एवम् खीर से हवन करे । मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक पहिले की तरह सकाम कर्मों को कर सकता है। "ह्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय स्वाहा" यह बारह अक्षरों का मन्त्र है । इसके ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छंद और श्रीकृष्ण देवता हैं । पृथक्-पृथक् तीन बीजों तथा तीन, चार एवं दो मन्त्रा- क्षरों से षडङ्गन्यास करे । बीस अक्षरवाले मन्त्र की भाँति इसके भी ध्यान, होम और पूजन आदि करने चाहिए। यह मन्त्र संपूर्ण अभीष्ट फलों को देने वाला है। दशाक्षर मन्त्र (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) के आदि में श्रीं ह्रीं क्लीं तथा अन्त में क्लीं ह्रीं श्रीं जोड़ने से षोडशाक्षर मन्त्र बनता है। इसी प्रकार केवल आदि में ह्रीं श्रीं जोड़ने से बारह अक्षरों का मन्त्र होता है। पूर्वोक्त चक्रों द्वारा अंगन्यास करे, फिर भगवान् का इस प्रकार ध्यान करे कि वे अपने वर तथा अभय देने वाले दो हाथों से अपने प्रिय अंगों का स्पर्श कर रहे हैं और पद्म तथा उत्पल के