बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७२२ नारदीयपुराणम् फुल्लप्रफुल्लसच्चित्रवितानालंबिमौक्तिकै । पद्मरागस्थलीराद्रत्नसंघैश्च मध्यतः ॥१७६॥ अनारतगलद्रत्नधाराढ्यस्वस्तरोधः । रत्नप्रदीपावलिभिः प्रदीपितदिगंतरे ॥१७७॥ उद्यदादित्यसंकाशमणिसिंहासनांबुजे । समासीनोऽच्युतो ध्येयो द्रुतहाटकसन्निभः ॥१७८॥ समानोदितचंद्राकतडित्कोटिसमद्युतिः । सर्वांगसुंदरः सौम्यः सर्वाभरणभूषितः ॥१७९॥ पीतवासाः शंखचक्रगदांभोजलसत्करः । अनाहतोच्छलद्रत्नधारौघकलशं स्पृशन् ॥१८०॥ वामपादांबुजाग्रेण मुष्णता पल्लवच्छविम् । रुक्मिणीसत्यभामेऽस्य मूर्ध्नि रत्नोघधारया ॥१८१॥ सिंचंत्यौ दक्षवामस्थे स्वदोस्थकलशोत्थया । नाग्नजिती सुनंदा च दिशंत्यौ कलशौ तयोः ॥१८२॥ ताभ्यां च दक्षवामस्थमित्रविंदासुलक्ष्मणे । रत्ननद्याः समुद्धृत्य रत्नपूर्णौ घटौ तयोः ॥१८३॥ जांबवती सुशीला च दिशंत्यौ दक्षवामके । बहिः षोडश साहस्त्रसंख्याकाः परितः प्रियाः ॥१८४॥ ध्येयाः कनक रत्नोघधारायुक्तकलशोज्ज्वलाः । तद्बहिश्चाष्टनिधयः पूरयंतो धनैर्धराम् ॥१८५॥ तद्बहिर्वृष्णयः सर्वे पुरोवच्च स्वरादयः । एवं ध्यात्वा जपेलक्षपंचकं तद्दशांशतः ॥१८६॥ अरुणैः कमलैर्हुत्वा पीठे पूर्वोदिते यजेत् । विलिप्य गंधपंकेन लिखेद्दष्टदलांबुजम् ॥१८७॥ कर्णिकायां च षट्कोणं साध्यं तत्र मन्मथम् । शिष्टैस्तु सप्तदशभिरक्षरैर्वेष्टयेत्स्वरम् ॥१८८॥ प्राग्रक्षोऽनीलकोणेषु श्रियं शिष्टेषु संविदम् । षट्सु संधिषु षट्कर्णे केसरेषु त्रिंशस्त्रिशः ॥१८९॥ विलिखेत्स्मरणायत्रीं मालामंत्रं दलाष्टके । षट्शः संलिख्य तद्बाह्ये वेष्टयेन्मातृकाक्षरैः ॥१९०॥ तथा बहुमूल्य रत्नों का काम इस तरह किया हुआ है कि देखते ही बनता है । वहीं कल्पवृक्ष के नीचे सतत प्रल- वित होनेवाले रत्नों से मानों धारायें निकल रही हैं । रत्नों की बनी दीपावलियां दिग्-दिगन्त को प्रकाशित कर रही हैं, उसी मण्डप में उदित होते हुए आदित्य के समान मणिमय सिंहासनकमल पर संतप्त सुवर्ण के सदृश कांतिवाले केशव समासीन हैं । उनकी द्युति एक काल में उदित होते हुए करोड़ों सूर्य, चन्द्र तथा विद्युत् के समान है । वे सर्वाङ्गसुन्दर, सौम्य तथा समस्त आभूषणों से आभूषित हैं । पीताम्बर पहने हुए हैं। हाथों में शंख, चक्र, गदा एवम् पद्म धारण किये हैं। और एक ऐसे कलश को उठाये हैं, जो बिना टकराये ही रत्नों की धारा बहा रहा है ।। १७६-१८०।। उनके बाँयें पैर का नाखून नवकिसलय की छवि को लज्जित कर रहा है । उनके बाँयें तथा दाहिने भाग में रुक्मिणी तथा सत्यभामा खड़ी होकर अपने हाथों में दिव्य कलश ले उनसे निकलती हुई रत्नराशिमयी धाराओं से उन (श्री कृष्ण) के मस्तक पर अभिषेक कर रही हैं । नाग्नजिती और सुनन्दा उन दोनों को कलश पकड़ा रही हैं । मित्रविन्दा और सुलक्ष्मणा रत्ननदी से रत्न ले-ले कर कलशों को भर रही हैं। उनके दाहिने और बाँयें भाग में जांबवती तथा सुशीला और चतुर्दिक्षु सोलह हजार स्त्रियां सुवर्ण एवम् रत्नों की धारा बहानेवाले शुक्ल कलश धारण किये खड़ी हैं । उनके पीछे आठों निधियां धन से धरा को परिपूर्ण कर रही हैं ।।१८१-१८५।। निधियों के पीछे समस्त वृष्णिवंशी उपस्थित हैं। इस प्रकार ध्यान कर पाँच लाख मंत्र का जप करे और उसका दशांश लाल कमल से पूर्वोक्त पीठ पर हवन करे । तदनन्तर अष्टगंध से अष्टदलकमल लिखे जिसकी कर्णिका पर षट्कोण, साध्यनाम तथा क्लीं लिख कर मन्त्र के सत्रह अक्षरों से स्वर को वेष्टित करे । पूर्व, नैर्ऋत्य तथा वायव्यकोण में श्री, अवशिष्ट कोणों में संवित्, छः संधियों, षट्कर्ण तथा केसरों के ऊपर तीस तीस प्रणव लिख कर अष्ट दल पर काम गायत्री तथा मालामंत्र को लिखे। उसे मातृकाक्षरों से वेष्टित कर