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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 740, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 740

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यान्तरण है:

अशीतितमोऽध्यायः ७२१ आभ्यामष्टादशलिपिः स्याद्विंशत्यक्षरो मनुः । शालग्रामे मणौ यंत्रे मंडले प्रतिमासु वा ॥१६०॥ नित्यं पूजा हरेः कार्या न तु केवलभूतले । एवं यो भजते कृष्णं स याति परमां गतिम् ॥१६१॥ विशाणंशय मुनिर्ब्रह्मा गायत्री छन्द ईरितम् । कृष्णश्च देवता कामो बीजं शक्तिर्द्विठो बुधैः ॥१६२॥ रामाग्निवेदवेदाब्दैर्नेत्रार्णैरंगकल्पनम् । मूलेन व्यापकं कृत्वा मनुना पुटितानथ ॥१६३॥ मातृकार्णान्न्यसेत्तत्तत्स्थानेषु सुसमाहितः । दशतत्त्वानि विन्यस्य मूलेन व्यापकं चरेत् ॥१६४॥ मंत्रन्यासं ततः कुर्याद्देवताभावसिद्धये । शीर्षे ललाटे भ्रूमध्ये नेत्रयोः कर्णयोस्तथा ॥१६५॥ नसोर्वक्त्रे च चिबुके कण्ठे दोर्मूलके हृदि । उदरे नाभिदेशे च लिंगे मूलसरोरुहे ॥१६५॥ कट्यां जान्वोर्जंघयोश्च गुल्फयोः पादयोः क्रमात् । न्यसेद्गदंतान्मंत्राणां सृष्टिन्यासोऽयमीरितः ॥१६७॥ हृदये चोदरे नाभौ लिंगे मूलसरोरुहे । कट्यां जान्वोर्जंघयोश्च गुल्फयोः पादयोस्तथा ॥१६८॥ मूर्ध्नि कपोले भ्रूमध्ये नेत्रयोः कर्णयोर्नसोः । वदने चिबुके कंठे दोर्मूले विन्यसेत्क्रमात् ॥१६६॥ नमोऽन्तान्मंत्रवर्णांश्च स्थितिन्यासोऽयमीरितः । पादयोर्गुल्फयोश्चैव जंघयोर्जानुनोस्तथा ॥१७०॥ कट्यां मूले ध्वजे नाभौ जठरे हृदये पुनः । दोर्मूले कंठदेशे च चिबुके वदने नसोः ॥१७१॥ कर्णयोर्नेत्रयोश्चैव भ्रूमध्ये निटिले तथा । मूर्ध्नि न्यसेन्मंत्रवर्णान्संहाराह्वयोऽयमीरितः ॥१७२॥ पुनः सृष्टिस्थितिन्यासौ विधाय वैष्णवोत्तमः । मूर्तिपंजरनामानं विन्यसेत्पूर्ववत्ततः ॥१७३॥ पुनः षडंगं कृत्वाथ ध्यायेत्कृष्णं हृदंबुजे । द्वारवत्यां सहस्रार्कभास्वरैर्भवनोत्तमैः ॥१७४॥ अनल्पैः कल्पवृक्षैश्च परीते मणिमण्डपे । ज्वलद्रत्नमयस्तं भद्वारतोरणकुड्यके ॥१७५॥


(२), शान्ति (ईं) और इन्दु (अनुस्वार) से युक्त हो तो श्रीबीज—'श्रीं' कहा गया है। इन दोनों बीजों से युक्त होने पर अष्टादशाक्षर मन्त्र (ह्रीं श्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) बीस अक्षरों का हो जाता है । हरि की नित्य पूजा शालग्राम, मणि, यंत्र, मंडल तथा प्रतिमाओं में करनी चाहिये, केवल भूमि पर न करे । उक्त प्रकार से कृष्ण की आराधना करने वाला व्यक्ति उत्तम गति को प्राप्त करता है । उक्त बीस अक्षर वाले मंत्र का ऋषि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता कृष्ण; बीज क्लीं और शक्ति स्वाहा है। मन्त्र के बीस अक्षरों से अङ्गन्यास करना चाहिये। मन्त्रसंपुटित मूल से व्यापकन्यास कर देवभाव की सिद्धि के लिये मन्त्रन्यास भी करे । शिर, ललाट, भ्रू मध्य, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, ठुड्डी, कंठ, बाहुमूल, हृदय, उदर, नाभि, लिंग, मूलाधार पद्म, कटि, जानु, ऊरु, जंघा, गुल्फ तथा चरणों में 'नमः' पर्यन्त मन्त्राक्षरों का क्रमशः न्यास करे । इसका नाम सृष्टिन्यास है । १५८-१६७।। हृदय, उदर, नाभि, लिंग, मूलाधारपद्म, कटि, जानु, ऊरु, जंघा, गुल्फ, चरण, मस्तक, कपोल, भ्रू मध्य, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, ठुड्डी, कंठ तथा बाहुमूल, में 'नमः' पर्यन्त मन्त्रवर्णों का क्रमशः न्यास करना स्थितिन्यास कहलाता है। चरण, गुल्फ, जंघा, जानु, कटि, मूलाधार, लिंग, नाभि, उदर, हृदय, बाहुमूल, कंठ, ठुड्डी, वदन, नासिका, कर्ण, नेत्र, भ्रू मध्य ललाट तथा मस्तक में मंत्रवर्णों का न्यास करना संहारन्यास कहलाता है। उत्तम वैष्णव को इन न्यासों के कर लेने के बाद पुनः सृष्टिन्यास तथा स्थितिन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् मूर्तिपंजरन्यास एवम् षडंगन्यास करके अपने हृदयारविन्द में श्रीकृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि द्वारका में सहस्र दिनकरों के समान चमकनेवाले कतिपय उत्तम भवनों तथा कल्पवृक्षों से वेष्टित एक मणिमय मंडप है, जिसके स्तंभ, द्वार, तोरण तथा कुड्य जाज्वल्यमान रत्नों के बने हैं। उस मण्डप में तरह-तरह के चित्र लिखे हैं। उसमें टंगे वितान से मोतियां लटक रही हैं ॥१६८-१७५॥ उसके मध्य में पद्मरागमणि

६१ ना० पु०