सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 739, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 739

७२० नारदीयपुराणम् सायाह्नोक्तेन विधिना संपूज्य हवनं पुनः । कृत्वा पूर्वोक्तविधिना मंत्री तद्गतमानसः ॥१५३॥ एवं यो भजते नित्यं विद्वान् गोपालनंदनम् । समुत्तीर्य भवांभोधिं स याति परमं पदम् ॥१५४॥ मध्ये कोणेषु वाह्येऽध्वनलपुरपुटस्यालिखेत्कर्णिकायां कंदर्प साध्ययुक्तं विवरगतषडर्णद्विशः केशरेषु । शक्तिः श्रीपूर्विकाणि द्विनवलिपिमनेारक्षराणिच्छदानां मध्ये वर्णान्दशान्तो दशलिपिमनुवर्यस्य वैकैकशोऽब्जम् ॥१५५॥ भूसद्मनाभिवृतमलग्मन्मथेन गोरोचनाविलिखितं तपनीयसूच्या । पट्टे हिरण्यरचिते गुलिकीकृतं तद्गोपालयंत्रमखिलार्थदमेतदुक्तम् ॥१५६॥ संपातसिक्तमभिजप्तमिमं महद्धिमर्धायं जगत्त्रयवशीकरणैकदक्षम् । रक्षायशः सुतमहीधनधान्यलक्ष्मी सौभाग्यलिप्सुभिरजस्रमनर्ध्यवीर्यम् ॥१५७॥ स्मरस्त्रिविक्रमाक्रांतश्चाक्रीष्टचाय हृदिष्यसो । षडक्षरोऽयं संप्रोक्तः सर्वसिद्धिकरो मनुः ॥१५८॥ क्रोडः शान्तो॑ऽवुवह्नयाढ्यो मायाबीजं प्रकीर्तितम् । गोविद्वह्रिचन्द्राढ्यो मनुः श्रीबीजमीरितम् ॥१५९॥


आठ बार दूध वाले वृक्षों (आम, पीपल आदि) की समिधाओं से या घी, मधु तथा चीनी सहित पायस से हवन करे । इस तरह प्रतिदिन अपने हृदयारविन्द में लोकों के अधिपति तथा आराध्य कृष्णदेव का ध्यान करते हुए तीन हजार मंत्र का जप करना चाहिये । साधक उन्ही में अपने मन को लगा कर सायंकालीन विधि के अनुसार पूजन तथा हवन भी करे । जो विद्वान् इस प्रकार नित्य गोपालनंदन की आराधना करते हैं, वे संसारसागर से पार होकर विष्णुलोक को जाते हैं ॥१४९-१५४॥ पहले दो त्रिभुज अंकित करे, जिसमें एक ऊर्ध्वमुख ओर दूसरा अधोमुख हो । एक के ऊपर दूसरा त्रिकोण होना चाहिए। इस प्रकार छह कोण हो जाएँगे । कोण बाह्य भाग में होंगे । उनके बीच में जो षट्कोण चक्र होगा, उसे अग्निपुर कहते हैं । उस अग्निपुर की कर्णिका (मध्यभाग) में 'क्लीं' यह बीजमंत्र अंकित करे । उसके साथ साध्य पुरुष एवं कार्य का भी उल्लेख करे । बहिर्गत कोणों के विवर में षडक्षर मंत्र लिखे । छह कोणों के ऊपर एक गोलाकार रेखा खींचकर उसके बाह्यभाग में दशदल कमल अंकित करे । उन दश- दलों के केसरो में एक-एक में दो-दो अक्षर के क्रम से 'ह्रीं' और 'श्रीं' पूर्वक अष्टादशाक्षर मंत्र के अक्षरों का उल्लेख करे । तदनन्तर दलों के मध्य भाग में दशाक्षर मंत्र के एक-एक अक्षर को लिखे । इस प्रकार लिखे हुए दशदल चक्र को भूपुर (चौकोर रेखा) से आवृत करे । भूपुर में अस्त्रों के स्थान में कामबीज (क्लीं) का उल्लेख करे । इस यंत्र को सोने के पत्र पर सोने की ही शलाका से गोरोचन द्वारा लिखकर उसकी गुटिका बना ले । यही गोपाल यंत्र है । यह सम्पूर्ण मनोरथों को देने वाला कहा गया है । जो रक्षा, यश, पुत्र, पृथ्वी, धन-धान्य, लक्ष्मी और सौभाग्य के इच्छुक हों, उन श्रेष्ठ पुरुषों को निरन्तर यह यन्त्र धारण करना चाहिए। इसका अभि- षेक करके मंत्रजपपूर्वक इसे धारण करना उचित है। यह तीनों लोकों को वश में करने के लिए एकमात्र उपाय है । इसकी महती शक्ति अवर्णनीय है ॥१५५-१५७॥ स्मर (क्लीं), त्रिविक्रम (ऋ) युक्त चक्री (क्) अर्थात् कृ, इसके पश्चात् ष्णाय तथा हृत् (नमः) - यह (क्लीं कृष्णाय नमः) षडक्षर-मंत्र कहा गया है जो संपूर्ण मनोरथों को सिद्ध करने वाला है । वाराह (हृ.) अग्नि