बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 738, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशीतितमोऽध्यायः ७१६ जुहुयादयुतं मंत्री त्रिमध्वाक्तैर्हुताशने । वशयेद्ब्राह्मणांश्चाथ राजवृक्षसमुद्भवैः ॥१४२॥ प्रसूनैः क्षत्रियान्वैश्यान्कुरंडुकुसुमैस्तथा । पाटलोत्थैश्च कुसुमैर्वशयेदंतिमान्सुधीः ॥१४३॥ श्वेतपद्मै रक्तपद्मैश्चंपकैः पाटलैः क्रमात् । हुत्वायतं त्रिमध्वाक्तैर्वशयेत्तद्वरांगनाः ॥१४४॥ नित्यं हयारिकुसुमैर्निशीथे त्रिमधुप्लुतैः । वरस्त्रीर्वशयेत्प्राज्ञः सम्यग्धूत्वा दिनाष्टकम् ॥१४५॥ अयुतत्रितयं रात्रौ सिद्धार्थैस्त्रिमधुप्लुतैः । प्रत्यहं जुह्वतो मासात्सुरेशोऽपि वशीभवेत् ॥१४६॥ आहृत्य बल्लवीवस्त्राण्यारूढं नीपभूरुहे । स्मरेत्कृष्णं जपेद्रात्रौ सहस्रं खेदहात्सुधीः ॥१४७॥ हठादाकर्षयेच्छीघ्रममुर्वशीमपि साधकः । बहुना किमिहोक्तेन मंत्रोऽयं सर्ववश्यकृत् ॥१४८॥ रहस्यं परमं चाथ वश्ये मोक्षप्रदं नृणाम् । ध्यायेत्स्वहृत्सरसिजे देवकीनंदनं विभुम् ॥१४६॥ श्रीमत्कुन्देन्दुगौरं सरसिजनयनं शङ्खचक्रे गदाब्जे । बिभ्राणं हस्तपद्मैर्नवनलिनलसन्मालयादीप्य मानम् वंदे वेद्यं मुनींद्रैः कणिकमुलिसद्दिव्यभूषाभिरामं ॥१५०॥ दिव्यांगालेपभासं सकलभयहरं पीतवस्त्रं मुरारिम् एवं ध्यात्वा पुमांसं स्फुटहृदयसरोजासनासीनमाद्यं । सांद्रांभोदाच्छबिंबादद्भुतकनकनिभं संजपेदर्कलक्षम् मन्वोरेकं द्वितारांतरितमथ हुनेदर्कसाहस्रमिष्मैः ॥१५१॥ क्षीरिवृत्थैर्यथोक्तैः समधुघृतसितेनाथवा पायसेन एवं लोकेश्वरा Backyard आराध्यं कृष्णं स्वहृदयांबुजे । ध्यायन्ननुदिनं मंत्री त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् ॥१५२॥
राजवृक्ष की समिधा से हवन करने वाला साधक क्षत्रियों को वश में करता है । कुरंडवृक्ष के पुष्पों से होमने वाला वैश्यों को और पाटल के कुसुमों से हवन करने वाला शूद्रों को वश में कर लेता है । त्रिमधु मिला कर श्वेतपद्म रक्तपद्म तथा पाटल से होम करने से वेश्यायें वशीभूत होती हैं । नित्य आठ दिनों तक रात्रि में त्रिमधुयुक्त करवीर-कुसुमों से हवन करने वाला बुद्धिमान् व्यक्ति श्रेष्ठ वनिता को वश में कर लेता है । जो एक मास तक रात्रि में त्रिमधु मिला कर उजले सरसो से तीस हजार (बार) हवन करता है, उसके वश में इन्द्र भी हो जाते हैं । यदि चतुर साधक दश दिनों तक रात्रि में गोपियों के वस्त्र चुराकर कदम्ब वृक्ष के ऊपर चढ़ जाने वाले कृष्ण का ध्यान कर एक हजार कृष्णमन्त्र का जप करे तो वह उर्वशी को भी शीघ्र आकृष्ट कर सकता है । अधिक कहां तक कहें, उस मन्त्र के प्रभाव से मनुष्य सब को वश में कर सकता है ॥१४१-१४८॥ अब मैं मनुजों को मोक्ष देने वाला कृष्णरहस्य बतला रहा हूँ । पहले अपने हृदयकमल में देवकी- नन्दन विभु का इस तरह ध्यान करे कि वे कुन्दपुष्प तथा चंद्र के समान गौर हैं । कमल के सदृश उनके नेत्र हैं । करकमलों में शंख, चक्र, गदा पद्म धारण किये हैं, नवीन कमलपुष्पों की माला से उनके शरीर की आभा खिल रही है । बड़े-बड़े मुनि ही उन्हें जान पाते हैं । मणि-रत्नों के बने दिव्य रत्नों के बने दिव्य आभूषणों से वे विभूषित हैं । उनके दिव्य अंगों में चन्दन आदि का लेप लगा है । वे सकल- भयहारी, पीतवस्त्रधारी तथा मुर नामक दैत्य के विनाशक हैं । वे मेरे विकसित हृदयारविन्द रूपी आसन पर आसीन हैं । लोग आद्यपुरुष भी उन्हीं को कहते हैं । उनकी वर्णच्छटा सघनघन के समान है । कान्ति अद्भुत सुवर्ण तुल्य है । इस प्रकार आदिपुरुष का ध्यान कर बारह लाख मन्त्र जप करे और बारह हजार एक सौ