बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअपूपा मोदका लाजाः पृथुका नवनीतकम् । द्रव्यषोडशकं ह्येतत्कथितं पद्मजातिभिः ॥१२८॥ लाजांते पृथुकं प्राक्च समर्प्य च सितोपलम् । चतुःसप्ततिवारं यः प्रातरेवं प्रतर्पयेत् ॥१२९॥ ध्यात्वा कृष्णपदं मंत्री मंडलाविष्टमाप्नुयात् । धारोष्णपक्वपयसा नवनीतं दधीनि च ॥१३०॥ दोग्धान्नाज्यं मत्स्यंडी क्षौद्रं कीलालमेव च । पूजयेन्नवभिर्द्रव्यैः प्रत्येकं रविसंख्यया ॥१३१॥ एवमष्टोत्तरशतसंख्याकं तर्पणं पुनः । यः कुर्याद्वैष्णवश्रेष्ठः पूर्वोक्तं फलमाप्नुयात् ॥१३२॥ किं बहूक्तेन सर्वेष्टदायकं तर्पणं त्विदम् । ससितोपलधारोष्णदुग्धबुद्ध्या जलेन वै ॥१३३॥ कृष्णं प्रतर्पयन् ग्रामे व्रजन्नाप्नोति साधकः । धनवस्त्राणि भोज्यं च परिवारगणैः सह ॥१३४॥ यावत्संतर्पयेन्मंत्री तावत्संख्यं जपेन्मनुम् । तर्पणेनैव कार्याणि साधयेदखिलान्यपि ॥१३५॥ काम्यहोममथो वक्ष्ये साधकानां हिताय च । श्रीपुष्पैर्जुहुयान्मंत्री श्रियमिच्छन्ननिंदिताम् ॥१३६॥ साज्येनान्नेन जुहुयाद्घृतान्नस्य समृद्धये । वन्यपुष्पैर्द्विजान् जातीपुष्पैश्च पृथिवीपतीन् ॥१३७॥ असितैः कुसुमैर्वैश्यान् शूद्रान्नीलोत्पलैस्तथा । वशयेल्लवणैः सर्वानंबुजैर्युवतीजनम् ॥१३८॥ गोशालासु कृतो होमः पायसेन ससर्पिषा । गवां शांतिं करोत्याशु गोपालो गोकुलेश्वरः ॥१३९॥ शिक्षावेषधरं कृष्णं किंकिणीजालशोभितम् । ध्यात्वा प्रतर्पयेन्मंत्री दुग्धबुद्ध्या शुभैर्जलैः ॥१४०॥ धनं धान्यं सुतान्कीर्ति प्रीतस्तस्मै ददाति सः । ब्रह्मवृक्षसमिद्भिर्वा कुशैर्वा तिलतंडुलैः ॥१४१॥ लाजा (लावा) पृथुक (चिउरा) तथा नवनीत । इन्हीं सोलह द्रव्यों का नाम ब्रह्मा आदि (मुनियों) ने बताया है। इन द्रव्यों से तर्पण कर पश्चात् लाजा, पृथुक तथा शक्कर चढ़ाना चाहिये । जो व्यक्ति प्रातःकाल कृष्ण का ध्यान कर उक्त रीति से चौहत्तर बार तर्पण करता है उसे वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है ॥१२६-१२९१/२॥ धारोष्ण दूध, आग पर गर्म किया हुआ दूध, नवनीत, दही, छेना, घी, राब, मधु तथा जल—इन नौ द्रव्यों में प्रत्येक से बारह-बारह बार तर्पण करना चाहिए । जो वैष्णवश्रेष्ठ इस तरह एक सौ आठ बार तर्पण करता है, उसे पूर्वोक्त फल का लाभ होता है । इसके सम्बन्ध में बहुत क्या कहूँ ! यह (तर्पण) तो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जो व्यक्ति जल ही में धारोष्ण दूध तथा शक्कर की भावना कर उससे तर्पण करता है, उसे भी गांव, ब्रज (गोष्ठ) धन, वस्त्र, भोज्य तथा पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है । साधक जितने बार तर्पण करे उतने ही बार मंत्र का भी जप करे । इस तर्पण से सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥१३०-१३५॥ अब मैं साधकों के हित के लिये काम्य हवन का वर्णन करता हूँ । अतुल संपत्ति की कामना करने वाला साधक श्रीपुष्पों से होम करे। जो व्यक्ति घी तथा अन्नों की समृद्धि चाहता है, वह घृतमिश्रित अन्नों से हवन करे । वन्य पुष्पों से होमने वाला (साधक) द्विजों को, जातीपुष्पों से होमने वाला राजाओं को, कृष्ण पुष्पों से होमने वाला वैश्यों को, नीलकमलों से होमने वाला शूद्रों को, लवण से होमने वाला सबको और कमलों से होमने वाला युवतियों को वशीभूत करता है। गोशाला में खीर तथा घी से हवन करने से गोकुलेश्वर कृष्ण गौओं के अरिष्ट को शान्त कर देते हैं। जो साधक प्रातःकाल लोकशिक्षा के लिये अवतार धारण करने वाले, किंकिणियों से सुशोभित कृष्ण का ध्यान कर दुग्धबुद्ध्या पवित्र जल से तर्पण करता है, उसके ऊपर प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण धन, धान्य, पुत्र एवम् यश प्रदान करते हैं ॥१३६-१४०१/२॥ पलाश की समिधा या कुश या तिल-तंडुल में त्रिमधु मिला कर हवन करने से ब्राह्मण वशीभूत होते हैं।