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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 736

अशीतितमोऽध्यायः ७१७ एवं ध्यात्वार्चयेन्मन्त्री स्यादङ्गैः प्रथमावृतिः । श्रीकामः सस्वराद्यानि कलाब्जैर्वैष्णवोत्तमः ॥११४॥ यजेत्केशवकीर्त्यादिमिथुनानि च षोडश । इन्द्राद्यानपि वज्रादीन्पूजयेत्तदनन्तरम् ॥११५॥ पृथुं सुवृत्तं मसृणं वितस्तिमात्रोन्नतं कौ विनिखन्य शंकुम् । आक्रम्य पद्भ्यामितरेतरैस्तु हस्तैर्भ्रमोऽयं खलु रासगोष्ठी ॥११६॥ संपूज्यैवं च पयसा ससितो पलसर्पिषा । नैवेद्यमर्चयित्वा तु चषकैर्नृपसंख्यकैः ॥११७॥ ससितं पायसं मंत्री मिथुनेष्वर्पयेत्क्रमात् । विधाय पूर्ववच्छेषं सहस्रं प्रजपेन्मनुम् ॥११८॥ स्तुत्वा नत्वा च सम्प्रार्थ्य पूजाशेषं समापयेत् । एवं यः पूजयेत्कृष्णं स समृद्धेःपदं भवेत् ॥११९॥ अणिमाद्यष्टसिद्धीनामीश्वरः स्यान्न संशयः । भुक्त्वेह विविधन्भोगानंते विष्णुपदं व्रजेत् ॥१२०॥ एवं पूजादिभिः सिद्धे मन्तौ काम्यानि साधयेत् । अष्टाविंशतिवारं वा त्रिकालं पूजयेत्सुधीः ॥१२१॥ स्वकालविहितान् भूयः परिवारांश्च तर्पयेत् । प्रातर्दध्ना गुडाक्तेन मध्याह्ने पयसा पुनः ॥१२२॥ नवनीतयुतेनाथ सायाह्ने तर्पयेत्पुनः । ससितोपलमिश्रेण पयसा वैष्णवोत्तमः ॥१२३॥ तर्पयामिपदं योज्यं मंत्रांते स्वेषु नामसु । द्वितीयांतेषु तु पुनः पूजाशेषं समापयेत् ॥१२४॥ अभ्युक्ष्य तत्प्रसादाद्भिरमात्मानं प्रपिबेदपः । तत्तत्स्थमथोद्वास्य तन्मयः प्रजपेन्मनुम् ॥१२५॥ अथ द्रव्याणि काम्येषु प्रोच्यंते तर्पणेषु च । तानि प्रोक्तविधानानाश्रित्यान्यतमं भजेत् ॥१२६॥ पायसं दाधिकं चाज्यं गौडान्नं कृसरं पयः । दधीनि कदली मोचा चिंचा रजस्वला तथा ॥१२७॥ से दिव्य स्वरूप प्रकट कर लिये हैं । और उन स्वरूपों से प्रत्येक दो गोपियों के बीच में स्थित हैं ॥१०७-११३॥ इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक भगवान् की पूजा करे । हृदय आदि अंगों द्वारा प्रथम आवरण की पूजा होती है । धन-सम्पत्ति की इच्छा रखने वाला श्रेष्ठ वैष्णव पूर्वोक्त केशव-कीर्ति आदि सोलह जोड़ों की कमल पुष्पों द्वारा पूजा करे । उन सब के नाम के आदि में क्रमशः सोलह स्वरों को संयुक्त करे । तदनन्तर इन्द्र आदि दिक्पालों और वज्र आदि आयुधों की पूजा करे, एक मोटा, गोल और चिकना खूँटा जिसकी उँचाई एक बित्ते की हो, पृथ्वी में गाड़ दे और उसे पैरों से दबाकर एक दूसरे से हाथ मिलाकर उसके चारों ओर चक्कर देना रासगोष्ठी कही गई है । इस प्रकार पूजा करके दूध, घी और मिश्री मिलाकर भगवान् को नैवेद्य अर्पण करे और सोलह प्याले लेकर उनमें मिश्री मिलाई हुई खीर परोसे और पूर्वोक्त जोड़ों को क्रमशः अर्पण करे । फिर शेष कार्य पूर्ववत् करके मन्त्रोपासक एक हजार मन्त्र जप करे । तत्पश्चात् स्तुति, नमस्कार और प्रार्थना करके पूजन का शेष कार्य भी समाप्त करे । इस प्रकार जो उपासक श्रीकृष्ण की आराधना करता है, वह महासमृद्धिशाली होता है । अणिमा आदि सिद्धियां उसकी अनुगत हो जाती हैं, इसमें संशय नहीं । वह ऐहलोकिक सकल भोगों को भोग कर अन्त में विष्णुपद को प्राप्त करता है ॥११४-१२०॥ इस तरह पूजा आदि से सिद्धि प्राप्त कर लेने पर मनुष्य काम्य तर्पर्णों का साधन करे । जैसे विद्वान् व्यक्ति (एक ही समय) अट्ठाईस बार या तीनों काल कृष्ण की पूजा कर अंग देवता सहित उनका तर्पण करें । प्रातःकाल गुड़ मिश्रित दही से, मध्याह्न में दूध से और सायंकाल मक्खन से तर्पण करना चाहिये । (अन्य काल) उत्तम वैष्णव शक्कर मिलाये दूध से तर्पण करे । मन्त्र के अन्त में अपने नाम के साथ 'तर्पयामि' इस पद को जोड़ देना चाहिये । पूजा समाप्ति के बाद तर्पणीय जल से अपने को सिक्त कर वह जल पी ले अनन्तर मन्त्र का जप करे ॥१२१-१२५॥ काम्य तर्पण करने के लिये जिन द्रव्यों की आवश्यकता होती है, वे खीर, दहीवड़ा, घी, गुड़ में पकाया अन्न, खिचड़ी, दूध, दही, केला, (मोचा), सहिजन, चिंचा (इमली), चीनी, पूआ, लड्डू,