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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 735, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 735

७१६ नारदीयपुराणम् पूजासु होमं सर्वासु कुर्यान्मध्यांदिनेऽथवा । आसनादर्घ्यपर्यन्तं कृत्वा स्तुत्वा नमेत्सुधीः ॥१०४॥ समर्थ्यात्मानबुद्धास्य स्वीयहृत्सरसीरुहे । विन्यस्य तन्मयो भूत्वा पुनरात्मानमर्चयेत् ॥१०५॥ सायाह्ने वासुदेवं यो नित्यमेवं समर्चयेत् । सर्वान्कामानवाप्यांते सा याति परमां गतिम् ॥१०६॥ रात्रौ चेन्मदनाक्रांतचेतसं नन्दनन्दनम् । यजेद्रासपरिश्रांतं गोपीमंडलमध्यगम् ॥१०७॥ विकसत्कुंदकह्लारमल्लिकाकुसुमोद्गतैः । रजोभिर्धूसरैर्मंदमारुतैः शिशिरीकृते ॥१०८॥ उन्मीलन्नवकैरवालिविगलन्माध्वीकलव्धांतरं भ्राम्यन्मत्तमिलद्गीतललिते सन्मल्लिकोज्जृम्भिते । पीयूषांशुक रैर्विशालितहरित्प्रांते स्मरोद्दीपने कालिन्दीतुलिनांगणे स्मितमुखं वेणुंरणंतं मुहुः ॥१०८॥ अन्तस्तोयलसन्नवांबुदघटासंघट्टकारत्विषं चंचच्चिल्लिकमंबुजावतदृशं बिम्बाधरं सुन्दरम् । मायूरच्छदबद्धमौलिविलसद्धम्मिल्लमालं चलं दीप्यत्कुण्डलरत्नरश्मिविलसद्गंडद्वयोद्भासितम् ॥११०॥ कांचीनूपुरहारकंकणलसत्केयूरभूषान्वितं गोपीनां द्वितयांतरे सुललितं वन्यप्रसूनस्रजम् । अन्योन्यं विनिबद्धगोपदियतादोर्वल्लिवीतं लसद्रासक्रीडनलोलुपं मनसिजाक्रांतं मुकुन्दं भजेत् ॥१११॥ विविधश्रुतिभिन्नमनोज्ञतरस्वरसप्तक मूच्छेनातानगणैः । भ्रममाणमभूमिहृदारमणस्फुटमंडनसिजितचारुतनूम् । ॥११२॥ इतरेतरबद्धकरप्रमदागणकल्पितरासविहारविधौ । मणिशंकुगमप्यमुना वपुषा बहुधा विहितस्वकदिव्यतनुम् ॥११३॥ सौ आठ बार मन्त्र को जपे । मध्याह्नकालीन पूजा अथवा सकल पूजाओं में हवन करना चाहिये । विद्वान् साधक आसन से लेकर अर्घ्य-दान पर्यन्त समस्त कर्म करके स्तुति एवम् नमस्कार करे । पुनः अपने हृदयारविन्द में समाहित चित्त से आत्मा का ध्यान करके अर्चना करे । जो व्यक्ति सायंकाल इस तरह वासुदेव की आराधना करता है वह सम्पूर्ण कामनाओं को सफल करके अन्त में परमगति को प्राप्त करता है ॥१००-१०६॥ रात्रि में नन्दनन्दन का इस प्रकार ध्यान करना चाहिये कि वे रासलीला करते-करते थक गये हैं। उनका चित्त काम से विह्वल है। वे गोपियों के बीच में चलते हैं तथा कालिन्दी के तट पर, जहाँ विकसित कुन्द, कह्लार, मल्लिका आदि कुसुमों के पराग से सुगंधित शीतल मन्द पवन बह रहा है, वे मन्द मुसकान के साथ वंशी बजा रहे हैं। उनकी कान्ति सजल घनघटा के समान है, बाल घुंघराले हैं। नेत्र कमलपत्र के सदृश दीर्घ हैं। अधर सुन्दर तथा बिम्बफल के समान हैं। मुकुट पर मयूर के पंख लगे हैं। संयत संवारे हुए बालों पर पुष्प- माला शोभित हो रही है। चंचल एवम् चमकते हुए रत्ननिर्मित कुण्डलों की रश्मि से कपोल उद्भासित हो रहे हैं। करधनी, नूपुर, हार, कंकण तथा केयूर आदि आभूषणों से सम्पूर्ण शरीर विभूषित है। वे गोपियों के मन को लुभा रहे हैं। वन्य पुष्पों की माला धारण किये हुए हैं। एक दूसरी से अपनी बाँहों को मिलाये हुए नृत्य करने वाली गोपांगनाओं की बाहुवल्लारियों से वे घिरे हुए हैं। इस प्रकार परम सुन्दर शोभामयी दिव्य रासलीला के लिए सदा उत्सुक रहने वाले प्रेम के आश्रयभूत भगवान् मुकुन्द का भजन करे। वे नाना प्रकार की श्रुतियों के भेद से युक्त परम मनोहर सात स्वरों की मूर्च्छना और तानों के साथ-साथ गोपाङ्गनाओं सहित थिरक रहे हैं। सुन्दर मणिमय स्वच्छ आभूषणों के मधुर शिंजन से भगवान् का सम्पूर्ण मनोहर अंग ही झनकारमय हो उठा है। एक दूसरी से हाथ बाँधकर मण्डलाकार खड़ी हुई गोपांगनाओं के समूह से कल्पित रासलीला मण्डल की रचना में यद्यपि भगवान् श्यामसुन्दर बीच में मणिमय मेरु की भाँति स्थित हैं तथापि इसी शरीर से उन्होंने अपने बहुत