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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 734

अशीतितमोऽध्यायः ७१५

देवाः सर्वे नमस्यंति लोकानां वल्लभो नरः । मेधायुः श्रीकांतियुक्तः पुत्रैः पौत्रैश्च वर्द्धते ॥८६॥ तृतीयकालपूजायामस्ति कालविकल्पना । सायाह्ने निशि वेत्यत्र वदंत्येके विपश्चितः ॥६०॥ दशाक्षरेण चेद्रात्रौ सायाह्नेऽष्टादशार्णतः । उभयीमुभयेनैव कुर्यादित्यपरे जगुः ॥६१॥ सायाह्ने द्वारवत्यां तु चित्रोद्यानोपशोभिते । अष्टसाहस्रसंख्यातैर्भवनैरुपमंडिते ॥६२॥ हंससारससंकीर्णकमलोत्पलशालिभिः । सरोभिर्निर्मलांभोभिः परीते भवनोत्तमे ॥६३॥ उद्यत्प्रद्योतनोद्योतद्युतौ श्रीमणिमंडले । हेमांभोजासनासीनं कृष्णं त्रैलोक्यमोहनम् ॥६४॥ मुनिवृंदैः परिवृतमात्मतत्त्वविनिर्णये । तेभ्यो मुनिभ्यः स्वं धाम दिशंतं परमक्षरम् ॥६५॥ उन्नित्रेदीवरश्यामं पद्मपन्नायतेक्षणम् । स्निग्धं कुंतलसंभिन्नकिरीटवनमालिनम् ॥६६॥ चारुप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरकुंडलंम् । श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं सुमनोहरम् ॥६७॥ काश्मीरकपिशोरस्कं पीतकौशेयवाससम् । हारकेयूरकटककटिसूत्रैरलंकृतम् ॥६८॥ हृतविश्वंभराभारिभारं मुदितमानसम् । शंखचक्रगदापद्मराजद्भुजचतुष्टयम् ॥६९॥ एवं ध्यात्वार्चयेन्मन्त्री स्यादंगैः प्रथमावृतिः । द्वितीया महिषीभिस्तु तृतीयायां समर्चयेत् ॥१००॥ नारदं पर्वतं जिष्णुं निशठोद्धवदारुकान् । विष्वक्सेनं च शैनेयं दिक्ष्वग्रे विनतासुतम् ॥१०१॥ लोकपालैश्च वज्राद्यैः पूजयेद्वैष्णवोत्तमः । एवं संपूज्य विधिवत्पायसं विनिवेदयेत् ॥१०२॥ तर्पयित्वा खंडमिश्रदुग्धबुद्ध्या जलेरिह । जपेदष्टशतं मन्त्री भावयन्पुरुषोत्तमम ॥१०३॥

भना करता है, वह मनुष्यों का अधिनायक तथा देववंद्य होता है । उसे श्री, मेधा, आयु, कान्ति तथा पुत्र-पौत्रों की प्राप्ति होती है ॥८६-८९॥ तीसरे काल की पूजा में समय का मतभेद है । कोई आचार्य कहते हैं कि सायंकाल पूजन होना चाहिये और कोई कहते हैं कि रात्रि में पूजन किया जाय । कोई कहते हैं कि रात्रि में दशाक्षरमन्त्र से और सन्ध्याकाल में अष्टाक्षर मन्त्र से पूजन किया जाय, तो कोई कहते हैं कि दोनों समय दोनों मन्त्रों से पूजन करना चाहिए । सायंकाल इस प्रकार ध्यान करे कि द्वारका के आनन्द बाग में आठ हजार भवन विद्यमान हैं । वहां सरोवरों के विमल जल में कुमुद आदि पुष्प खिले हुए हैं । हंस, सारस आदि पक्षी कलरव कर रहे हैं और एक श्रीमणि- मंडित सर्वोत्तम भवन विद्यमान है । उस भवन की कान्ति उदयकालीन सूर्यरश्मि के समान है । उसी में स्वर्ण कमलासन पर त्रैलोक्यमोहन मधुसूदन विराजमान हैं ॥६०-६४॥ वे आत्मतत्त्व के निर्णय करने के लिये मुनिगणों से परिवेष्टित हैं । उन मुनियों को परमाक्षर (ओं) रूप भगवान् अपने धाम की ओर संकेत कर रहे हैं । उनका श्यामवर्ण विकसित नील कमल के समान है । लम्बे नेत्र पद्मपत्र के सदृश हैं । केश कोमल हैं । वे मुकुट एवम् वनमाला धारण किये हुए हैं । उनका मुख प्रसन्न है । कुण्डल मकराकृति है । वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न तथा मनोहर कौस्तुभमणि सुशोभित हो रही है, जिससे उनकी छाती का रंग पुष्करमूल की तरह मटमैला प्रतीत होता है । वे पीत रेशमी वस्त्र पहने हुए हैं । उनका शरीर हार, केयूर, वलय तथा करधनी से अलंकृत है ॥६५-९८॥ वे पृथ्वी के अत्यन्त भार का व्यपहरण करनेवाले हैं । उनका चित्त प्रसन्न है और चारों भुजायें शंख, चक्र, गदा और पद्म से विभूषित हैं ॥६६॥ इस प्रकार ध्यान कर साधक प्रथम बार में अंग देवताओं के साथ पूजन करे । द्वितीय बार में राज- महिषियों के साथ और तृतीय बार में नारद, पर्वत, विष्णु, निशठ, उद्धव, दारुक, विष्वक्सेन, शैनेय तथा गरुड़ के साथ पूजन कर दिशाओं में वज्र आदि आयुधों समेत लोकपालों की अर्चना करे । पूजन के बाद पायस समर्पण कर जल को ही दूध-मिसरी समझते हुए उससे तर्पण करे । तदुपराग्त पुरुषोत्तम का स्मरण करते हुए एक

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