बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७१४ नारदीयपुराणम् समुद्धूसरोरस्थले धेनुधूल्या [सुपुष्टांगमष्टापदकल्पदीप्तम् । कटीलस्थले चारुजंघान्तयुग्मं पिनद्धं क्वणत्किंकिणीजालदाम्ना ॥७८॥ हसन्तं हसद्बन्धुजीवप्रसूनप्रभापाणिपादांबुजोदारकान्त्या । दधानं करे दक्षिण पायसान्न सुहैंयगवीनं तथा वामहस्ते ॥७९॥ लसद्गोपगोपीगवां वृन्दमध्ये स्थितं वासवाद्यैः सुरैरर्चितांघ्रिम् । महीभारभूतामरा रातियूथांस्ततः पूतनादीन्निहंतुं प्रवृत्तम् ॥८०॥ एवं ध्यात्वाचार्येद्देवं पूर्ववत्स्थिरमानसः । दध्ना गुडेन नैवेद्यं दत्वा दशशतं जपेत् ॥८१॥ मध्यंदिने यजेद्देवं विशिष्टरूपधारिणम् । नारदाद्यैर्मुनिगणैः सुरवृन्दैश्च पूजितम् ॥८२॥ लसद्गोपगोपीगवां वृन्दमध्यस्थितं सांद्रमेघप्रभं सुन्दरांगम् । शिखंडिच्छदापीडमब्जायताक्षं लसच्चिल्लिकं पूर्णचंद्राननं च ॥८३॥ चलत्कुण्डलोल्लासिगंडस्थलश्रीभरं सुन्दरम् मंदहासं सुनासम् । सुकात्तंस्वराभांबरं दिव्यभूषं क्वणत्किंकिणीजालमत्तानुलेपम् ॥८४॥ वेणुं धमंतं स्वकरे दधानं सव्ये दरं यष्टिमुदारवेषम् । दक्षे तथैवेप्सितदानदक्षं ध्यात्वार्चयेन्नंदजमन्दिराप्त्यै ॥८५॥ एवं ध्यात्वार्चयेत्कृष्णं पूर्ववद्वैष्णवोत्तमः । अपूपपायसान्नाद्यैनैवेद्यं परिकल्पयेत् ॥८६॥ हुत्वा चाष्टोत्तरशतं पयोऽन्नैः सर्पिषाप्लुतैः । स्वस्वदिक्षु बलिं दद्याद्दिशेदाचमनं ततः ॥८७॥ अष्टोत्तरसहस्रं च प्रजपेन्मंत्रमुत्तमम् । अह्नो मध्ये यजेद्देवं यः कृष्णं वैष्णवोत्तमः ॥८८॥ समान है। कमर में बँधी किंकिणियों की लड़े शब्द कर रही हैं ॥७५-७८॥ दोनों जंघायें अति मनोरम हैं। कर- कमलों तथा चरणाम्बुजों की प्रभा दुपहरिया फूल के समान हैं। वे दाहिने हाथ में पायस और बाँये हाथ में नवनीत (मक्खन) लिये हुए हैं। गोपों, गोपियों तथा गौओं के बीच स्थित होकर शोभा पा रहे हैं। इन्द्र आदि देवगण उनकी चरण वंदना कर रहे हैं। पृथ्वी पर भारस्वरूप दैत्यगण तथा पूतना आदि अरिष्टों को मारने के लिये वे उद्यत हैं ॥७९-८०॥ इस प्रकार ध्यान कर पहिले की तरह स्थिर चित्त से देव की अर्चना करे। दही-गुड़ का नैवेद्य चढ़ाकर मन्त्र का दस सहस्र जप करे । पुनः मध्याह्न कालीन पूजन के समय नारद आदि मुनिगण तथा सुरवृन्द से पूजित मुकुन्द के इस विशिष्ट रूप का ध्यान करे कि वे गोपों, गोपियों तथा गौओं के बीच स्थित होकर शोभित हो रहे हैं। उनकी कांति सघन घन के समान है। अंग सुदृढ़ एवम् सुडौल हैं। मुकुट मयूरपिच्छों से विभूषित है। नेत्र कमलदल के तुल्य हैं। बाल घुंघराले हैं। मुख पूर्णचन्द्र के सदृश है। चंचल कुण्डलों से गण्डस्थल की अपूर्व शोभा हो रही है। मन्द मुसकान आकर्षक है। नासिका सुन्दर है। वे स्वर्णिम आभामय वस्त्र तथा दिव्य आभूषण पहने हुए हैं। उनके शरीर में (चन्दन आदि का) लेप लगा है। किंकिणियों का शब्द हो रहा है। वे वंशी बजा रहे हैं। बाँये हाथ में यष्टि (लाठी) और दाहिने हाथ में अभिलषित दान देने का पात्र धारण किये हुए हैं। उनका वेश उदार है । लक्ष्मीप्राप्ति के लिये कृष्ण के इस रूप का ध्यान कर उत्तम विष्णुभक्त पूर्ववत् उनकी पूजा करे ॥८१-८५॥ पकवान, खीर आदि नैवेद्य चढ़ा कर एक सौ आठ बार घृतमिश्रित खीर से हवन करे। अनन्तर सब दिशाओं में बलि चढ़ाकर आचमन करे और अष्टोत्तरशत मन्त्र को जपे । जो वैष्णवश्रेष्ठ इस प्रकार मध्याह्न में कृष्ण की आरा-