बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअशीतितमोऽध्यायः ७१३ गोपान् गोपीश्च गोविन्द विलीनमतिलोचनान् । ज्ञानमुद्राभयकरौ पितरौ पीतपांडुरौ ॥६४॥ दिव्यमाल्यांबरालेपभूषणे मातरौ पुनः । धारयन्त्यौ चरुं चैव पायसों पूर्णपात्रिकाम् ॥६५॥ अरुणश्यामले हारमणिकुंडलमंड़िते । बलः शंखेंदुधवलॊ मुशलं लांगलं दधत् ॥६६॥ हालालोलो नीलवासा हलवानेककुंडलः । कला या श्यामला भद्रा सुभद्रा भद्रभूषणा ॥६७॥ वराभययुता पीतवसना रूढयौवना । वेणुवीणामहेमयष्टिशंखशृंगाग्निपाणयः ॥६८॥ गोपा गोप्यश्च विविधप्रामृतान्रकरांबुजाः । मंदारादींश्च तद्बाह्ये पूजयेत्कल्पपादपान् ॥६६॥ मंदारश्च तथा संतानको वै पारिजातकः । कल्पद्रुमस्ततः पश्चाद्धरिचन्दनसंज्ञकः ॥७०॥ मध्ये दिक्षु समभ्यर्च्य बहिः शक्रादिकान्यजेत् । तदस्त्राणि च संपूज्य यजेत्कृष्णाष्टकेन च ॥७१॥ कृष्णं च वासुदेवं च देवकीनन्दनं तथा । नारायणं यदुश्रेष्ठं वार्ष्णेयं धर्मपालकम् ॥ ७२॥ असुराक्रांतभूभारहारिणं पूजयेत्ततः । एभिरावरौः पूजा कर्तव्यासुरवैरिणः ॥७३॥ संसारसागरीत्तीर्यै सर्वकामाप्तये बुधैः । एवं पूजादिभिः सिद्धो भवेद्वैश्रवणो यमः ॥७४॥ त्रिकालपूजनं चास्य वक्ष्ये सर्वार्थसिद्धिदम् । श्रीमदुद्यानसंवीतिहेमभूरत्नमंडपे ॥७५॥ लसत्कल्पद्रुमाधस्थरत्नाब्जपीठसंस्थितम् । सुत्रामरत्नसंकाशं गुडस्निग्धालकं शिशुम् ॥७६॥ चलत्कनककु'डलोल्लसितचारुगंडस्थलं सुघोणधरमद्भुतस्मितमुखांबुजं सुन्दरम् । स्फुरद्विमलरत्नयुक्तकनकसूत्रनद्धं दधत्सुवर्णपरिमंडितं सुभगपोंडरीकं नखम् ॥७७॥ में आसक्त चित्त वाले गोप तथा गोपी, ज्ञानमुद्रा तथा अभयमुद्रा धारण करने वाले और पीत एवम् पांडुर वर्ण वाले पुनः माता-पिता दिव्यमाला, वस्त्र, लेप तथा आभूषणों से सुशोभित, हारों एवम् मणिकुण्डलों से अलंकृत, चरु तथा पायस-पूर्ण पात्र धारण करने वाली ओर रक्त तथा श्याम वर्ण वाली माताओं, शंख तथा चंद्रमा के समान धवल, मद्य पोकर मत्त, मुशल, हल, नीलवस्त्र तथा एक कुंडल धारण करने वाले बलभद्र, श्यामवर्णा, पूर्णयौवना, पीतवसना, मनोरम आभूषणों से विभूषिता, वरमुद्रा तथा अभयमुद्रा धारण करने वाली सुभद्रा और भाँति-भाँति के उप- हार एवम् अन्न अपने करकमलों में धारण करने वाले गोप-गोपियों की पूजा कर पत्रों से अलग दिशाओं के मध्य में मंदार आदि कल्पवृक्षों की अर्चना करे। मंदार, संतानक, पारिजातक, कल्पद्रुम तथा हरिचंदन--ये कल्पवृक्ष कहलाते हैं। इनके बाद शक्र आदि देवों तथा उनके अस्त्रों की पूजा कर कृष्ण, वासुदेव, देवकीनंदन, नारायण, यदुश्रेष्ठ, वार्ष्णेय, धर्मपालक तथा असुरों से आक्रान्त पृथ्वी का भार हरण करने वाले अष्टकृष्ण की पूजा करे। विद्वान् साधक संसारसागर से पार होने के लिए और सकल कामनाओं को प्राप्त करने के लिये श्रीकृष्ण की उपर्युक्त आवरणों के साथ पूजा करे। पूजा की सिद्धि हो जाने पर मनुष्य कुबेरतुल्य तथा धर्मराजतुल्य हो जाता है ॥६३-७४॥ अब मैं समस्त कामनाओं को सिद्ध करनेवाला (कृष्ण का) त्रिकाल पूजन बतलाता हूँ। साधक इस प्रकार ध्यान करे कि सुमनोहर उद्यान में सुवर्ण तथा रत्नों के बने मण्डप पर कल्पद्रुम सुशोभित हो रहा है। उसके नीचे रत्नमय कमलासन पर एक शिशु बैठा है, जिसका वर्ण मकरतमणि के समान ओर बाल घुंघराले हैं। गंडस्थल चंचल सुवर्णकुण्डलों से सुशोभित एवम् मनोहर है, नासिका, अधर तथा विचित्र मन्दहास्य करने वाला कमलमुख सुन्दर हैं। वे चमकते हुए निर्मल रत्न एवम् सुवर्ण की बनी करधनी धारण किये हैं। पद्म के समान नाखून हैं। अंग सुदृढ एवम् सुडौल हैं। गायों की पदधूलि से उरःस्थल धूसरित हो गया है। शरीर की आभा कांचन के ६० ना० पृ०