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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 742

अशीतितमोऽध्यायः ७२३ भूबिंबं च लिखेद्वाह्ये श्रीमायादिग्वििदक्ष्वपि । भूग्रहं चतुरस्रं स्यादष्टवज्रविभूषितम् ॥१८६॥ एतद्यंत्रं हाटकादिपट्टेष्वालिख्य पूर्ववत् । संस्कृतं धारयेद्यो वै सोऽर्च्यते त्रिदशैरपि ॥१८२॥ स्याद्गायत्री वामदेवपुष्पबाणौ तु ङेतिमौ । विद्महेधीमहियुतौ तन्नोऽनंगः प्रचोदयात् ॥१८३॥ जप्य जप्यौ गोपालमूलां जनरंजनी । हृदयं कामदेवाय ङेतं सर्वजनप्रियम् ॥१८४॥ उक्त्वा सर्वजनांते तु संमोहनपदं तथा । ज्वल ज्वल प्रज्वलेति प्रोच्य सर्वजनस्य च ॥१८५॥ हृदयं मम च ब्रूयाद्वशं कुरु युगं शिरः । प्रोक्तो मदनमंत्रोऽष्टचत्वारिंशद्भिभक्षरैः १८६॥ जपादौ स्मरबीजाद्यो जगत्त्रयवशीकरः । पीठं प्राग्वत्समभ्यर्च्य मूर्ति संकल्प्य मूलतः ॥१८७॥ तत्रावाहाच्युतं भक्त्या सकलीकृत्य पूजयेत् । आसनादिविभूषांतं पुनर्न्यासक्रमाद्यजेत् ॥१८८॥ सृष्टि स्थितिं षडंगं च किरीटं कुंडलद्वयम् । शंखं चक्रं गदां पद्मं मालां श्रीवत्सकौस्तुभौ ॥१८६॥ गन्धपुष्पैः समभ्यर्च्य मूलेन वैष्णवोत्तमः । षट्कोणेषु षडंगानि दिग्दलेषु क्रमाद्यजेत् ॥२००॥ वासुदेवाविकान्कोणेषु तु शांत्यादिकांस्ततः । पत्राग्रगा महिष्योऽष्टौ यजेत्साधकत्तमः ॥२०१॥ ततः षोडशसाहस्रं सकृद्देवार्चयेत्प्रियाः । इंद्रनीलमुकुन्दांश्च करालांनद कच्छपान् ॥२०२॥ शंखपद्मौ ततः पश्चात्वान्निधीनष्टौ क्रमाद्यजेत् । तद्वर्हिलोकपालांश्च वज्राद्यानपि पूजयेत् ॥२०३॥ एवं सप्तावृतितवृतं कृष्णमभ्यर्च्य चादरात् । प्रीणयेद्दधिखंडाज्यमिश्रेण तु पयोऽधसा ॥२०४॥ दिव्योपचारं दत्त्वाथ स्तुत्त्वा नत्वा च केशवम् । उद्वासयेत्स्वहृदये परिवारगणैः सह ॥२०५॥ न्यस्यात्मानं समभ्यर्च्य तन्मयो विहरेत्सुधीः । रत्नाभिषेकध्यानेज्या विंशत्यर्णाश्रितेरिता ॥२०६॥


बाहर भूबिम्ब लिखे। फिर दिशा-विदिशाओं में श्री, माया आदि लिखकर भूग्रह तथा अष्टवज्रविभूषित चतुरस्र लिखे। यह यंत्र सुवर्ण आदि के पट्ट पर लिखना चाहिये। इस यन्त्र को सुसंस्कृत करके जो धारण करता है, वह देवताओं से भी पूजित होता है। "वामदेव पुष्पबाणौ विद्महे धीमहि तन्नोऽनंगः प्रचोदयात्" यह काम गायत्री है ॥१८६-१८६॥ कृष्णमंत्रों के जप करने से पहिले इसका जप करना चाहिये। यह मनुष्यों को आनन्द देनेवाली है। "हृदयम्.....युगं शिरः" यह काममन्त्र है, जिसमें चालीस अक्षर होते हैं। जप के आदि में इस स्मर- बीजमन्त्र को जपने से तीनों लोक वशीभूत होते हैं। पूर्वोक्त रीति से पीठ की अर्चना कर उस पर मूलमंत्र से मूर्ति की स्थापना करके उसमें कृष्ण का आवा- हन करे और उसमें पूर्णता की भावना से पूजा करे। आसन से लेकर आभूषण तक भगवान् को अर्पण करके फिर न्यासक्रम से आराधना करे। सृष्टि, स्थिति, षडंग किरीट, दोनों कुण्डल, शंख, चक्र, गदा, पद्म, माला, श्रीवत्स तथा कौस्तुभ की गंध पुष्पों से पूजा कर श्रेष्ठ वैष्णव मूलमंत्र द्वारा छह कोणों में छह अंगों का और पूर्वादि दलों में क्रमशः वासुदेव आदि तथा कोणों में शान्ति आदि का क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ साधक दलों के अग्रभाग में आठ राजमहिषियों की अर्चना कर सोलह हजार कृष्ण-प्रियाओं का एक ही साथ पूजन करे ॥१९४- २०१३॥ तदनन्तर इन्द्र, नील, मुकुन्द, कराल, आनन्द, कच्छप, शंख तथा पद्म इन अष्ट निधियों का क्रमशः पूजन कर लोकपालों तथा उनके अस्त्रों की भी पूजा करे। इस प्रकार सात बार आदर पूर्वक कृष्ण की आरा- धना कर उन्हें दही, मिश्री, घी, दूध, अन्न तथा दिव्य उपहार समर्पण कर स्तुति एवम् नमस्कार करे। पुनः अपने हृदय में सपरिवार कृष्ण का ध्यान कर भगवत्स्वरूप आत्मा का पूजन करके विद्वान् पुरुष तन्मय होकर विचरे । उनका रत्नाभिषेक, ध्यान, पूजन आदि बीस अक्षरों वाले मंत्र के अधीन है-ऐसा कहा गया है ॥२०२-२०६॥