बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७२४ नारदीयपुराणम्
एवं यो भजते मन्त्रं स समृद्धेः पदं भवेत् । जपहोमार्चनध्यानैयों मनुं प्रजपेदमुम् ॥२०७॥ तद्देश्म पूर्यते रत्नैः स्वर्णधान्यैरनारतम् । पृथ्वी पृथ्वी करे तस्य सर्वसस्यसमाकुला ॥२०८॥ पुत्रैर्मित्रैः सुसंपन्नः प्रयात्यंते परां गतिम् । वह्नावभ्यर्च्य गोविन्दं शुक्लपुष्पैः सतंडुलैः ॥२०६॥ आज्याक्तै रयुतं हुत्वा भस्म तन्मूर्ध्नि धारयेत् । तस्यान्नादिसमृद्धिः स्यात्तद्वशं सर्वयोषितः ॥२१०॥ रक्तांभोजैस्त्रिमध्वक्तैर्हुनेल्लक्षं समाहितः । श्रिया तस्यैद्रमैश्वर्यं तृणलेशायते ध्रुवम् ॥२११॥ त्रिमध्वक्तैः सितैः पुष्पैराष्टोत्तरसहस्रकम् । या हुनेत्प्रत्यहं मासात्पुरोधा नृपतेर्भवेत् ॥२१२॥ एवमादिप्रयोगांश्च साधयेन्मनुनामुना । मन्त्रराजमथो वक्ष्ये दशार्णं सर्वसिद्धिदम् ॥२१३॥ स्मृतिः सद्यान्विता साक्षिलोहितो जनवल्लभा । पवनोऽग्निप्रियांतोऽयं दशार्णो मन्त्र ईरितः ॥२१४॥ नारदोऽस्य मुनिश्च्छंदो विराट् कृष्णोऽस्य देवता । कामो बीजं वह्निजाया शक्तिः प्रोक्ता मनीषिभिः ॥२१५॥ आचक्रं च विचक्रं च सुचक्रं तदनन्तरम् । त्रैलोक्यरक्षणं चक्रंसुरांतकचक्रकम् २१६॥ एतैरैंङद्वयांतैश्च चक्रैः पंचांगकं मनोः । ततस्तारपुटं मन्त्रं व्याप्य करयोस्त्रिशः ॥२१७॥ सेंदून्हृदंतान्मंत्रवर्णान्प्रणवांतरितान्यसेत् । दक्षांगुष्ठाच्च वामांगुष्ठांतमंगुलिपर्वसु ॥२१८॥ सृष्टिन्यासोऽयमुदितः स्थितिन्यासोऽधुनोच्यते । न्यसेद्दामकनिष्ठानिकनिष्ठांतं स्थितौ सुधीः ॥२१६॥ वामांगुष्ठान्न्यसेद्दक्षांगुष्ठांतं संहृतौ तथा । संहृतिर्दोषसंघातहारिणी परिकीर्तिता ॥२२०॥
जो विद्वान् उक्त प्रकार से कृष्णमन्त्र को उपासना करते हैं, वे समृद्धिशाली होते हैं। जो मनुष्य जप, होम, अर्चन तथा ध्यान पुरस्सर उक्त मन्त्र का जप करता है, उसका घर सतत धन-धान्य तथा स्वर्ण से परिपूर्ण रहता है। उसके खेतों में सब प्रकार के अन्न उपजते हैं। वह पुत्र-मित्रों से सुसम्पन्न होकर अन्त में उत्तम गति को प्राप्त करता है। जो गोविन्द की अर्चना कर तन्दुल, घी तथा श्वेत पुष्पों से अग्नि में हवन करता है, उसे प्रचुर अन्न आदि तथा रमणियाँ प्राप्त होती हैं। जो त्रिमधुयुक्त रक्त कमलों से एक लाख हवन करता है उसके ऐश्वर्य के सामने इन्द्र का भी ऐश्वर्य नगण्य-सा हो जाता है, जो एक मास तक प्रत्येक दिन त्रिमधुयुक्त श्वेत पुष्पों से एक सौ आठ बार हवन करता है, उसे राजपुरोहित का पद प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक प्रयोग उक्त मंत्र से सिद्ध किये जा सकते हैं। अब मैं दस अक्षरोंवाले सर्वसिद्धिदायक मंत्रराज को बतलाता हूँ ॥२०७-२१३॥ स्मृति (ग्) यह सद्य (ओ) से युक्त हो और लोहित (प्) वामनेत्र (ई) से संलग्न हो। इसके बाद 'जनवल्लभा' ये अक्षर समुदाय हों तत्पश्चात् पवन (य) हो और अन्त में अग्निप्रिया (स्वाहा) हों तो यह (गोपीजनवल्लभाम स्वाहा) दशाक्षर मंत्र है। इसके मुनि नारद, छंद विराट्, देवता कृष्ण, बीज क्लीं और स्वाहा शक्ति है। आचक्र, विचक्र, सुचक्र, त्रैलोक्यरक्षण चक्र और सुरांतकचक्र ये पाँचों चक्र मन्त्र के अंग कहलाते हैं। इन शब्दों के अन्त में ङे विभक्ति और स्वाहा पद जोड़ कर इन पंचविधचक्रों द्वारा पंचांगन्यास करे। तदनन्तर प्रणवसंपुटित मन्त्र पढ़कर दोनों हाथों में तीन बार व्यापक न्यास तत्पश्चात् मन्त्र के प्रत्येक अक्षर को अनुस्वारयुक्त करके उनके आदि में प्रणव और अन्त में नमः जोड़कर उनका दाहिने हाथ के अंगूठे से लेकर बाँयें हाथ के अंगूठे तक के अंगुलिपर्वों में भी न्यास करे। इसका नाम सृष्टिन्यास है। अब स्थितिन्यास कहा जाता है ॥२१४-२१८॥ वाम हस्त की कनिष्ठा से लेकर दक्षिण हस्त की कनिष्ठा तक पूर्वोक्त रूप से मंत्राक्षरों का न्यास